वह किसी न किसी तरह खुद को बनाए रखना चाहती हैं.


धूप में परेशान-बेहाल सा वो बूढ़ा किसी तरह साइकिल को धकेलकर आगे बढ़ाने की कोशिश में जुटा हुआ था. सिर पर सफेद टोपी, कुर्ता-पायजामा जिसके कोने पर जगह-जगह कीचड़ लगा था. पैर में प्लास्टिक की चप्पलें थीं, जिनसे उसकी फटी एडिय़ां झांक रही थीं. साइकिल के आगे ढेर सारे प्लास्टिक के तिरंगे सजाए हुए थे. बस किसी तरह रैली में आगे बढ़कर वह अपने प्रिय नेता के सुपुत्र के दर्शन कर लेना चाहता था. सम्मान के नाम पर बूढ़े को ‘वरिष्ठ कांग्रेसी’ कहा जाता है, लेकिन पार्टी का कोई टुच्चा कार्यकर्ता भी उसको बात-बेबात धमकाने से बाज नहीं आता. कहते हैं कि अपनों की लाशों पर ही सियासत का महल खड़ा होता है. चुनाव नजदीक हैं. मतदाताओं को रिझाने का दौर चल रहा है, लेकिन पार्षद से लेकर एक विधायक तक की सफलता के पीछे ऐसे कई गुमनाम चेहरे और कहानियां होती हैं, जिनका किसी इतिहास में जिक्र नहीं होता. इनमें कई वो कार्यकर्ता होते हैं, जिनके होना तो जरूरी समझा जाता है, लेकिन न होने से किसी को फर्क नहीं पड़ता. रैली में भीड़ बढ़ाने के लिए, बूथ पर ड्यूटी देने के लिए और अपने मोहल्ले के लोगों को संबंधित पार्टी को सपोर्ट करने की अपील करते इन कार्यकर्ताओं को देखकर उनकी महत्वाकांक्षाओं का अंदाजा तो लगाया जा सकता है, लेकिन कहते हैं न कि हर बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है. कुछ इसी तरह कई-कई साल पार्टी की सेवा करने का फल इन्हें ‘वरिष्ठ’ होने का ठप्पा लगाकर दे दिया जाता है. कुछ दिन पहले दून में एक बड़े लीडर की जनसभा संपन्न हुई है. परेड ग्राउंड में इतनी भीड़ थी कि पैर रखने तक की जगह नहीं मिल पा रही थी. इतने में महिलाओं का एक झुंड दिखाई दिया. एक महिला ने गोद में छोटे बच्चे को पकड़ा हुआ था और दूसरे हाथ में पार्टी का झंडा….किसी तरह वह दुपट्टा और बच्चे को संभालते हुए आगे बढ़ रही थी. उस औरत को देखकर कई विचार दिमाग में आए. आज महिला अपने परिवार के लिए दिन का खाना नहीं बना पाएगी, उसे पता है कि रैली खत्म होने पर जब वो घर जाएगी तो हो सकता है कि शराबी पति का पारा सातवें आसमान पर हो और वो फिर उसकी पिटाई करे. महिला तो किसी तरह धूप सह रही थी और बीच-बीच में जिंदाबाद के स्वर में धीमा स्वर मिला रही थी, लेकिन धूप ने बच्चे को बेहाल कर दिया था. राजनीति के बड़े तालाब की सबसे छोटी मछलियां यही कार्यकर्ता होते हैं. एक बड़ी मछली का अस्तित्व बचाए रखने के लिए ऐसी कई छोटी मछलियां अपमान सहती हैं, लेकिन उम्मीदों और महत्वाकांक्षाओं की इस दौड़ में वह किसी न किसी तरह खुद को बनाए रखना चाहती हैं.

उम्मीदों और महत्वाकांक्षाओं की इस दौड़ में


Big Ben

Big Ben (Divya)

धूप में परेशान-बेहाल सा वो बूढ़ा किसी तरह साइकिल को धकेलकर आगे बढ़ाने की कोशिश में जुटा हुआ था. सिर पर सफेद टोपी, कुर्ता-पायजामा जिसके कोने पर जगह-जगह कीचड़ लगा था. पैर में प्लास्टिक की चप्पलें थीं, जिनसे उसकी फटी एडिय़ां झांक रही थीं. साइकिल के आगे ढेर सारे प्लास्टिक के तिरंगे सजाए हुए थे. बस किसी तरह रैली में आगे बढ़कर वह अपने प्रिय नेता के सुपुत्र के दर्शन कर लेना चाहता था. सम्मान के नाम पर बूढ़े को ‘वरिष्ठ कांग्रेसी’ कहा जाता है, लेकिन पार्टी का कोई टुच्चा कार्यकर्ता भी उसको बात-बेबात धमकाने से बाज नहीं आता. कहते हैं कि अपनों की लाशों पर ही सियासत का महल खड़ा होता है. चुनाव नजदीक हैं. मतदाताओं को रिझाने का दौर चल रहा है, लेकिन पार्षद से लेकर एक विधायक तक की सफलता के पीछे ऐसे कई गुमनाम चेहरे और कहानियां होती हैं, जिनका किसी इतिहास में जिक्र नहीं होता. इनमें कई वो कार्यकर्ता होते हैं, जिनके होना तो जरूरी समझा जाता है, लेकिन न होने से किसी को फर्क नहीं पड़ता. रैली में भीड़ बढ़ाने के लिए, बूथ पर ड्यूटी देने के लिए और अपने मोहल्ले के लोगों को संबंधित पार्टी को सपोर्ट करने की अपील करते इन कार्यकर्ताओं को देखकर उनकी महत्वाकांक्षाओं का अंदाजा तो लगाया जा सकता है, लेकिन कहते हैं न कि हर बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है. कुछ इसी तरह कई-कई साल पार्टी की सेवा करने का फल इन्हें ‘वरिष्ठ’ होने का ठप्पा लगाकर दे दिया जाता है. कुछ दिन पहले दून में एक बड़े लीडर की जनसभा संपन्न हुई है. परेड ग्राउंड में इतनी भीड़ थी कि पैर रखने तक की जगह नहीं मिल पा रही थी. इतने में महिलाओं का एक झुंड दिखाई दिया. एक महिला ने गोद में छोटे बच्चे को पकड़ा हुआ था और दूसरे हाथ में पार्टी का झंडा….किसी तरह वह दुपट्टा और बच्चे को संभालते हुए आगे बढ़ रही थी. उस औरत को देखकर कई विचार दिमाग में आए. आज महिला अपने परिवार के लिए दिन का खाना नहीं बना पाएगी, उसे पता है कि रैली खत्म होने पर जब वो घर जाएगी तो हो सकता है कि शराबी पति का पारा सातवें आसमान पर हो और वो फिर उसकी पिटाई करे. महिला तो किसी तरह धूप सह रही थी और बीच-बीच में जिंदाबाद के स्वर में धीमा स्वर मिला रही थी, लेकिन धूप ने बच्चे को बेहाल कर दिया था. राजनीति के बड़े तालाब की सबसे छोटी मछलियां यही कार्यकर्ता होते हैं. एक बड़ी मछली का अस्तित्व बचाए रखने के लिए ऐसी कई छोटी मछलियां अपमान सहती हैं, लेकिन

वह किसी न किसी तरह खुद को बनाए रखना चाहती हैं.

जब लम्हों ने खता की है और सदियों ने सज़ा पाई है”


Fresh corn ready to roast in Mexico City stree...

हिन्दी: ताजा मकई मेक्सिको सिटी सड़क में भुना करने के लिए तैयार है.

क्षणिक आवेश में लिए गए कदम का अंजाम कितना भयावह हो सकता है इस बात का गवाह बना गुडगाँव का मानेसर स्थित संयंत्र,जहां आगजनी की घटना हुई .आश्चर्य तो इस बात का है कि हर छोटी-बड़ी घटना पर चिल्ल-पों मचाने वाले चैनल,समाचार पत्र ने इस घटना क्रम में मारे गए अवनीश कुमार देव जी की जघन्य ह्त्या को कोई ज्यादा तवज्जो नहीं दी.इस अनुपम मंच पर भी सिर्फ डॉक्टर आशुतोष जी के तीन ब्लॉग:गुडगाँव की कडवाहट(२० जुलाई),मारुती और आर्थिक स्थिति (२२ जुलाई),मारुती और पंचायत(२४ जुलाई) मुझे देखने को मिले .यही अगर किसी बड़े अधिकारी द्वारा किसी श्रमिक के साथ हुआ होता तो स्वयं को आम जनता का  शुभचिंतक और हितैषी नायक कहलाने वाला मीडिया उस अधिकारी की गत रात्रि के भोजन,परिणाम स्वरुप उससे उत्पन्न होने वाली आक्रामक भावनाओं,उसके हर अच्छे कार्य को बुरे लेप की कलई के साथ एक ही दिन के कई समयों में प्रसारित करता रहता और देश-विदेश की सारी संवेदनाओं को उस श्रमिक के पक्ष में करने का कोई प्रयास नहीं छोड़ता.पर अमानवीय ढंग से की गयी हिंसा और ह्त्या में मारे एक अधिकारी और उसके परिवार की व्यथा में इलेक्ट्रौनिक मीडिया,प्रिंट मीडिया,आम जनता.औद्योगिक जगत सभी मूक हो गए हैं.जैसे पत्थर की अहलैया.काश इस ब्लॉग को पढ़कर ही या इस ब्लॉग के स्पर्श मात्र से ही इनमें से कोई भी पाषाण मूर्ति सजीव हो उठती!!!!!!!!!!

क्या एच आर महाप्रबंधक अवनीश देव जी एक इंसान नहीं थे,या एक आम इंसान की तरह ही उनका दुःख-दर्द हम सभी के दुःख जैसा नहीं है?रोजी-रोटी की ज़द्दोज़हद में अपनी जमीन,अपनी माटी से उनका पलायन और फिर सेवा देने के दौरान ऐसी जघन्य ह्त्या क्या उनके परिवार की दो पुत्रियाँ, उनकी विधवा पत्नी के दुखों के आंसू से हमारी संवेदनाएं नहीं जुड़नी चाहिए?जिस प्रकार श्रमिक अपना जन्म स्थान छोड़ कर रोजी-रोटी के लिए दूसरे राज्य में जाते हैं उसी तरह वे (अवनीश जी रांची से गुडगाँव)भी रोजी-रोटी के लिए अपनी ज़मीं छोड़ कर गए थे. एक एच आर महाप्रबंधक का पद जितना ज़िम्मेदारी पूर्ण होता है उतना ही संवेदनशील भी है.किसी भी कंपनी के विजयनगर के क्षेत्र के कृष्णदेव राय का तेनालीराम और अकबर के दरबार के बीरबल सदृश बुद्धिमान और बुद्धिजीवी शख्श जो हर समस्या के सकारात्मक और संतुलित समाधान के साथ हर वक्त उपलब्ध रहता है,मानवीय रिश्तों के बीच तालमेल के साथ-साथ बाज़ार में भी कंपनी की सुन्दर छवि बनाते हुए कंपनी के जीवन रक्षक की अहम् भूमिका निभाने में रात-दिन काम करने में कोई कसर नहीं छोड़ता ऐसे महाप्रबंधक की जीवन रक्षा की ज़िम्मेदारी किसी की भी नहीं बनती है ?कंपनी,सरकार, श्रमिक यूनियन नेता वहां की स्थानीय जनता या फिर श्रमिक कौन है इस जिम्मेदार पद सम्हालने वाले व्यक्ति का रक्षक ?इस घटना से इस बात का कोई उत्तर मुझे नहीं मिल रहा है.अवनीश देव जी के परिवार के आंसू से देश क्यों नहीं द्रवित हुआ? ऐसे जिम्मेदार पदों पर अपनी अहम् भूमिका निभाने वाली बौधिक संपदा की रक्षा के लिए देश क्या करेगा ?मुझे इस प्रश्न का ज़वाब चाहिए.अब कंपनी चाहे हरियाणा राज्य को छोड़ कर गुजरात जाने का विचार करे या फिर किसी अन्य राज्य में इससे देव जी के परिवार के दुखों के बादल तो कभी नहीं छंट पाएंगे .शेष सभी अन्य कंपनी के भी अधिकारियों की सुरक्षा का प्रश्न यक्ष की तरह सामने है.

श्रमिक यह भूल जाते हैं कि जिन चंद लोगों के दुष्प्रभाव में आकर वे आगजनी,हड़ताल,हिंसा, गेट जाम जैसी कार्यवाही को अंजाम देते हैं उन लोगों का सरोकार श्रमिक समस्या से कम और अपने निजी मंसूबों से ज्यादा होता है.जो कंपनी उन्हें रोजगार देती है,उनके घर के चूल्हे जलने में सहायक होती है उन्ही के महाप्रबंधकों के साथ वे “जिस थाली में खाओ उसी में छेद करो”की कहावत को चरितार्थ करने से नहीं चुकते.क्या उनकी नासमझी और अशिक्षा के शेल इतने कड़े होते हैं कि एच आर जैसे बुद्धिजीवी पदवी के लोगों की शांतिपूर्ण वार्ता उसे भेद नहीं पाती और मुट्ठी भर अराजक बाह्य तत्वों की गर्मी उसे पिघला जाती है.वज़ह स्पष्ट है सदियों से श्रमिक और मालिक के बीच की खाई को पटती देख कर भी बाह्य तत्त्व श्रमिकों को गुमराह कर देते हैं.जो दोस्ताना सम्बन्ध श्रमिक बाह्य तत्वों से रखते हैं क्या वही सम्बन्ध वे अपने कंपनी के अधिकारियों से नहीं रख सकते हैं?????????.क्या यह सीधी सी सरल बात श्रमिकों को समझ में नहीं आ सकती कि शांतिपूर्ण वार्ताओं से समस्याओं का हल निकालना ,स्थितियों को जटिल बनाने वाले अवांछित बाह्य अराजक तत्वों का आत्मानुशासित होकर बहिष्कार करना कंपनी के हित के साथ-साथ मजदूरों के भी हित में भी है?

लगभग प्रत्येक कंपनी जिस भी ज़मीं पर संयंत्र लगाती है उस ज़मीं के लोगों को रोज़गार देने के साथ साथ उनके क्षेत्र की शिक्षा,स्वास्थय जैसी आधारभूत संरचनाओं का भी पूर्ण विकास करने में अहम् भूमिका निभाती है.अपने लाभ का हिस्सा श्रमिकों में भी बांटती है और इस तरह देश की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाती है .हर कार्य क्षेत्र को श्रमिकों को अपना कार्य मंदिर या इबादत खाना सदृश समझना चाहिए पर अफ़सोस इस बात का है कि वे हिंसा और मार-पीट पर उतारू हो जाते हैं.
सरकार वैश्विक (ग्लोबल)होने का दावा करती है तो ग्लोबल स्तर पर उद्योग जगत की छवि खराब करने वाले ऐसे अराजक लोगों की पहचान कर उन्हें दण्डित क्यों नहीं करती है?किसी भी कंपनी के संचालन में बाह्य अराजक तत्वों को किस की मर्जी से पनाह मिलती है जो असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा पर पहुँच कर देव जैसे अधिकारियों को काल का ग्रास बना डालते हैं और ऐसी करतूतों में कोई उन अधिकारियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी तक नहीं लेता है.
अगर इन वारदातों और ऐसे अराजक तत्वों पर रोक नहीं लगी तो वह दिन भी दूर नहीं जब ऐसी आवेश पूर्ण गलती की सज़ा सदियों तक देश को भुगतनी पड़ सकती है क्योंकि ऐसे माहौल में कोई भी वैश्विक कंपनी यहाँ निवेश करने ,नए संयंत्र लगाने या फिर किसी देशी कंपनी के साथ भागीदारी लेने से गुरेज़ करेगी और भारत के विकासशील देश से विकसित देश में तब्दील होने का स्वप्न दिवास्वप्न ही बन कर रह जाएगा

कुकिंग टिप्स!


purnima 19

कुकिंग टिप्स उपयोगी है किचन की बची सामग्री किचन की कई प्रकार की बची सामग्री‍ को हम कचरा समझ कर फेंक देते हैं, जैसे- नींबू और संतरे के छिलके, चाय की उबली हुई पत्ती आदि… लेकिन यह चीजें हमारे लिए बहुत उपयोगी साबित हो सकती हैं। इन चीजों का दूसरी तरह से उपयोग करके हम अपने खर्च को आसानी से कम कर सकते हैं। गेहूं अंकुरित करने के आसान टिप्स * गेहूं अंकुरित करने के लिए अच्छी गुणवत्ता का गेहूं लें। * गेहूं को साफ करके 6-12 घंटे के लिए पानी में भिगो दें। * इन गेहूं को दिन में तीन बार पानी से धोएं। * अब गेहूं को स्प्राउट मेकर में या कपड़े में बांधकर रख दें। अंकुरित होने पर मनचाहे तरीके से इनका प्रयोग करें। * बच्चों के लिए भी आप इनसे पराठे, स्टफ्ड पूरी, सैंडविच जैसी चीजें बना सकती हैं। वहीं डाइट कांशस लोग इसे सिंपल तरीके से नींबू तथा हल्के मसाले के साथ खा सकते हैं। घर पर कैसे बनाएं देसी घी… हमारे देश में पहले घर-घर घी बनाने की परंपरा थी, लेकिन अब कई कारणों से ऐसा संभव नहीं रहा। रूटीन से थोड़ा हटते हुए घर पर बनाएंगे तब इसके गुणों के आगे घी बनाने के सारे कष्ट भूल जाएंगे कुकिंग के स्मार्ट आइडिया सब्जी बनाते समय मटर के दाने सिकुड़े नहीं इसलिए पानी में एक चम्मच शक्कर डालकर मटर उबालें। मटर का हरा रंग बरकरार रखने के लिए पानी में एक चम्मच शक्कर डालकर उबाल लें। ग्रेवी में पानी सहित उपयोग करें। टोमेटो स्वादिष्ट और सुगंधित बनाने के लिए सूप में एक चम्मच पुदीना पीस कर मिला दें। कुछ उपयोगी टिप्स कटहल में यदि बीज हो तो इन्हें फेंकिए नहीं, इकट्ठा करती रहें। पानी से अच्छी तरह धोकर, उबालकर छील लें। इन बीजों की रसेदार-मसालेदार सब्जी बना लें या फिर बेसन में मसलकर पकौड़े बना लें। ये बलवर्द्धक, दस्त रोकने वाले और मूत्र अवरोध दूर करते हैं। क्रिस्पी डोसा टिप्स तवे पर डोसा चिपक रहा हो तो एक प्याज को आधा काटे। अब तवा साफ कर उस पर तेल की कुछ बूंदे डालें और प्याज से फैलाए। इससे डोसा बिना चिपके करारा बनेगा। – क्रिस्पी डोसा बनाने के लिए जब भी तवे पर बैटर डालें, पहले तवे पर तेल डाल कर उस पर नमक वाला पानी छींटे। प्याज-लहसुन का उपयोग प्याज काटने से पहले चाकू को थोड़ा गर्म कर लें। फिर प्याज काटे, इससे आपकी आंखों में आंसू नहीं आएंगे। – गार्निशिंग के लिए प्याज ब्राउन करते समय उसमें एक चुटकी शक्कर या फिर नमक मिलाने से वे जल्दी ब्राउन होंगे। – कुछ घंटों के लिए लहसुन को पानी में भिगो देने से उसे छिलने में आसानी होगी। – लहसुन को छिल लें। इसे तेल वाले जार में भर कर रखें। इस फ्लेवर्ड ऑयल का उपयोग सलाद और सिजनिंग में कर सकते हैं। – जब आप प्रेशर कुकर इस्तेमाल कर रहे हो, तब उसकी लिड पर लहसुन की कलियां दस मिनट के लिए रख दें। छिलके आसानी से उतर जाएंगे। कारगर कुकिंग टिप्स वर्तमान में भागदौड़ भरी जिंदगी में समय की कमी को दूर करने के लिए कुकिंग टिप्स बेहद कारगर होते हैं। इनसे रसोई के काम आसान हो जाते हैं। इसके लिए कुछ बातों पर गौर करना जरूरी है। – रात की बची हुई दाल का सांभर बना कर परोस सकते हैं। – एक कप दाल बनाने के लिए कम से कम 2 से 3 कप पानी डालें। फिर इसे पकाएं। – यदि खड़ी दालें बनाना हो तो उन्हें रात को ही धोकर गला दें। इससे कुकिंग टाइम के साथ रसोई गैस की भी बचत होगी। – ग्रेवी बनाते समय उसमें गरम पानी डालें। इससे स्वाद में इजाफा होगा। – होममेड गार्लिक, जिंजर, ग्रीन चीली पेस्ट में एक टी स्पून गरम तेल और थोड़ा`सा नमक मिला देने से वह ज्यादा दिनों तक फ्रेश रहता है। कुछ बेहतर कुकिंग टिप्स यदि आप डेजर्ट बना रहे हों तो भारी तले का बर्तन इस्तेमाल करें। इससे बर्तन जलेगा नहीं और डेजर्ट का स्वाद भी बढ़ेगा। – यदि आप डेजर्ट का क्रीमी टेक्चर चाहती हैं तो फुल क्रीम दूध का इस्तेमाल करें। – पतीले में थोड़ा पानी डालें इसके बाद दूध उबालें। इससे बर्तन की तली में दूध नहीं चिपकेगा। – किशमिश को एयरटाइट डिब्बे में बंद कर उसे रेफ्रीजरेट करने वे ज्यादा दिनों तक फ्रेश रहेंगे। जब इन्हें इस्तेमाल करना हो तब इन पर गर्म पानी डालें। इसके बाद किचन टॉवेल पर सुखा लें। – चावल में एक टी स्पून तेल और कुछ बूंदे नींबू के रस की मिलाने से वह पकने के बाद खिलाखिला रहेगा। – यदि आप रात को छोला या राजमा भिगोना भूल गए हो तो उबलते पानी में चना या राजमा को भिगोए। इसे आप एक घंटे के बाद पका सकती हैं। कैसे पहचानें सब्जियों की ताजगी सब्जियों की ताजगी और उनकी गुणवत्ता का पता उन्हे छूने से नहीं हो सकता। इसके लिए जरूरी है कि कुछ बातों पर गौर किया जाए, ताकि आपको मिले ताजी सब्जियां। लौकी : लंबाई लिए हुए पतली लौकी का चुनाव करें। जिसका छिलका हल्के हरे रंग का हो और थोड़ी चिकनाई लिए हुए हो। परवल : लंबाई लिए हुए हों और जिन पर सुनहरा हरा रंग हो तथा हल्की-सी गहरे रंग की धारी भी दिखती हो। पीले पड़े हुए न लें, न ही मोटाई लिए हुए परवल लें, क्योंकि तब अंदर बीज पके हुए हो सकते हैं। मटर : जिसकी फलियां थोड़ी नरम, मुलायम हो और उनका रंग सुनहरा हरा हो। टमाटर : जो गोलाई और थोड़ा मोटापा लिए हुए हों, लाल व सख्त हों। ध्यान रहे, उनमें कोई दाग या काले निशान न हों और न ही वे पिलपिले हों। उपयोगी कुकिंग टिप्स डोसा को नया फ्लेवर देने के लिए उसके घोल में कुछ दाने मेथी के मिला दें। पापड़ व बिस्किट में सीलन आ गई हो, तो इन्हें डिब्बे में पुदीने की पत्तियों के साथ बंद करके तकरीबन तीन घंटे के लिए रख दें। इससे पापड़ व बिस्किट क्रिस्पी हो जाएंगे और खाने में नया स्वाद आएगा। तुरई-गिलकी को गीले कपड़े में लपेटकर या पॉलीथिन में रखें ताजा रहेगी। सब्जी बासी हो तो उसे काट कर कुछ देर नींबू का रस मिले पानी में पड़ी रहने दें, ताजी हो जाएगी। – काटते समय बैंगन काले न पड़ें, इसके लिए उसको नमक व सोडा मिले पानी में डालें। चाइनीज फूड टिप्स आजकल चाइनीज फूड का ट्रेंड लोगों में काफी बढ़ गया है। आमतौर पर चाइनीज फूड की सभी रेसिपीज में कुछ कॉमन इनग्रेडिएंट डाले जाते हैं, जो इसके लिए जरूरी होते हैं। ये टेस्टी होने के साथ ही सेहत के लिए भी फायदेमंद होते हैं, क्योंकि इसमें सभी तरह की मौसमी सब्जियां डाली जाती हैं, जो नए फ्लेवर में लोगों को काफी पसंद आते हैं।प्रस्तुतिकुकिंग टिप्स उपयोगी है किचन की बची सामग्री किचन की कई प्रकार की बची सामग्री‍ को हम कचरा समझ कर फेंक देते हैं, जैसे- नींबू और संतरे के छिलके, चाय की उबली हुई पत्ती आदि… लेकिन यह चीजें हमारे लिए बहुत उपयोगी साबित हो सकती हैं। इन चीजों का दूसरी तरह से उपयोग करके हम अपने खर्च को आसानी से कम कर सकते हैं। गेहूं अंकुरित करने के आसान टिप्स * गेहूं अंकुरित करने के लिए अच्छी गुणवत्ता का गेहूं लें। * गेहूं को साफ करके 6-12 घंटे के लिए पानी में भिगो दें। * इन गेहूं को दिन में तीन बार पानी से धोएं। * अब गेहूं को स्प्राउट मेकर में या कपड़े में बांधकर रख दें। अंकुरित होने पर मनचाहे तरीके से इनका प्रयोग करें। * बच्चों के लिए भी आप इनसे पराठे, स्टफ्ड पूरी, सैंडविच जैसी चीजें बना सकती हैं। वहीं डाइट कांशस लोग इसे सिंपल तरीके से नींबू तथा हल्के मसाले के साथ खा सकते हैं। घर पर कैसे बनाएं देसी घी… हमारे देश में पहले घर-घर घी बनाने की परंपरा थी, लेकिन अब कई कारणों से ऐसा संभव नहीं रहा। रूटीन से थोड़ा हटते हुए घर पर बनाएंगे तब इसके गुणों के आगे घी बनाने के सारे कष्ट भूल जाएंगे कुकिंग के स्मार्ट आइडिया सब्जी बनाते समय मटर के दाने सिकुड़े नहीं इसलिए पानी में एक चम्मच शक्कर डालकर मटर उबालें। मटर का हरा रंग बरकरार रखने के लिए पानी में एक चम्मच शक्कर डालकर उबाल लें। ग्रेवी में पानी सहित उपयोग करें। टोमेटो स्वादिष्ट और सुगंधित बनाने के लिए सूप में एक चम्मच पुदीना पीस कर मिला दें। कुछ उपयोगी टिप्स कटहल में यदि बीज हो तो इन्हें फेंकिए नहीं, इकट्ठा करती रहें। पानी से अच्छी तरह धोकर, उबालकर छील लें। इन बीजों की रसेदार-मसालेदार सब्जी बना लें या फिर बेसन में मसलकर पकौड़े बना लें। ये बलवर्द्धक, दस्त रोकने वाले और मूत्र अवरोध दूर करते हैं। क्रिस्पी डोसा टिप्स तवे पर डोसा चिपक रहा हो तो एक प्याज को आधा काटे। अब तवा साफ कर उस पर तेल की कुछ बूंदे डालें और प्याज से फैलाए। इससे डोसा बिना चिपके करारा बनेगा। – क्रिस्पी डोसा बनाने के लिए जब भी तवे पर बैटर डालें, पहले तवे पर तेल डाल कर उस पर नमक वाला पानी छींटे। प्याज-लहसुन का उपयोग प्याज काटने से पहले चाकू को थोड़ा गर्म कर लें। फिर प्याज काटे, इससे आपकी आंखों में आंसू नहीं आएंगे। – गार्निशिंग के लिए प्याज ब्राउन करते समय उसमें एक चुटकी शक्कर या फिर नमक मिलाने से वे जल्दी ब्राउन होंगे। – कुछ घंटों के लिए लहसुन को पानी में भिगो देने से उसे छिलने में आसानी होगी। – लहसुन को छिल लें। इसे तेल वाले जार में भर कर रखें। इस फ्लेवर्ड ऑयल का उपयोग सलाद और सिजनिंग में कर सकते हैं। – जब आप प्रेशर कुकर इस्तेमाल कर रहे हो, तब उसकी लिड पर लहसुन की कलियां दस मिनट के लिए रख दें। छिलके आसानी से उतर जाएंगे। कारगर कुकिंग टिप्स वर्तमान में भागदौड़ भरी जिंदगी में समय की कमी को दूर करने के लिए कुकिंग टिप्स बेहद कारगर होते हैं। इनसे रसोई के काम आसान हो जाते हैं। इसके लिए कुछ बातों पर गौर करना जरूरी है। – रात की बची हुई दाल का सांभर बना कर परोस सकते हैं। – एक कप दाल बनाने के लिए कम से कम 2 से 3 कप पानी डालें। फिर इसे पकाएं। – यदि खड़ी दालें बनाना हो तो उन्हें रात को ही धोकर गला दें। इससे कुकिंग टाइम के साथ रसोई गैस की भी बचत होगी। – ग्रेवी बनाते समय उसमें गरम पानी डालें। इससे स्वाद में इजाफा होगा। – होममेड गार्लिक, जिंजर, ग्रीन चीली पेस्ट में एक टी स्पून गरम तेल और थोड़ा`सा नमक मिला देने से वह ज्यादा दिनों तक फ्रेश रहता है। कुछ बेहतर कुकिंग टिप्स यदि आप डेजर्ट बना रहे हों तो भारी तले का बर्तन इस्तेमाल करें। इससे बर्तन जलेगा नहीं और डेजर्ट का स्वाद भी बढ़ेगा। – यदि आप डेजर्ट का क्रीमी टेक्चर चाहती हैं तो फुल क्रीम दूध का इस्तेमाल करें। – पतीले में थोड़ा पानी डालें इसके बाद दूध उबालें। इससे बर्तन की तली में दूध नहीं चिपकेगा। – किशमिश को एयरटाइट डिब्बे में बंद कर उसे रेफ्रीजरेट करने वे ज्यादा दिनों तक फ्रेश रहेंगे। जब इन्हें इस्तेमाल करना हो तब इन पर गर्म पानी डालें। इसके बाद किचन टॉवेल पर सुखा लें। – चावल में एक टी स्पून तेल और कुछ बूंदे नींबू के रस की मिलाने से वह पकने के बाद खिलाखिला रहेगा। – यदि आप रात को छोला या राजमा भिगोना भूल गए हो तो उबलते पानी में चना या राजमा को भिगोए। इसे आप एक घंटे के बाद पका सकती हैं। कैसे पहचानें सब्जियों की ताजगी सब्जियों की ताजगी और उनकी गुणवत्ता का पता उन्हे छूने से नहीं हो सकता। इसके लिए जरूरी है कि कुछ बातों पर गौर किया जाए, ताकि आपको मिले ताजी सब्जियां। लौकी : लंबाई लिए हुए पतली लौकी का चुनाव करें। जिसका छिलका हल्के हरे रंग का हो और थोड़ी चिकनाई लिए हुए हो। परवल : लंबाई लिए हुए हों और जिन पर सुनहरा हरा रंग हो तथा हल्की-सी गहरे रंग की धारी भी दिखती हो। पीले पड़े हुए न लें, न ही मोटाई लिए हुए परवल लें, क्योंकि तब अंदर बीज पके हुए हो सकते हैं। मटर : जिसकी फलियां थोड़ी नरम, मुलायम हो और उनका रंग सुनहरा हरा हो। टमाटर : जो गोलाई और थोड़ा मोटापा लिए हुए हों, लाल व सख्त हों। ध्यान रहे, उनमें कोई दाग या काले निशान न हों और न ही वे पिलपिले हों। उपयोगी कुकिंग टिप्स डोसा को नया फ्लेवर देने के लिए उसके घोल में कुछ दाने मेथी के मिला दें। पापड़ व बिस्किट में सीलन आ गई हो, तो इन्हें डिब्बे में पुदीने की पत्तियों के साथ बंद करके तकरीबन तीन घंटे के लिए रख दें। इससे पापड़ व बिस्किट क्रिस्पी हो जाएंगे और खाने में नया स्वाद आएगा। तुरई-गिलकी को गीले कपड़े में लपेटकर या पॉलीथिन में रखें ताजा रहेगी। सब्जी बासी हो तो उसे काट कर कुछ देर नींबू का रस मिले पानी में पड़ी रहने दें, ताजी हो जाएगी। – काटते समय बैंगन काले न पड़ें, इसके लिए उसको नमक व सोडा मिले पानी में डालें। चाइनीज फूड टिप्स आजकल चाइनीज फूड का ट्रेंड लोगों में काफी बढ़ गया है। आमतौर पर चाइनीज फूड की सभी रेसिपीज में कुछ कॉमन इनग्रेडिएंट डाले जाते हैं, जो इसके लिए जरूरी होते हैं। ये टेस्टी होने के साथ ही सेहत के लिए भी फायदेमंद होते हैं, क्योंकि इसमें सभी तरह की मौसमी सब्जियां डाली जाती हैं, जो नए फ्लेवर में लोगों को काफी पसंद आते हैं।


 

Rakhi

bhai bahen ka pavitra tvhar

रक्षाबंधन पर्व सात्विक प्रेम का पर्व है। तीन नदियों के संगम की तरह यह दिन तीन उत्सवों का दिन है। श्रावणी पूर्णिमा, नारियल पूर्णिमा और रक्षाबंधन। अपनी आत्मा ही अपना भाई है और अपनी वृत्तियां ही अपनी बहन हैं। रक्षाबंधन पर्व पर राग द्वेष से ऊपर उठकर मैत्री का विकास करें एवं त्याग, संयम, प्रेम, मैत्री और अहिंसा को अपने जीवन में बनाने का संकल्प लें।

रक्षाबंधन पर्व का सांस्कृतिक महत्व है। भाई-बहन का रिश्ता अद्भुत स्नेह व आकर्षण का प्रतीक है। प्रत्येक रूप में पुरुष नारी का रक्षक है। प्रत्येक पुरुष अबला के आत्मसम्मान की रक्षा के साथ-साथ अन्य जीवों की भी रक्षा करें।

आज व्यक्ति ने पक्षी की तरह आकाश में उ़ड़ना सीख लिया है। आज आदमी ने मछली की तरह पानी में तैरना सीख लिया है, पर आदमी ने धरती पर इंसान की तरह चलना नहीं सीखा है। वह दूसरों की क्रिया की नकल बड़ी अच्छी तरह करता है किंतु स्वयं के असली रूप में आना भूल गया है।

रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के प्रेम का त्योहार है। प्रेम वासना के रूप में प्रदर्शित हो तो इंसान को रावण और प्रेम प्रार्थना के रूप में प्रदर्शित होने पर मानव को राम बना देता है।

मां का बच्चे के प्रति प्रेम ममतामयी, भाई-बहन का प्रेम अनुरागमयी, भाई-भाई के साथ प्रेम स्नेहमयी, समाज व संगठन में सौहार्दमयी, व्यक्ति का व्यक्ति से मित्रतामयी, पति का पत्नी के साथ वासनामयी, परमात्मा के प्रति भक्तिमयी और संतों के प्रति प्रेम वात्सल्यमयी हो जाता है।

श्रावण व श्रावक के बंधन का दिन है रक्षाबंधन। सावन के महीने में मनुष्य होता है पावन। बचपन में पिता सुरक्षा करता है, यौवन में पति, बुढ़ापे में भाई। भाई का एक ऐसा रिश्ता है जो बचपन से लेकर बुढ़ापे तक सभी बहनों की सुरक्षा देता है।

भारतीय संस्कृति में पर्वों का बहुत बड़ा महत्व होता है। पर्व यानी जो पूर्ण कर दे, तृप्त कर दे, उत्साहित कर दे। रक्षाबंधन इस देश का राष्ट्रीय पर्व है। लौकिक रिश्तों में आज के इस भयावह वातावरण में भी सबसे पावन यदि कोई रिश्ता है तो वो भाई-बहन का रिश्ता है।

राजकुमार उसके मन के


English: Flying Fox, also called Zip Line, ove...

 हिन्दी: घाटी को फ्लाइयिंग फॉक्स, या ज़िप लाइन, से पार करती हुई महिला – महरांगर्ह फ़ोर्ट (जोधपुर) के अंदर (Photo credit: DIVYA)

बचपन में मां एक राजकुमारी की कहानी सुनाया करती थी. जिसमें एक शाप के कारण राजकुमारी को अनाथ नौकरानी का जीवन जीना पड़ता है. राजकुमारी अक्सर रोती-बिसूरती रहती है, फिर एक दिन अचानक उसकी लाइफ बदलती है और एक राजकुमार उसे ढूंढता हुआ आता है और राजकुमारी से ब्याह कर अपने साथ ले जाता है……कहीं न कहीं बचपन से हर लड़की इस राजकुमारी की कहानी को अपना समझ इंतजार कर रही होती हैं उस राजकुमार का. उसे लगता है कि अचानक इंतजार खत्म होगा और एक दिन सचमुच कोई राजकुमार उन्हें अपने साथ ले जाएगा. खैर सपने-सपने ही रह जाते हैं बढ़ती उम्र के साथ यह सपने मन के किसी कोने में दबे रहते हैं और वास्तविक जिंदगी का राजकुमार हमारी लाइफ में आ जाता है. अपने मां-बाप के स्नेह की छांव से निकलकर लड़की अपने इस हमसफर के साथ नई जिंदगी की शुरुआत करती है. इस शख्स को वह पहचानती नहीं और न ही उसे जानने का दावा करती है, बावजूद इसके वह खुद को इस स्नेह संबंध के लिए पूरी तरह समर्पित कर देती है. यह राजकुमार लड़की के सपनों के विपरीत भी हुआ तो भी लड़की उसे दिल से स्वीकारती है. वह बस अपना प्यार देना चाहती है. पहले अपने पैरेंट्स और भाई-बहन को, फिर अपने पति को और फिर अपने बच्चों को…..इस पूरी जिंदगी को वह कुछ इसी तरह प्यार के नाम कर देती है. इस प्यार में बिना किसी अपेक्षा के केवल समर्पण होता है. पति सोशल पार्टिज में साथ नहीं लेकर जाता, मैरिज एनीवर्सरी याद नहीं रखता, मायके ले जाने की बात को अनसुना कर देता है…लड़की शिकायत भी करती है, लेकिन रात को सोने के बाद सुबह जब उठती है तो फिर किचन में अपनी गृहस्थी के कामों में उलझाए हुए नजर आती है. पति उसे किसी दिन ऑफिस से जल्दी घर आकर सरप्राइज दे दे, बस यही उसके लिए प्यार है. घर से मां गुजिया बनाकर भेज दे या पिता जी कुशल-क्षेम लेने के लिए फोन कर दें….बस वह इतने में ही संतुष्ट हो जाती है. अब तक वह जान चुकी होती है कि सफेद घोड़े पर बैठकर आने वाला राजकुमार केवल सपनों में ही होता है, वास्तविकता में नहीं. अपनी गृहस्थी के घोंसले को सजाने-संवारने के लिए वह हर संभव प्रयास करती है. कुछ इसी तरह समय गुजरता है. पति तरक्की करता है, बच्चे बड़े होते हैं और ऊंचे ओहदों तक पहुंच जाते हैं, लेकिन मन हमेशा उलझा रहता है कि क्या वास्तविक राजकुमार सच में उससे प्यार करता है. क्या उसे यह पता है कि मुझे नॉवेल्स पढऩा पसंद है, उसे मेरा फेवरेट कलर याद होगा क्या, हम पहली बार कब मिले थे उसे अब तक याद होगा……शायद नहीं. समय के साथ लड़की प्रश्नों के जवाब ढूंढना ही बंद कर देती है. बावजूद इसके सपनों का राजकुमार उसके मन के किसी कोने में जिंदा रहता है और वह फिर सारी चिंताएं भूलकर अपने पोते-पोतियों को ‘राजकुमार-राजकुमारी’ की कहानी सुनाने लगती है.

लक्की कुमार बघेल {तवेरा }
तवेरा -खपरी,गुंडरदेहि

2012 में शनि देव का सभी राशियों पर प्रभाव


2012 में शनि देव का सभी राशियों पर प्रभाव

Created on Monday, 02 January 2012 13:03
Written by पंडित दयानन्द शास्त्री

मेष राशि

आपकी राशि से 15 नवंबर 2011 से शनि, सप्तम राशि यानी तुला को प्रभावित कर रहा है। गोचर में गुरु आपकी राशि में ही विचरण कर रहा है। दोनों ही ग्रह 16 मई 2012 तक एक-दूसरे को ऊर्जा और शक्ति का आदान-प्रदान कर रहे हैं। शनि कुछ समय के लिए वक्रगति प्राप्त कर कन्या राशि में भी आएगा और उसी समय के आसपास गुरु भी वृष राशि में प्रवेश करेगा। शनि और बृहस्पति राशि चक्र के बहुत ही शक्तिशाली ग्रह हैं।

यदि आप उद्योगपति हैं या व्यवसायी हैं तो आप अपने वर्तमान कार्यक्षेत्र का विस्तार कर सकते हैं और यदि किसी और क्षेत्र में किस्मत आजमाना चाह रहे हैं तो इन दोनों ग्रहों की उपस्थिति आपको ऐसा करने में पूर्ण मददगार रहेगी।नई पार्टनरशिप या एसोसिएशन में भी प्रवेश किया जा सकता है। काफी यात्राएं करनी पड़ेंगीऔर आपकी उपलब्धियों में वृद्धि होगी।

जो लोग नौकरी में हैं उनके लिए स्थितियां अनुकूलता लिए रहेंगी। पदोन्नति या उन्नति भी हो सकती है। जो लोग नौकरी बदलना चाह रहे हैं तो उनको किसी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा।व्यक्तिगत स्तर पर चीजें सुचारू रूप से चलेंगी। जो लोग पार्टनर की खोज में हैं उन्हें आसानी से मिल जाएगा। पारिवारिक मामले नियंत्रण में रहेंगे और वातावरण आनंददायक बना रहेगा।

आर्थिक स्थिति रूप से यह समय बहुत अच्छा रहेगा। 16 मई 2012 को शनि वक्रगति से कन्या राशि में प्रवेश करेगा और 4 अगस्त 2012 को वापस तुला राशि में आएगा।बृहस्पति अगली राशि वृष में प्रवेश करेगा और लगभग एक साल वहां रहेगा। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि शनि छठे और बृहस्पति दूसरे भाव में विचरण रहेगा। यद्यपि यह समय बहुत ही छोटा है लेकिन यह बहुत ही फलदायी रहेगा।

किसी प्रोजेक्ट या असाइनमेंट के द्वारा अच्छा धन लाभ अर्जित होने की संभावना है।यदि कोई मसला कोर्ट-कचहरी में चल रहा है तो उसका फैसला आपके पक्ष में संपन्न हो सकता है। यदि किसी परीक्षा, प्रतियोगिता में सम्मिलित हो रहे हैं तो आपको सफलता प्राप्त होगी। विरोधियों पर विजय प्राप्त होगी।

नौकरी में अचानक उपलब्धि का योग भी बन रहा है। आपके मान-सम्मान में वृद्धि होगी।अगस्त दिसंबर 2012 के मध्य शनि तुला राशि में ही रहेगा। 9 अक्टूबर से 12 नवंबर 2012 तक शनि अस्त रहेगा बाकी समय शनि आपके पक्ष में रहेगा। आप ऐसे कुछ निर्णय ले सकते हैं जो उलटवार कर सकते हैं।

वृषभ राशि

आपकी राशि से शनि छठे भाव में विचरण कर रहा है क्योंकि तुला राशि वहीं है। क्रूर ग्रह जब छठे भाव से विचरण करते हैं तो बहुत अच्छे परिणाम देते हैं। प्रत्येक दृष्टि से शनि यहां बहुत कंर्फटेबल है, अतः इस भाव से विचरण करते समय वह स्वतः ही आपके लिए अतिरिक्त मददगार सिद्ध होंगे।

कॉर्पोरेट, व्यवसायी या उद्योगपति के रूप में अपनी योजनाओं और प्रोजेक्ट को आसानी से क्रियान्वित करने में सफल रहेंगे। यदि किसी प्रांत या देश से मदद की अपेक्षा कर रहे हैं तो वह आसानी से प्राप्त हो जाएगी और यदि विदेश जाने की योजना बना रहे हैं तो वहां भी आपको किसी प्रकार की समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा।

यदि नौकरी में हैं तो स्थितियों में अनुकूलन बना रहेगा और आपको कुछ अच्छे अवसर भी प्राप्त होंगे। जो लोग परीक्षा, प्रतियोगिता में सम्मिलित हो रहे हैं तो उन्हें सफलता प्राप्त होगी। पदोन्नति और बदलाव भी संभावित है। पैतृक संपत्ति को लेकर कोई मामला कोर्ट-कचहरी में चल रहा है तो उसका फैसला आपके पक्ष में संपन्न हो जाएगा। विरोधी चाहकर भी आपको हानि नहीं पहुंचा पाएंगे।

8 मई से 26 जून 2012 के मध्य शनि वक्री रहेगा। 16 मई 2012 को शनि वक्रगति से कन्या राशि में प्रवेश करेगा। इस दौरान अपने कैरियर से संबंधित निर्णय लेते समय आपको अतिरिक्त सावधान रहने की आवश्यकता है। नए निवेश पूर्ण जांच-परख के बाद ही करें।वाद-विवाद में न पड़ें अन्यथा हानि हो सकती है, जिससे सकारात्मक विचारधारा से बचा जा सकता है। यद्यपि आपको बहुत अच्छे अवसर प्राप्त होते रहेंगे और यदि आपका चुनाव उत्तम है तो यह समय आपके लिए काफी मददगार सिद्ध होगा। थोड़ी-सी सावधानी परिणामों की दिशा परिवर्तित कर सकती है।

जैसा कि पहले बताया गया है कि शनि जून में मार्गी होगा और 4 अगस्त को दोबारा तुला राशि में प्रवेश करेगा और साल के अंत तक इसी राशि में विचरण करेगा। 9 अक्टूबर से 12 नवंबर 2012 के मध्य शनि अस्त रहेगा। अस्त शनि की नकारात्मक विशेषताएं सामने आने लगती है जो उसमें वृहत स्तर पर मौजूद हैं।

जब शनि सूर्य की उपस्थिति से प्रभावित होता है तो शनि आक्रामक हो जाता है। इस दौरान आपको अत्याधिक सावधान रहने की आवश्यकता है। अन्यथा आप अपने कैरियर पार्टनर या एसोसिएट से अलग हो जाएंगे। वैसे शनि में आपके कैरियर ग्राफ में आमूलचूल परिवर्तन लाने की पूर्ण क्षमता है।

मिथुन राशि

शनि 15 नवंबर 2011से आपके पांचवें भाव में चल रहे हैं। शनि का कन्या में पिछला विचरण लगभग ढाई साल काफी थका देने वाला और हर कदम पर परेशानियां पैदा करने वाला था। शनि का पंचम भाव में विचरण उत्तम सिद्ध होगा और यह शनि की उच्च राशि तुला है। इस दौरान अपने रचनात्मक विचारों और प्रोजेक्टस के साथ आगे बढ़ने में मददगार सिद्ध होगा।8 फरवरी 2012 तक शनि तुला राशि में विचरण करेगा।

यदि आप एक्टिंग मॉडलिंग, सिंगिग, आर्ट, म्यूजिक, डांसिंग आदि से जु़ड़े हैं तो आप अपनी पहचान बनाने में सफल रहेंगे। आपको कुछ समुचित अवसर प्राप्त होंगे। यदि आप एक बिजनेसमैन हैं तो आप अपनी योजनाओं पर बिना किसी परेशानी के अमल करने में सफल रहेंगे।

नौकरीपेशा लोगों के लिए देश के साथ-साथ विदेश में भी आपको अच्छे अवसर प्राप्त होंगे। यदि प्रेममय हैं तो यह संबंध विवाह में परिणत हो सकता है। प्रतियोगी निराश नहीं होंगे। यदि रिसर्च आदि से जु़ड़े हैं तो इस भाव में शनि की यात्रा आपकी इच्छाओं की पूर्ति करने में काफी हद तक मददगार सिद्ध होगी।देश-विदेश की यात्राएं आपकी छवि और कैरियर को बनाने में अहम भूमिका अदा करेंगी।

शनि 8 फरवरी और 26 जून 2012 के मध्य वक्र गति से चलेगा। 16 मई 2012 को पिछली राशि कन्या में प्रवेश करेगा। यदि आप शनि की गति के साथ तारतम्य बनाए रखेंगे और परिणामों का अनुसरण करते रहेंगे तो यह आपको नकारात्मक रूप से प्रभावित नहीं करेगा।यदि आप इसे अनदेखा करते रहे तो फिर शनि आपको पकड़ लेगा। इसका प्रभाव भावनात्मक स्तर पर देखा जा सकता है और साथ ही जो योजनाएं कुछ समय पहले लगभग पूर्ण लग रही थी उनमें अचानक अवरोध आ सकता है।

जिन लोगों का आपकी गतिविधियों से काफी लेना-देना है उनके साथ भी वाद विवाद की स्थिति पनप सकती है। शनि 4 अगस्त 2012 को अपनी उच्चराशि तुला में वापस आ जाएगा और वर्ष के अंत तक वहीं रहेगा।शनि अस्त हो जाएगा जो 9 अक्टूबर से 12 नवंबर 2012 के मध्य होगा।

इस दौरान अधिकतर समय सूर्य नीचस्थ रहेगा और शनि के ऊपर से गुजरेगा। मुख्य प्रोजेक्ट्स के बारे में सावधानी बरतने की आवश्यकता है। पारिवारिक मसले उभर सकते हैं। बच्चों के साथ मतभेद हो सकते हैं। स्वास्थ्य की समस्याएं आपको या आपके परिवार को तंग कर सकती हैं।

कर्क राशि

शनि 15 नवंबर 2011 से 4 नवंबर 2014 के मध्य आपकी राशि से चतुर्थ भाव में भ्रमण करेगा। नवंबर 2011 से 8 फरवरी 2012 तक शनि तुला राशि में विचरण करेगा जो आपका चतुर्थ भाव है। चतुर्थ भाव आदमी का कंफर्ट जोन है और जब वह चतुर्थ भाव का विचार करता है तब पूर्ण शांति का अनुभव करता है।शायद यही कारण है कि कुंडली में चतुर्थ भाव मां, घर, अबाधित नींद और पूर्ण सुरक्षा का प्रतिनिधित्व करता है।

यद्यपि शनि यहां किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं करता लेकिन इसकी एक आदत है कि जो इन क्षेत्रों में जो कुछ भी गलत हो रहा है उसे उजागर करता है। शनि फरवरी 2012 से वक्री होगा जो 26 जून 2012 तक रहेगा।शनि अपनी पहली वाली राशि यानि कन्या में 16 मई को वापस आएगा और 4 अगस्त 2012 तक यहीं भ्रमण करेगा।

फरवरी से अगस्त के मध्य का समय वर्णित क्षेत्रों में काफी राहत प्रदान करेगा। यदि आप अपने कैरियर, व्यवसाय या उद्योग में किसी प्रकार की समस्या का सामना कर रहे हैं तो अपने मित्र-शुभचिंतकों की मदद से उसका हल किया जा सकता है।आपके लिए सलाह है कि अपने वर्तमान कार्य या प्रोजेक्ट में अपनी पूर्ण ऊर्जा लगाएं और परिश्रम से कार्य करें। अपव्यय पर नियंत्रण लगाएं।

यदि नौकरी की तलाश में हैं तो आपको नौकरी तलाश करने में कोई परेशानी नहीं होगी। जो लोग नौकरी में बदलाव या उन्नति के लिए प्रयासरत हैं तो उनको आशानुकूल परिणाम प्राप्त होंगे।पैतृक संपत्ति को लेकर यदि कोई मामला कोर्ट में विचाराधीन है तो उसका फैसला करने में ही भलाई है। कुछ आर्थिक तंगी हो सकती है।

4 अगस्त 2012 से साल के अंत तक शनि तुला राशि में ही रहेगा। इस दौर में आपको मिश्रित परिणाम ही प्राप्त होंगे। पूर्ण प्रयासों के बावजूद आपकी कुछ योजनाएं और प्रोजेक्ट्स आगे नहीं बढ़ पाएंगे।वर्तमान कार्यों में भी आपको समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। आपसी संबंधों में भी तनाव आ सकता है। कार्य का बोझ बढ़ेगा और कभी-कभी इसे पूर्ण कर पाना कठिन भी होगा।

9 अक्टूबर से 12 नवंबर 2012 के मध्य शनि अस्त होगा। इस दौरान आप मानसिक रूप से परेशान हो सकते हैं और समय-समय पर भावनात्मक मसले ऊभर सकते हैं जो आपको तंग करेंगे। स्थितियों को गहराई से समझें और मेडिटेशन पर जोर दें।

सिंह राशि

15 नवंबर 2011 से शनि आपके तृतीय भाव में विचरण कर रहा है यहां वह आने वाले ढाई वर्षों तक रहेगा। शनि जब तृतीय भाव में विचरण करता है जो वह यहां पर बहुत ही कंफर्टेबल होता है। नवंबर से 8 फरवरी 2012 के मध्य शनि सीधी गति से चलेगा और आपकी योजनाओं और प्रोजेक्ट्स को क्रियान्वित करने में आधारभूत मदद करेगा।

आपके कुछ अहम विचार क्रियान्वित होंगे और उनका विस्तार भी होगा। आपकी वर्तमान परियोजनाओं में लाभ की स्थितियां निर्मित होंगी। यदि नौकरी, पदोन्नति, उन्नति या बदलाव की तलाश में हैं तो आपको बहुत अच्छे अवसर प्राप्त होंगे। आप महत्वपूर्ण निर्णय लेंगे जिनसे आपकी प्रतिष्ठा में बढ़ोतरी होगी।प्रोफेशनल्स या जो लोग सृजनात्मक क्षेत्र से जु़ड़े हैं इस दौरान उनको बहुत अच्छे फल प्राप्त होंगे।

यात्राएं नए आयाम प्रदान करने वाली सिद्ध होंगी। कुछ महत्वपूर्ण लोगों से मुलाकात होगी। फरवरी और 26 जून 2012 के मध्य शनि वक्रगति से चलेगा। अपनी इस गति से चलते हुए 16 मई 2012 शनि अपनी पहली राशि कन्या राशि में प्रवेश करेगा और 4 अगस्त 2012 को फिर से तुला राशि में लौटेगा।

फरवरी और अगस्त के मध्य उत्थान और विकास की गतिविधियों में अत्यधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। यदि आप शांत चित्त और ठीक से विचार कर कार्य करेंगे तो यह दौर अच्छे गुजर जाएगा, अन्यथा इन क्षेत्रों में समस्याओं का सामना करने के लिए तैयार रहें।गलत निर्णय या अधिक खर्च के कारण धन की कमी महसूस होगी।

घरेलू मसले चिंता का विषय हो सकते हैं। अगस्त और दिसंबर 2012 के मध्य शनि तुला राशि में आगे बढ़ेगा जो आपकी राशि से सुंदर संयोग बनाएगा। कैरियर से संबंधित सभी समस्याओं के समाधान प्राप्त होंगे। बहुत अच्छे अवसर प्राप्त होंगे जो आपके पूरे व्यक्तित्व में परिवर्तन करने वाले सिद्ध होंगे।आर्थिक स्थिति में सुदृ़ढ़ता आएगी। प्रॉपर्टी, वाहन, सोना-चांदी में निवेश की संभावनाएं भी बलवती हो रही हैं। इस दौरान आपको काफी यात्राएं करना पड़ेंगी जो नए आयाम प्रदान करने वाली होंगी। 9 अक्टूबर से 12 नवंबर 2012 के मध्य शनि अस्त होगा इसलिए सावधानी बरतने की आवश्यकता है।

कन्या राशि

शनि आपकी राशि में पिछले ढाई वर्ष से चल रहा था। 15 नवंबर 2011 को शनि ने तुला राशि में प्रवेश किया है जो कि शनि की उच्च राशि है। यहां से आपको राहत की सांस मिलेगी। आपके लिए 15 नवंबर से 16 मई 2012 के मध्य का समय हर तरह से बहुत अच्छा है। धन संबंधी समस्याएं एक बाद एक हल होने से आपको काफी राहत प्राप्त होगी। रुके हुए धन की प्राप्ति भी हो सकती है।

आर्थिक और प्रोफेशनल क्षेत्र के विस्तार की संभावनाएं  भी बलवती हो रही हैं। इस दौरान आप किसी नए समझौते या पार्टनरशिप में प्रवेश कर सकते हैं। जो लोग नौकरी बदलना चाह रहे हैं तो उनको इच्छित नौकरी प्राप्त हो जाएगी। विदेश से भी कुछ अच्छे अनुबंध प्राप्त हो सकते हैं।

पारिवारिक स्तर पर उत्सव संपन्न हो सकता है या कोई शुभ समाचार प्राप्त हो सकता है।शनि वक्रगति से 16 मई 201 2 को वापिस आपकी राशि में लौटेगा जो यहां पर 4 अगस्त 2012 तक रहेगा। इस दौरान आपको अत्यधिक सचेत रहने की आवश्यकता है। निकटस्थ जनों के साथ मनमुटाव की स्थिति पनप सकती है। आर्थिक लेनदेन में पूर्ण सावधानी बरतने की नितांत आवश्यकता है।

अपने स्वास्थ्य को भी अनदेखा नहीं करना चाहिए।4 अगस्त 2012 को शनि तुला में प्रवेश करेगा और वर्षपर्यंत यहीं विचरण करेगा। अगस्त से 9 अक्टूबर के मध्य यह काफी मददगार सिद्ध होगा। आप अधूरे कार्यों को पूर्ण कर सकेंगे। कुछ योजनाएं और कार्य जो लगभग बंद हो गए थे उन्हें पुनर्जीवित किया जा सकता है भाग्य का सहयोग प्राप्त होगा और विदेश से लाभ प्राप्त होने से इंकार नहीं किया जा सकता। परिवार में कोई बड़ा उत्सव भी संपन्न हो सकता है।

9 अक्टूबर से 12 नवंबर के मध्य जब शनि अस्त होगा तो उस समय सतर्क रहने की आवश्यकता है। आपको सलाह दी जाती है कि इस दौरान महत्वपूर्ण निर्णय न लें। वैसे दैनिक कार्यों और जरूरतों की पूर्ति में समस्या नहीं आएगी। बाकी समय, 12 नवंबर से लेकर साल के अंत तक बहुत ही उत्साहवर्धक रहेगा।नई बातें घटने लगेंगी और जटिल समस्याओं के हल प्राप्त होंगे।

प्रोफेशनल और व्यक्तिगत जीवन सुचारु चलेगा। यह समय आमूलचूल परिवर्तन का है जहां बहुत सी नयी चीजें घटित होंगी जो आने वाले वर्षों में मददगार सिद्ध होंगी।वर्तमान में कन्या, तुला तथा वृश्चिक राशि वाले जातकों पर शनि की साढ़ेसाती चल रही है एवं वृषभ व मीन राशि वाले जातक ढैया से प्रभावित हैं। शनि की शांति तथा कृपा के लिए ये निर्दिष्ट उपाय कर सकते हैं।

व्रत : शनिवार का व्रत रखें।

व्रत के दिन शनिदेव की पूजा (कवच, स्तोत्र, मंत्र जप) करें। शनिवार व्रत कथा पढ़ना भी लाभकारी रहता है। व्रत में दिन में दूध, लस्सी तथा फलों के रस ग्रहण करें। सायंकाल हनुमानजी या भैरवजी का दर्शन करें। काले उड़द की खिचड़ी (काला नमक मिला सकते हैं) या उड़द की दाल का मीठा हलवा ग्रहण करें।

दान: शनि की प्रसन्नता के लिए उड़द, तेल, इन्द्रनील (नीलम), तिल, कुलथी, भैंस, लोह, दक्षिणा और श्याम वस्त्र दान करें। किसी भी शनि मंदिरों में शनि की वस्तुओं जैसे काले तिल, काली उड़द, काली राई, काले वस्त्र, लौह पात्र तथा गुड़ का दान करने से इच्छित फल की प्राप्ति होती है।

रत्न/धातु: शनिवार के दिन काले घोड़े की नाल या नाव की सतह की कील का बना छल्ला मध्यमा में धारण करें।

औषधि: प्रति शनिवार सुरमा, काले तिल, सौंफ, नागरमोथा और लोध मिले हुए जल से स्नान करें।

तुला राशि:

शनि 15 नवंबर 2011 को आपकी राशि में अगले ढाई साल के लिए आ गया है। यह आपकी राशि से 30 वर्षों के बाद गुजर रहा है।जिस दिन शनि तुला राशि में प्रवेश करेगा उससे 16 मई 2012 तक आपकी राशि में रहेगा। शनि 8 फरवरी 2012 को वक्रगति को प्राप्त होगा और 16 मई 2012 को कन्या राशि में प्रवेश करेगा। इस दौरान शनि दो प्रकार के परिणाम प्रदान करेगा।

पहला पैटर्न नवंबर से फरवरी 2012 तक होगा। आपको अपने विचारों को क्रियान्वित करने में समस्याओं का सामना करना पड़ेगा जिनमें काफी प्रगति हो चुकी थी। संतोषजनक परिणाम प्राप्त करने के लिए आपको अपनी योजनाओं और कार्य प्रणाली में फेरबदल करने की नितांत आवश्यकता है।बिना पूर्व सोच विचार के कोई नया निवेश नहीं करना चाहिए। शनि 8 फरवरी 2012 को वक्री हो जाएगा और 16 मई 2012 को कन्या राशि में प्रवेश करेगा। इस दौरान आपको सतर्क रहने की आवश्यकता है।

इस समय लिए गए गलत निर्णय महंगे साबित होंगे।आपका या किसी परिजन का स्वास्थ्य चिंता का विषय हो सकता है। जो लोग स्टॉक मार्केट से जु़ड़े हैं उन्हें अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत है। 16 मई से 4 अगस्त 2012 के मध्य का समय एक अच्छी शुरूआत देगा। आपकी कुछ योजनाएं बिना किसी झंझट के क्रियान्वित हो सकती है।मित्र शुभचिंतकों का पूर्ण सहयोग प्राप्त होगा।

लंबी दूरी की यात्राएं आपके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगी। संपत्ति संबंधी यदि कोई मामला कोर्ट में चल रहा है तो उसको फैसला आपके पक्ष में हो सकता है।शनि 4 अगस्त 2012 को वापिस तुला राशि में आ जाएगा और फिर पूरे साल यहीं पर रहेगा। इस दौरान शनि अधिकतर अच्छे परिणाम ही प्रदान करेगा।

जो बाधाएं और झंझट पहले आ रहे थे वो अब तंग नहीं करेंगे। 9 अक्टूबर से 12 नवंबर 2012 के मध्य सावधानी बरतने की आवश्यकता है।साधारण रूप से यह उत्साहवर्धक समय है।

आपको परिवार और बच्चों पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। यदि आप उनके साथ समय व्यतीत करेंगे और इन मसलों पर ध्यान देंगे तो ये आपके लिए मददगार सिद्ध होंगे।परिजनों के साथ अर्थपूर्ण बातचीत करेंगे और उन्हें कार्यों में लगाएंगे तो इससे आपको अपनी व्यक्तिगत समस्याओं को हल करने में काफी मदद मिलेगी।

वृश्चिक राशि:

शनि 15 नवंबर से 8 फरवरी 2012 के मध्य सीधी गति से चलेगा और तुला राशि से गुजरेगा जो आपका बारहवां भाव है। जहां तक योजना और स्कीम बनाने और नए वातावरण में घुलने मिलने का संबंध है तो इसके लिए यह बहुत अच्छा समय है। आप किसी बड़े कार्य की योजना बना सकते है या अपनी रिसर्च प्रारंभ कर सकते हैं जो बीच में रुक गई थी।

लंबे समय की सारी गतिविधियां इस समय प्रारंभ की जा सकती हैं। जहां तक वर्तमान प्रोफेशन या कैरियर का संबंध है वहां स्थितियों को अपने पक्ष में करने के लिए आपको अतिरिक्त ध्यान देने की आवश्यकता है। कभी-कभी विघ्न और बाधाओं के चुनौतियां आएंगी लेकिन यदि आप सजग हैं तो आप इन कठिनाईयों से आसानी से निपट लेंगे।

धन संबंधी मामलों में सावधानी बरतें। यदि प्रॉपर्टी या फिक्स्ड एसेट्स में निवेश करने की योजना बना रहे हैं तो ऐसा करने के लिए समय अच्छा है।फरवरी और अगस्त के मध्य आपको कई अवसर प्राप्त होंगे और अलग प्रकार की स्थिति उभर सकती हैं। फरवरी के बाद अचानक धन के आगमन में वृद्धि होगी। आपकी कुछ योजनाएं जिन पर आप पिछले काफी समय से काम कर रहे थे वे अब चालू हो सकती हैं।आपके सामाजिक और प्रोफेशनल दायरे का विस्तार होगा और यह आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि करेगा।

मित्र और यात्रा कारगर सिद्ध होंगे। पारिवारिक जीवन शांतिपूर्ण रहेगा और परिवार में कोई उत्सव भी संपन्न हो सकता है। जो लोग नौकरी में बदलाव चाह रहे हैं उन्हें आसानी से अच्छी नौकरी प्राप्त हो जाएगी।शनि 4 अगस्त 2012 को तुला राशि में प्रवेश करेगा और कुल मिलाकर यह शनि आपको अच्छे परिणाम ही देगा।

यदि आप ठीक से आंकलन करेंगे तो निश्चित रूप से कुछ कमियां मिलेगी जिनको दूर करने की नितांत आवश्यकता है।यदि आप समय पर ऐसा कर पाएं तो आपके लिए अति उत्तम कार्य होगा और यदि आपने ऐसा नहीं किया तो यह आपके लिए महंगा साबित होगा। शनि 9 अक्टूबर और 12 नवंबर 2012 के मध्य अस्त रहेगा। इस समय सावधानी रखें, विशेषकर उच्चाधिकारी और उन लोगों से व्यवहार करते समय जो आपके जीवन में बहुत महत्व रखते हैं। अपने व्यवहार के प्रति सजग रहें।

धनु राशि:

शनि का बदलाव आपके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा। शनि यहां आपकी राशि से सेक्सटाइल बना रहा है जिसको बहुत अच्छा माना जाता है। जब ग्रहों के मध्य सेक्सटाइल बनता है तो उस समय को जीवन के उत्तम समय में गिना जाता है।15 नवंबर से 8 फरवरी 2012 के दौरान शनि सीधी गति से चलेगा। यह समय बहुत महत्वपूर्ण है। आपकी कोई महत्वाकांक्षी योजना प्रारंभ हो सकती है। एक कार्पोरेट बिजनेसमैन और उद्योगपति के रूप में आप बहुत अच्छा प्रदर्शन करेंगे।

यदि कार्पोरेट से बड़े फाइनेंस की तलाश में हैं तो आपको निराश नहीं होना पड़ेगा। नौकरी की तलाश में हैं तो आपको सफलता प्राप्त होगी।8 फरवरी 2012 से 26 जून 2012 के मध्य का समय आपके लिए विभिन्न रूप में प्रासंगिक है। यह समय आपको चेतावनी देता है कि जो कुछ कमियां रह गई है उन्हें दूर करने की आवश्यकता है।

एक तरह से यह भगवान के द्वारा निर्मित स्थिति है जो उनमें लिप्त न होकर अपनी कमियों को दूर करने में मदद करती है। अपनी योजनाएं दोबारा बनाई जा सकती है और अपने खर्चों में कमी करनी चाहिए और स्थितियां को ठीक करना चाहिए। इस दौरान किसी संस्थान या सरकार से मदद चाह रहे हैं तो वो भी आसानी मिल जाएगी।

नौकरीपेशा लोगों की पदोन्नति या नौकरी में बदलाव हो सकता है।26 जून 201 2 को शनि डायरेक्टीव यानी मार्गी हो जाएगा और 4 अगस्त 2012 को दोबारा तुला राशि में प्रवेश कर जाएगा। यह बहुत अच्छा समय है जो आपकी प्रोफेशनल गतिविधियों को आवश्यक गति प्रदान करेगा।शनि 4 अगस्त 2012 को तुला राशि में प्रवेश करेगा और वर्ष के अंत तक इसी राशि में रहेगा।

जैसे ही यह तुला राशि में वापिस आ जाएगा तो यह अच्छे संबंध स्थापित करना प्रारम्भ कर देता है। महत्वाकांक्षी योजनाएं प्रारंभ की जा सकती हैं और पूर्व में किए गए प्रयास अब उत्साहवर्धक परिणाम देने लगेंगे।धन का अच्छा आगमन होगा और आपकी आर्थिक स्थिति काफी मजबूत होगी। विदेश की काफी यात्राएं होंगी जो बहुत ही फलदायी सिद्ध होंगी।

पारिवारिक जीवन सौहार्दपूर्ण और शांतिपूर्ण रहेगा और परिवार में कोई उत्सव भी संपन्न हो सकता है। आपके सामाजिक दायरे का विस्तार होगा और आपके व्यक्तित्व में भी बढ़ोतरी होगी। शनि 9 अक्टूबर से 12 नवंबर 2012 तक अस्त रहेगा। यह समय बहुत अच्छा नहीं है।

मकर राशि:

आपकी राशि में शनि 15 नवंबर से 8 फरवरी 2012 के मध्य डायरेक्टीव यानी मार्गी रहेगा। इस समय आप अति व्यस्त रहेंगे। आपके दिमाग में नए विचार आएंगे जिन्हें आप कार्यरूप भी प्रदान करना चाहेंगे। इस संबंध में आप बाहर से किसी की मदद की उम्मीद करते हैं तो वह भी आसानी से मिल जाएगी। व्यवसाय से जु़ड़े हैं तो वहां आप बहुत अच्छा करेंगे।इस दौरान आप प्रॉपर्टी या वाहन आदि खरीदने का भी मन बना सकते हैं।

पैतृक संपत्ति को लेकर यदि कोई मामला कोर्ट कचहरी में चल रहा है तो उसका फैसला आपके पक्ष में संपन्न हो जाएगा। आपको काफी यात्राएं करना पड़ेंगी और वे लाभदायक भी रहेंगी। आर्थिक स्थिति अच्छी बनी रहेगी।8 फरवरी 2012 को शनि वक्रगति को प्राप्त होगा और वक्रगति से चलते हुए 16 मई 2012 को कन्या राशि में प्रवेश करेगा। फरवरी और जून के मध्य आपको बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त नहीं होंगे।

अपनी योजना और स्कीम और आवश्यक समझौता करने में आपको अतिरिक्त सावधानी बरतने की आवश्यकता है। यदि किसी प्रतियोगिता में सम्मिलित हो रहे हैं तो अपने प्रयासों में गहनता लाने की पूर्ण आवश्यकता है।शनि 26 जून 2012 को डायरेक्ट हो जाएगा और 4 अगस्त 2012 को फिर से तुला राशि में प्रवेश करेगा। यह एक बहुत अच्छा पीरियड है जो आपमें पैदा हुए भय को दूर करने में मदद करेगा।कुछ नए लोगों से आपकी मुलाकात होगी जो आपकी स्कीम और प्रोजेक्ट्स में मददगार रहेंगे।

परिवार में विवाह या शिशु जन्म भी संपन्न हो सकता है।4 अगस्त 2012 को शनि तुला राशि में प्रवेश करेगा और साल के अंत तक वहीं विचरण करेगा। यह माह आपको अच्छा परिणाम प्रदान करेगा। प्रोफेशनल्स, आर्टिस्ट, उशेगपति इस समय बहुत तरी करेंगे। यदि विदेश में नौकरी या शिक्षा प्राप्त करना चाह रहे हैं तो आपका यह कार्य भी बन जाएगा।प्रॉपर्टी संबंधित लम्बित मसले आपसी सहमति से हल हो जाएंगे।

यदि सरकार या किसी वित्त संस्थान से लोन लेना चाह रहे हैं तो आपका कार्य सिद्ध होगा। आप अपनी एक अलग ही छवि बनाने में सफल रहेंगे जो आने वाले समय में मददगार सिद्ध होगी।शनि 9 अक्टूबर से 12 नवंबर 2012 के मध्य अस्त रहेगा। अधिकतर अस्त शनि इच्छित परिणाम नहीं देता। आपको इस दौरान अति सतर्क रहने की आवश्यकता है

कुंभ राशि:

अब चिंता की कोई बात नहीं अब यह आपके भाग्य भाव प्रोत्साहित करेगा और यहां अगले ढाई साल रहेगा। 15 नवंबर से 8 फरवरी के मध्य जब शनि सीधी गति से चलेगा तब यह आपके लिए अति महत्वपूर्ण रहेगा। भाग्य आपका साथ देगा। आपकी महत्वाकांक्षी योजनाएं जिनमें पहले अवरोध आ गए थे फिर से प्रारंभ हो जाएंगी।जो लोग बिजनेस, कॉर्पोरेट या अन्य गतिविधियों से जु़ड़े हैं उन्हें उत्साहवर्धक परिणाम प्राप्त होंगे। यदि विदेश में कुछ करने की योजना बना रहे हैं तो आपको सफलता प्राप्त होगी।

यह पीरियड आपको अति व्यस्त रखेगा और धनागमन में भी सुधार होगा।यदि किसी प्रतियोगिता में बैठ रहे हैं तो आपको सफलता प्राप्त होगी। पदोन्नति या नौकरी में बदलाव की स्थितियां भी बन रही हैं। यदि पैतृक संपत्ति संबंधी कोई मामला कोर्ट कचहरी में विचाराधीन है तो उसका फैसला आपके पक्ष में हो जाएगा। पारिवारिक वातावरण सौहार्द्रपूर्ण रहेगा और परिवार में कोई समारोह भी संपन्न हो सकता है।

शनि 8 फरवरी को वक्री होकर 16 मई 2012 को कन्या राशि में प्रवेश करेगा। अचानक आपकी गतिविधियों में बाधा उत्पन्न हो सकती है। ऐसा प्रतीत होगा कि जो चीजें आसानी से आगे बढ़ रही थी उनमें अचानक अजीबोगरीब स्थिति या चुनौतियां आ गई हैं। वास्तविक रूप से ये बुरा फेज इंगित करती हैं।

चेतावनी के ये संकेत केवल आपको मदद करने के लिए हैं।आपको कुछ यात्राएं भी करना पड़ेंगी और ये यात्राएं आपके पक्ष में वातावरण भी निर्मित करेंगी। 16 मई से 4 अगस्त 2012 के मध्य शनि कन्या राशि में वापिस जाएगा और इस दौरान वहीं पर रहेगा। जहां तक प्रोफेशनल कार्यों का संबंध है इस पीरियड में आपको एक प्रकार की असहजता का एहसास होगा।

आर्थिक तंगी भी झेलनी पड़ सकती है।आपके चलते प्रोजेक्ट्स में अवरोध आ सकते हैं। परिजन का व्यवहार या स्वास्थ्य चिंता का विषय हो सकता है। स्टॉक मार्केट में ज्यादा निर्लिप्तता आपको नकारात्मक परिणाम ही प्रदान करेगी।

4 अगस्त 2012 को दोबारा तुला राशि में शनि आएगा। कुल मिलाकर यह बहुत अच्छा पीरियड है। स्थितियों में परिवर्तन आने लगेगा और जो समस्याएं पहले आई थीं उनके समाधान मिलने लगेंगे। परिणाम का पैटर्न उत्साहवर्धक रहेगा। धन आगमन में भी काफी वृद्धि होगी। भाग्य भी आपका साथ देगा।

मीन राशि:

15 नवंबर 2011 से शनि तुला राशि में विचरण करेगा और 8 फरवरी 2012 तक आगे ही बढ़ता रहेगा। इस दौरान शनि गोचर में आपकी राशि से अच्छा कोण नहीं बनाएगा। यह समय इंगित करता है कि अब आपको कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। आपको कुछ अच्छे अवसर प्राप्त होंगे जो आपको अत्यधिक उत्साहित करेंगे।मूर्तरूप से उनको क्रियान्वित करना आपको सहज प्रतीत होगा लेकिन वैसा होगा नहीं।

यह स्थिति एक तरफ आपको प्रेरित करेगी और आप इन चुनौतियों को सामना करने के लिए तैयार हो जाएंगे। आपको सलाह दी जाती है अपने धन या एसेट्स का उपयोग बिना जांच-परख कर न करें और अपनी बुद्धिमत्ता का अधिकतम उपयोग करें।

8 फरवरी से 4 अगस्त के मध्य आपको काफी राहत प्राप्त होगी। आपकी कुछ योजनाएं और प्रोजेक्ट्स जो पहले काफी प्रयासों के बाद ठीक नहीं चल रहे थे अब वो गति पकड़ेंगे।नई आशाएं जगेंगी और अपनी क्षमताओं पर विश्वास भी कायम होगा। कोई नई एसोसिएशन या पार्टनरशिप हो सकती है जो बहुत अच्छे परिणाम देगी। प्रोफेशनल्स, कॉर्पोरेट इच्छानुकूल परिणाम प्राप्त करने में सफल रहेंगे।

जो लोग परीक्षा, प्रतियोगिता में सम्मिलित हो रहे हैं उन्हें मनोकूल परिणाम प्राप्त होंगे। अविवाहित हैं तो विवाह होने की भी पूर्ण संभावना है। मित्र-शुभचिंतकों का पूर्ण सहयोग बना रहेगा। आपको बहुत सी यात्राएं करना पड़ेंगी जो लाभदायक सिद्ध होंगी। सामाजिक गतिविधियों में वृद्धि होगी।4 अगस्त 2012 को शनि वापिस तुला राशि में आ जाएगा और फिर वर्षपर्यंत वहीं रहेगा।

आपकी कुछ योजनाओं में आशानुकूल प्रगति होगी लेकिन कुछ जस की तस बनी रहेंगी। यह स्थिति निश्चित रूप से आपको कई बार चिंतित करेंगी। कभी-कभी आप यह सोचकर हैरान हो जाएंगे कि मैंने गलती कहां की है और जिसका उत्तर भी आपको आसानी से प्राप्त नहीं होगा।कभी-कभी जीवन में ऐसी स्थितियां भी पैदा हो जाती हैं कि अलाभकारी कार्यों को बंद कर, फलदायी योजनाओं पर ही ध्यान केंद्रित करने में भलाई है। आपके कुछ विश्वासपात्र मित्र और शुभचिंतक बिना स्वार्थ भाव के समय-समय पर आपको अपना पूर्ण सहयोग प्रदान करते रहेंगे। यात्रा करने के बहुत से अवसर आएंगे।

—–शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए ये करें उपाय—-

—- शनि दिन में शनि चालीसा का पाठ, शनि मंत्रों का जाप एवं हनुमान चालीसा का पाठ करें।

—- इस दिन पीपल के पेड़ पर सात प्रकार का अनाज चढ़ाएं और सरसों के तेल का दीपक जलाएं।

—– तिल से बने पकवान, उड़द से बने पकवान गरीबों को दान करें।

—– उड़द दाल की खिचड़ी दरिद्रनारायण को दान करें।

——- अमावस्या की रात्रि में 8 बादाम और 8 काजल की डिब्बी काले वस्त्र में बांधकर संदूक में रखें।

—– शनि यंत्र, शनि लॉकेट, काले घोड़े की नाल का छल्ला धारण करें।

—– इस दिन नीलम या कटैला रत्न धारण करें। जो फल प्रदान करता है।

—– काले रंग का श्वान इस दिन से पालें और उसकी सेवा करें।

——शनिवार का व्रत यूं तो आप वर्ष के किसी भी शनिवार के दिन शुरू कर सकते हैं। इस व्रत का पालन करने वाले को शनिवार के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके शनिदेव की प्रतिमा की विधि सहित पूजन करनी चाहिए।

—–शनिवार के दिन शनि देव की विशेष पूजा होती है। शहर के हर छोटे बड़े शनि मंदिर में सुबह ही आपको शनि भक्त देखने को मिल जाएंगे।

—- शनि भक्तों को इस दिन शनि मंदिर में जाकर शनि देव को नीले लाजवंती का फूल, तिल, तेल, गु़ड़ अर्पण करना चाहिए। शनि देव के नाम से दीपोत्सर्ग करना चाहिए।

—–शनिवार के दिन शनिदेव की पूजा के पश्चात उनसे अपने अपराधों एवं जाने-अनजाने जो भी आपसे पाप कर्म हुआ हो उसके लिए क्षमा याचना करनी चाहिए।

—–शनि महाराज की पूजा के पश्चात राहु और केतु की पूजा भी करनी चाहिए।

—–इस दिन शनि भक्तों को पीपल में जल देना चाहिए और पीपल में सूत्र बांधकर सात बार परिक्रमा करनी चाहिए।

—–शनिवार के दिन भक्तों को शनि महाराज के नाम से व्रत रखना चाहिए।

—- शनि की शांति के लिए नीलम को तभी पहना जा सकता है।

—–शनिवार को सायंकाल पीपल वृक्ष के चारों ओर 7 बार कच्चा सूत लपेटें, इस समय शनि के किसी मंत्र का जप करते रहें। फिर पीपल के नीचे सरसों के तेल का दीपक प्रज्ज्वलित करें तथा ज्ञात अज्ञात अपराधों के लिए क्षमा मांगें।

——–शनिवार को अपने हाथ की नाप का 19 हाथ काला धागा माला बनाकर पहनें।

—-शनिश्वर के भक्तों को संध्या काल में शनि मंदिर में जाकर दीप भेंट करना चाहिए और उड़द दाल में खिचड़ी बनाकर शनि महाराज को भोग लगाना चाहिए। शनिदेव का आशीर्वाद लेने के पश्चात आपको प्रसाद स्वरूप खिचड़ी खाना चाहिए।

—–सूर्यपुत्र शनिदेव की प्रसन्नता हेतु इस दिन काली चींटियों को गु़ड़ एवं आटा देना चाहिए।

—–इस दिन काले रंग का वस्त्र धारण करना चाहिए।

—-श्रावण मास में शनिवार का व्रत प्रारंभ करना

जन्म कुंडली का पहला घर और उसके प्रभाव

भारतीय ज्योतिष में कुंडली के पहले घर को लग्न भाव अथवा लग्न भी कहा जाता है तथा भारतीय वैदिक ज्योतिष के अनुसार इसे कुंडली के बारह घरों में सबसे महत्त्वपूर्ण घर माना जाता है। किसी भी व्यक्ति विशेष के जन्म के समय उसके जन्म स्थान पर आकाश में उदित राशि को उस व्यक्ति का लग्न माना जाता है तथा इस राशि अर्थात लग्न अथवा लग्न राशि को उस व्यक्ति की कुंडली बनाते समय पहले घर में स्थान दिया जाता है।

इसके बाद आने वाली राशियों को कुंडली में क्रमश: दूसरे, तीसरे — बारहवें घर में स्थान दिया जाता है। उदाहरण के तौर पर यदि किसी व्यक्ति के जन्म के समय आकाशमंडल में मेष राशि का उदय हो रहा है तो मेष राशि उस व्यक्ति का लग्न कहलाएगी तथा इसे उस व्यक्ति की जन्म कुंडली के पहले घर में स्थान दिया जाएगा तथा मेष राशि के बाद आने वाली राशियों को वृष से लेकर मीन तक क्रमश: दूसरे से लेकर बारहवें घर में स्थान  दिया जाएगा।

किसी भी कुंडली में लग्न स्थान अथवा पहले घर  का महत्त्व सबसे अधिक होता है तथा कुंडली धारक के जीवन के लगभग सभी महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में इस घर का प्रभाव पाया जाता है। कुंडली धारक के स्वभाव तथा चरित्र के बारे में जानने के लिए पहला घर विशेष महत्त्व रखता है तथा इस घर से कुंडली धारक की आयु, स्वास्थ्य, व्यवसाय, सामाजिक प्रतिष्ठा तथा अन्य कई महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों के बारे में पता चलता है। कुंडली का पहला घर शरीर के अंगों में सिर, मस्तिष्क तथा इसके आस-पास के हिस्सों को दर्शाता है तथा इस घर पर किसी भी बुरे ग्रह का प्रभाव शरीर के इन अंगों से संबंधित रोगों, चोटों अथवा परेशानियों का कारण बन सकता है।

कुंडली का पहला घर हमें पिछले जन्मों में संचित किए गए अच्छे-बुरे कर्मों तथा वर्तमान जीवन में इन कर्मों के कारण मिलने वाले फलों के बारे में भी बताता है। यह घर व्यक्ति की सामाजिक प्राप्तियों तथा उसके व्यवसाय तथा जीवन में उसके अपने प्रयासों से मिलने वाली सफलताओं के बारे में भी  बताता है।

पहले घर से व्यक्ति के वैवाहिक जीवन, सुखों के भोग,  बौद्धिक स्तर, मानसिक विकास, स्वभाव की कोमलता अथवा कठोरता तथा अन्य बहुत सारे विषयों के बारे में भी जानकारी प्राप्त होती है। पहला घर व्यक्ति के स्वाभिमान तथा अहंकार की सीमा भी दर्शाता है।

कुंडली के पहले घर पर एक या एक से अधिक बुरे ग्रहों का प्रभाव कुंडली धारक के जीवन के लगभग किसी भी क्षेत्र में समस्या का कारण बन सकता है तथा कुंडली के पहले घर पर एक या एक से अधिक अच्छे ग्रहों का प्रभाव कुंडली धारक के जीवन के किसी भी क्षेत्र में बड़ी सफलताओं, उपलब्धियों तथा खुशियों का कारण बन सकता है। इस लिए किसी भी व्यक्ति की कुंडली देखते समय उसकी कुंडली के पहले घर तथा उससे जुड़े समस्त तथ्यों पर बहुत ही ध्यानपूर्वक विचार करना चाहिए।

आइये जाने की कैसा हो हमारा नया साल

एक जनवरी से प्रारम्भ होने वाली काल गणना को हम ईस्वी सन् के नाम से जानते हैं जिसका सम्बन्ध ईसाई जगत् व ईसा मसीह से है। इसे रोम के सम्राट जूलियस सीजर द्वारा ईसा के जन्म के तीन वर्ष बाद प्रचलन में लाया गया। भारत में ईस्वी सम्वत् का प्रचलन अग्रेंजी शासकों ने 1752 में किया।

अधिकांश राष्ट्रो के ईसाई होने और अग्रेंजों के विश्वव्यापी प्रभुत्व के कारण ही इसे विश्व के अनेक देशों ने अपनाया। 1752 से पहले ईस्वी सन् 25 मार्च से शुरू होता था किन्तु 18वीं सदी से इसकी शुरूआत एक जनवरी से होने लगी। ईस्वी कलेण्डर के महीनों के नामा में प्रथम छ: माह यानि जनवरी से जून रोमन देवताओं (जोनस, मार्स व मया इत्यादि) के नाम पर हैं।

जुलाई और अगस्त रोम के सम्राट जूलियस सीजर तथा उनके पौत्र आगस्टस के नाम पर तथा सितम्बर से दिसम्बर तक रोमन संवत् के मासों के आधार पर रखे गये। जुलाई और अगस्त, क्योंकि सम्राटों के नाम पर थे इसलिए, दोनों ही इकत्तीस दिनों के माने गये अन्यथा कोई भी दो मास 31 दिनों या लगातार बराबर दिनों की संख्या वाले नहीं हैं।

ईसा से 753 वर्ष पहले रोम नगर की स्थापना के समय रोमन संवत् प्रारम्भ हुआ जिसके मात्र दस माह व 304 दिन होते थे। इसके 53 साल बाद वहां के सम्राट नूमा पाम्पीसियस ने जनवरी और फरवरी दो माह और जोड़कर इसे 355 दिनों का बना दिया। ईसा के जन्म से 46 वर्ष पहले जूलियस सीजन ने इसे 365 दिन का बना दिया। सन् 1582 ई. में पोप ग्रेगरी ने आदेश जारी किया कि इस मास के 04 अक्टूबर को इस वर्ष का 14 अक्टूबर समझा जाये। आखिर क्या आधार है इस काल गणना का? यह तो ग्रहों व नक्षत्रों की स्थिति पर आधारित होनी चाहिए।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् नवम्बर 1952 में वैज्ञानिक और औद्योगिक परिषद के द्वारा पंचांग सुधार समिति की स्थापना की गयी। समिति ने 1955 में सौंपी अपनी रिपोर्ट में विक्रमी संवत को भी स्वीकार करने की सिफारिश की थी। किन्तु, तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू के आग्रह पर ग्रेगेरियन कलेण्डर को ही सरकारी कामकाज हेतु उपयुक्त मानकर 22 मार्च 1957 को इसे राष्ट्रीय कलेण्डर के रूप में स्वीकार कर लिया गया।

ग्रेगेरियन कलेण्डर की काल गणना मात्र दो हजार वर्षों के अति अल्प समय को दर्शाती है। जबकि यूनान की काल गणना 3581 वर्ष, रोम की वर्ष यहूदी र् र्, मिस्त्र की , पारसी तथा चीन की वर्ष पुरानी है। इन सबसे अलग यदि भारतीय काल गणना की बात करें तो हमारे ज्योतिष के अनुसार पृथ्वी की आयु एक अरब 97 करोड़, 39 लाख 49 हजार वर्ष है। जिसके व्यापक प्रमाण हमारे पास उपलब्ध हैं। हमारे प्रचीन ग्रंथों में एक-एक पल की गणना की गयी है।

जिस प्रकार ईस्वी सम्वत् का सम्बन्ध ईसा जगत से है उसी प्रकार हिजरी सम्वत् का सम्बन्ध मुस्लिम जगत और हजरत मुहम्मद साहब से है। किन्तु विक्रमी सम्वत् का सम्बन्ध किसी भी धर्म से न हो कर सारे विश्व की प्रकृति, खगोल सिध्दांत व ब्रह्माण्ड के ग्रहों व नक्षत्रों से है। इसलिए भारतीय काल गणना पंथ निरपेक्ष होने के साथ सृष्टि की रचना व राष्ट्र की गौरवशाली परम्पराओं को दर्शाती है। इतना ही नहीं, ब्रह्माण्ड के सबसे पुरातन ग्रंथ वेदों में भी इसका वर्णन है। नव संवत् यानि संवत्सरों का वर्णन यजुर्वेद के 27वें व 30वें अध्याय के मंत्र क्रमांक क्रमश: 45 व 15 में विस्तार से दिया गया है।

विश्व में सौर मण्डल के ग्रहों व नक्षत्रों की चाल व निरन्तर बदलती उनकी स्थिति पर ही हमारे दिन, महीने, साल और उनके सूक्ष्मतम भाग आधारित होते हैं।

इसी वैज्ञानिक आधार के कारण ही पाश्चात्य देशों के अंधानुकरण के बावजूद, चाहे बच्चे के गर्भाधान की बात हो, जन्म की बात हो, नामकरण की बात हो, गृह प्रवेश या व्यापार प्रारम्भ करने की बात हो, सभी में हम एक कुशल पंडित के पास जाकर शुभ लग्न व मुहूर्त पूछते हैं।

और तो और, देश के बडे से बडे राजनेता भी सत्तासीन होने के लिए सबसे पहले एक अच्छे मुहूर्त का इंतजार करते हैं जो कि विशुध्द रूप से विक्रमी संवत् के पंचांग पर आधारित होता है। भारतीय मान्यतानुसार कोई भी काम यदि शुभ मुहूर्त में प्रारम्भ किया जाये तो उसकी सफलता में चार चांद लग जाते हैं।

वैसे भी भारतीय संस्कृति श्रेष्ठता की उपासक है। जो प्रसंग समाज में हर्ष व उल्लास जगाते हुए एक सही दिशा प्रदान करते हैं उन सभी को हम उत्सव के रूप में मनाते हैं। राष्ट्र के स्वाभिमान व देश प्रेम को जगाने वाले अनेक प्रसंग चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से जुडे हुए हैं। यह वह दिन है जिस दिन से भारतीय नव वर्ष प्रारम्भ होता है। आइये इस दिन की महानता के प्रसंगों को देखते हैं:-

क्या हें ऐतिहासिक महत्व—

  • वर्ष पूर्व इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्मा जी ने जगत की रचना प्रारंभ की।
  • प्रभु श्री राम, चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य व धर्म राज युधिष्ठिर का राज्यभिषेक राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ था।
  • शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात्, नवरात्र स्थापना का पहला दिन यही है।
  • प्रभु राम के जन्मदिन रामनवमी से पूर्व नौ दिन का श्री राम महोत्सव मनाने का प्रथम दिन।
  • आर्य समाज स्थापना दिवस, सिख परंपरा के द्वितीय गुरू अंगददेव जी, संत झूलेलाल व राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक डा0 केशव राव बलीराम हैडगेवार का जन्मदिवस।

जानिए प्राकृतिक महत्व—-

  • वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है।
  • फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है।
  • ज्योतिष शास्त्र के अनुसर इस दिन नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिये शुभ मुहूर्त होता है।

क्या एक जनवरी के साथ ऐसा एक भी प्रसंग जुड़ा है जिससे राष्ट्र प्रेम जाग सके, स्वाभिमान जाग सके या श्रेष्ठ होने का भाव जाग सके ? आइये! विदेशी को फैंक स्वदेशी अपनाऐं और गर्व के साथ भारतीय नव वर्ष यानि विक्रमी संवत् को ही मनायें तथा इसका अधिक से अधिक प्रचार करें।

जन्म कुंडली का दूसरा भाव और उसके प्रभाव

कुंडली के दूसरे घर को भारतीय वैदिक ज्योतिष में धन स्थान कहा जाता है तथा किसी भी व्यक्ति की कुंडली में इस घर का अपना एक विशेष महत्त्व होता है। इसलिए किसी कुंडली को देखते समय इस घर का अध्ययन बड़े ध्यान से करना चाहिए।

कुंडली का दूसरा घर कुंडली धारक के द्वारा अपने जीवन काल में संचित किए जाने वाले धन के बारे में बताता है तथा इसके अतिरिक्त यह घर कुंडली धारक के द्वारा संचित किए जाने वाले सोना, चांदी, हीरे-जवाहरात तथा इसी प्रकार के अन्य बहुमूल्य पदार्थों के बारे में भी बताता है। किन्तु कुंडली का दूसरा घर केवल धन तथा अन्य बहुमूल्य पदार्थों तक ही सीमित नहीं है तथा इस घर से कुंडली धारक के जीवन के और भी बहुत से क्षेत्रों के बारे में जानकारी मिलती है।

कुंडली का दूसरा घर व्यक्ति के बचपन के समय परिवार में हुई उसकी परवरिश तथा उसकी मूलभूत शिक्षा के बारे में भी बताता है। कुंडली के दूसरे घर के मजबूत तथा बुरे ग्रहों की दृष्टि से रहित होने की स्थिति में कुंडली धारक की बाल्यकाल में प्राप्त होने वाली शिक्षा आम तौर पर अच्छी रहती है। किसी भी व्यक्ति के बाल्य काल में होने वाली घटनाओं के बारे में जानने के लिए इस घर का ध्यानपूर्वक अध्ययन करना आवश्यक है।

कुंडली के दूसरे घर से कुंडली धारक की खाने-पीने से संबंधित आदतों का भी पता चलता है। किसी व्यक्ति की कुंडली के दूसरे घर पर नकारात्मक शनि का बुरा प्रभाव उस व्यक्ति को अधिक शराब पीने की लत लगा सकता है तथा दूसरे घर पर नकारात्मक राहु का बुरा प्रभाव व्यक्ति को सिगरेट तथा चरस, गांजा जैसे नशों की लत लगा सकता है।

कुंडली का दूसरा घर व्यक्ति के वैवाहिक जीवन के बारे में भी बताता है तथा इस घर से विशेष रूप से वैवाहिक जीवन की पारिवारिक सफलता या असफलता तथा कुटुम्ब के साथ रिश्तों तथा निर्वाह का पता चलता है। हालांकि कुंडली का दूसरा घर सीधे तौर पर व्यक्ति के विवाह होने का समय नहीं बताता किन्तु शादी हो जाने के बाद उसके ठीक प्रकार से चलने या न चलने के बारे में इस घर से भी पता चलता है।

कुंडली के इसी घर से कुंडली धारक के वैवाहिक जीवन में अलगाव अथवा तलाक जैसी घटनाओं का आंकलन भी किया जाता है तथा व्यक्ति के दूसरे विवाह के योग देखते समय भी कुंडली के इस घर को बहुत महत्त्व दिया जाता है। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के वैवाहिक जीवन से जुड़े कई महत्त्वपूर्ण पक्षों के बारे में कुंडली के दूसरे घर से जानकारी प्राप्त होती है।

कुंडली का दूसरा घर धारक की वाणी तथा उसके बातचीत करने के कौशल के बारे में भी बताता है। शरीर के अंगों में यह घर चेहरे तथा चेहरे पर उपस्थित अंगों को दर्शाता है तथा कुंडली के इस घर पर एक या एक से अधिक बुरे ग्रहों का प्रभाव होने की स्थिति में कुंडली धारक को शरीर के इन अंगों से संबंधित चोटों अथवा बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है।

कुंडली का दूसरा घर धारक की सुनने, बोलने तथा देखने की क्षमता को भी दर्शाता है तथा इन सभी के ठीक प्रकार से काम करने के लिए कुंडली के इस घर का मज़बूत होना आवश्यक है।

कुंडली के दूसरे घर से धारक के धन कमाने की क्षमता तथा उसकी अचल सम्पत्तियों जैसे कि सोना, चांदी, नकद धन तथा अन्य बहुमूल्य पदार्थों के बारे में भी पता चलता है।

कुंडली के इस घर पर किन्ही विशेष बुरे ग्रहों का प्रभाव कुंडली धारक को जीवन भर कर्जा उठाते रहने पर मजबूर कर सकता है तथा कई बार यह कर्जा व्यक्ति की मृत्यु तक भी नहीं उतर पाता।

दिसंबर 2011: आपके राशि में होगा चमत्कार

मेष: मेष राशि वाले जातकों के लिए यह माह सामान्य रहेगा। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के योग बनते हैं। नौकरों एवं कर्मचारियों से लाभ ‍मिलेगा। कृषि कार्य लाभ देगा। नौकरी में अधिकारी नाराज हो सकते हैं। अग्नि से भय है। हानि की संभावना बनती है। ध्यान दें। दिनांक – 3, 18 शुभ, 11 अशुभ है। विष्णु आराधना लाभप्रद है।

वृषभ: वृषभ राशि वाले जातकों के लिए यह माह राज्य पक्ष से लाभवाला रहेगा। पत्नी से विशेष लाभ मिलेगा। विद्यार्थी वर्ग को विद्या के क्षेत्र में लाभ की प्राप्ति होगी। व्यापार में उन्नति होगी। नौकरी में पदोन्नति के चांस मिलेंगे। पुराने मित्र से व्यवहार ठीक रखें। कृषि सामान्य रहेगी। दिनांक 5, 25 शुभ है, 10,18 अशुभ। श्रीकृष्ण की स्तुति शुभ रहेगी।

मिथुन: मिथुन राशि वाले जातकों के लिए दिसंबर का महीना लाभ देने वाला रहेगा। व्यापार से विशेष लाभ मिलेगा। भूमि क्रय के योग बनते है। शिक्षा ठीक रहेगी। कृषि एवं वाहन से अच्छा लाभ रहेगा। राज्य पक्ष से हानि के योग बन‍ते है। स्वास्थ्य ठीक रहेगा। पत्नी का सहयोग प्राप्त होगा। दिनांक 4, 12 शुभ, 15 अशुभ है। शिव आराधना लाभ देगी।

कर्क: कर्क राशि वाले जातकों के लिए यह माह पारिवारिक सुख-समृद्धि वाला रहेगा। राज्य कार्य करने पर अच्छा लाभ मिलेगा। परिवार से पूर्ण सहयोग प्राप्त होगा। स्वास्थ्य स्थिति में सुधार होगा। मित्रों से व्यवहार में कटुता आ सकती है। कृषि सामान्य रहेगी। दिनांक 6, 15 शुभ, 11 अशुभ है। कृष्ण भक्ति लाभप्रद रहेगी।

सिंह: सिंह राशि वाले जातकों के लिए यह माह संतान प्राप्ति वाला रहेगा। शत्रु पक्ष से लाभ प्राप्त होगा। मकान संबंधी समस्या रहेगी। नजदीकी संबंधों में दरार के योग बनते हैं। लंबी यात्रा न करें, हानि के योग बनते हैं। व्यापार सामान्य रहेगा। कृषि लाभप्रद है। नौकरी में उन्नति होगी। दिनांक 1, 10 शुभ है, 6 अशुभ। देवी भक्ति करें।

कन्या: कन्या राशि वाले जातकों के लिए यह माह मांगलिक कार्य वाला रहेगा। यात्रा से सुख प्राप्त‍ होगा। बहन के पक्ष से विवाद के योग बनते हैं। पत्नी को कष्‍ट के योग है। दोस्तों से व्यवहार बनाकर रखें। व्यापार ठीक रहेगा। कृषि सामान्य लाभ देगी। दिनांक 11, 28 शुभ है, 17 अशुभ। शिव शक्ति की आराधना करें।

तुला: तुला राशि वाले जातकों के लिए यह माह पदोन्नति वाला रहेगा। सरकारी काम से लाभ मिलेगा। सरकारी ठेकेदारों को विशेष लाभ। बाहरी यात्रा से लाभ की प्राप्ति होगी। व्यापार अच्छा रहेगा। कृषि सामान्य रहेगी। पुराने मित्र से मिलन के योग बनेंगे। दिनांक 10, 18 शुभ एवं 6 अशुभ है। विष्णु आराधना करें।

वृश्चिक: वृश्चिक राशि वाले जातकों के लिए यह माह पारिवारिक सदस्यों से लाभ वाला रहेगा। विद्या के क्षेत्र में लाभ मिलेगा। व्यापार मध्यम रहेगा। कृषि कार्य में लाभ मिलेगा। स्वास्थ्य सुधार होगा। राज्य पक्ष से हानि के योग। भाई को कष्ट के योग। नौकरी में अधिकारी नाराज हो सकते हैं। दिनांक 4, 16 शुभ, 7, 18 अशुभ। कृष्ण आराधना लाभप्रद है।

धनु: धनु राशि वाले जातकों के लिए यह माह कोई मांगलिक कार्य वाला रहेगा। स्वास्थ्य में सुधार होगा। लंबी यात्रा न करें, बाधा उत्पन्न होगी। स्त्री के पक्ष से हानि की संभावना है। पारिवारिक विरोध का सामना करना पड़ेगा। कृषि लाभ देगी। व्यापार ठीक रहेगा। किसी पुराने मित्र (स्त्री) से धोखा हो सकता है। दिनांक 15, 29 शुभ है। 2 अशुभ है। हनुमानजी की सेवा फलदायी रहेगी। चोला चढ़ा दें।

मकर: मकर राशि वाले जातकों के लिए यह माह पत्नी से लाभ वाला रहेगा। जमीन-जायदाद संबंधी विवाद हो सकते हैं। वाहन संबंधी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। यह परिवार से वैमनस्य करा सकता है। धार्मिक यात्रा से सुख प्राप्त होगा। भाई से सहयोग की अपेक्षा, कृषि कार्य से पिता को कष्ट की संभावना है। दिनांक 3, 12 शुभ है, 8 अशुभ। राधाकृष्‍ण की भक्ति लाभप्रद है।

कुंभ: कुंभ राशि वाले जातकों के लिए यह माह विपक्ष से लाभ वाला रहेगा। व्यापार सामान्य रहेगा। कृषि से लाभ। परंतु माह खर्चीला रहेगा। स्वास्थ्य नरम-गरम रहेगा। आंख एवं हाथ संबंधी समस्या रहेगी। नौकरी में नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है। मित्र से सहयोग मिलेगा। बहन के पक्ष से तकलीफ के योग बनते हैं। ससुराल पक्ष से सहयोग मिलेगा। दिनांक 6, 18 शुभ, 10 अशुभ। रामरक्षा स्त्रोत का पाठ लाभदायक रहेगा।

मीन: मीन राशि वाले जातकों के लिए यह माह भाग्योदय वाला रहेगा। जोखिम भरे कार्य न करें। स्त्री का स्वास्थ्य नरम-गरम रहेगा। व्यापार लाभ देगा। नौकरी में उन्नति होगी। कृषि उत्तम रहेगी। नौकर संबंध‍ी कष्ट हो सकता है। मित्र से पूर्ण सहयोग मिलेगा। दिनांक 1, 4 शुभ 16 अशुभ है। शिवशक्ति की आराधना शुभ है।

आपकी जन्म कुंडली: ग्रह, प्रभाव और उपाय

एक नया वर्ष एक फिर आने वाला हें..नए वर्ष के स्वागत में हम सभी अपने पुराने गम,दुःख-दर्द,तकलीफ भूलकर नयी आशा, नयी उर्जा और नयी  सोच से एक बार फिर से नए जोश के साथ इस नए साल/वर्ष का स्वागत करते हें..जीवन का एक नया अध्याय शुरू होने वाला हें..हमने पुरुषार्थ के साथ साथ कर्म प्रधान  भी बनाना हें ..एक नयी प्रेरणा से इस नए वर्ष का स्वागत करना हें..दृढ संकल्प प्रत्येक मनुष्य को कर्मनिष्ठ बनाकर सफलता प्राप्ति में सहयोग प्रदान करता हें।

भारतीय संस्कृति में वैद  और उनके एक अंग ज्योतिष का बहुत महत्त्व हें..ज्योतिष अर्थात ज्योति + इश अर्थात इश की ज्योति अर्थात इश के नेत्र जिनसे इश इस श्रृष्टि का संचार व नियंत्रण करते है। ये आज का अध्युनिक विज्ञानं भी मानता है के हर ग्रह की हर जीव की हर प्राणी की हर अणु की अपनी एक निश्चित नकारात्मक व सकारात्मक उर्जा होती है। अगर हम उस उर्जा का सही संतुलन अपने जीवन में बना ले तो वही ईश्वर की प्राप्ति का सच्चा साधन है। यहाँ हम चर्चा करेंगे ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव की और उससे कैसे दूर कर के हम अपने जीवन को सफल व सुफल कर सकते है।

आइये जाने की कौन सा ग्रह किस राशी पर उच्च का होकर शुभ फल देता हें और किस राशी में नीच का होकर अशुभ  परिणाम/फल देता हें.–-

01. सूर्य ग्रह मेष राशी में उच्च का होकर शुभ फल देता हें और तुला राशी में नीच का होकर अशुभ फल देता हें.

02.चन्द्रमा ग्रह वृषभ राशी में उच्च का होकर शुभ फल देता हें और वृश्चिक में नीच का होकर अशुभ फल देता हें.

03.मंगल ग्रह मकर में उच्च का होकर शुभ फल देता हें और कर्क में नीच का फल होकर अशुभ फल देता हें.

04.बुध ग्रह कन्या में उच्च का होकर शुभ फल देता हें का और मीन में नीच का होकर अशुभ फल देता हें.

05.गुरु ग्रह कर्क में उच्च का होकर शुभ फल देता हें और मकर में नीच का होकर अशुभ फल देता हें.

06.शुक्र ग्रह मीन में उच्च का होकर शुभ फल देता हें और कन्या में नीच का होकर अशुभ फल देता हें.

07.शनि ग्रह तुला में उच्च का होकर शुभ फल देता हें और मेष में नीच का होकर अशुभ फल देता हें.

08.राहू ग्रह  मिथुन में उच्च का होकर शुभ फल देता हें  और धनु में नीच का होकर अशुभ फल देता हें …

09.केतु ग्रह धनु में उच्च का होकर शुभ फल देता हें और मिथुन में नीच का होकर अशुभ फल देता हें …

ध्यान रखें–

सिंह एवं कुंभ राशी में कोई भी ग्रह उच्च या नीच का नहीं होता हें.

— मनुष्य/मानव के शरीर में ग्रहों का अपना एक मुख्य स्थान हें —

जेसे- सूर्य को शरीर कहा गया हें. चन्द्रमा को मन कहा गया हें. मंगल को सत्व, बुध को वाणी-विवेक, गुरु को ज्ञान और सुख,शुक्र को काम और वीर्य, शनि को दुःख, कष्ट और परिवर्तन तथा राहू और केतु को रोग एवं चिंता का करक/अधिष्ठाता माना जाता हें. ज्योतिष सिद्धांत के अनुसार संक्षिप्त में जानिए ग्रह दोष से उत्पन्न रोग और उसके निवारण तथा किस ग्रह के क्या नकारात्मक प्रभाव है और साथ ही उक्त ग्रहदोष से मुक्ति हेतु अचूक उपाय—

सूर्य ग्रह:— सूर्य पिता, आत्मा समाज में मान, सम्मान, यश, कीर्ति, प्रसिद्धि, प्रतिष्ठा का करक होता है। इसकी राशि है सिंह। कुंडली में सूर्य के अशुभ होने पर पेट, आँख, हृदय का रोग हो सकता है साथ ही सरकारी कार्य में बाधा उत्पन्न होती है। इसके लक्षण यह है कि मुँह में बार-बार बलगम इकट्ठा हो जाता है, सामाजिक हानि, अपयश, मनं का दुखी या असंतुस्ट होना, पिता से विवाद या वैचारिक मतभेद सूर्य के पीड़ित होने के सूचक है।

ये करें उपाय— ऐसे में भगवान राम की आराधना करे। आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करे, सूर्य को आर्घ्य दे, गायत्री मंत्र का जाप करे। ताँबा, गेहूँ एवं गुड का दान करें। प्रत्येक कार्य का प्रारंभ मीठा खाकर करें। ताबें के एक टुकड़े को काटकर उसके दो भाग करें। एक को पानी में बहा दें तथा दूसरे को जीवन भर साथ रखें। ॐ रं रवये नमः या ॐ घृणी सूर्याय नमः १०८ बार (१ माला) जाप करे|

—-चंद्र ग्रह:— चन्द्रमा माँ का सूचक है और मनं का करक है।शास्त्र कहता है की “चंद्रमा मनसो जात:”। इसकी कर्क राशि है। कुंडली में चंद्र अशुभ होने पर। माता को किसी भी प्रकार का कष्ट या स्वास्थ्य को खतरा होता है, दूध देने वाले पशु की मृत्यु हो जाती है। स्मरण शक्ति कमजोर हो जाती है। घर में पानी की कमी आ जाती है या नलकूप, कुएँ आदि सूख जाते हैं मानसिक तनाव,मन में घबराहट,तरह तरह की शंका मनं में आती है औरमनं में अनिश्चित भय व शंका रहती है और सर्दी बनी रहती है। व्यक्ति के मन में आत्महत्या करने के विचार बार-बार आते रहते हैं।

ये करें उपाय—- सोमवार का व्रत करना, माता की सेवा करना, शिव की आराधना करना, मोती धारण करना, दो मोती या दो चाँदी का टुकड़ा लेकर एक टुकड़ा पानी में बहा दें तथा दूसरे को अपने पास रखें। कुंडली के छठवें भाव में चंद्र हो तो दूध या पानी का दान करना मना है। यदि चंद्र बारहवाँ हो तो धर्मात्मा या साधु को भोजन न कराएँ और ना ही दूध पिलाएँ। सोमवार को सफ़ेद वास्तु जैसे दही,चीनी, चावल,सफ़ेद वस्त्र, १ जोड़ा जनेऊ,दक्षिणा के साथ दान करना और ॐ सोम सोमाय नमः का १०८ बार नित्य जाप करना श्रेयस्कर होता है।

—- मंगल ग्रह—- मंगल सेना पति होता है,भाई का भी द्योतक और रक्त का भी करक माना गया है। इसकी मेष और वृश्चिक राशि है।कुंडली में मंगल के अशुभ होने पर भाई, पटीदारो से विवाद, रक्त सम्बन्धी समस्या, नेत्र रोग, उच्च रक्तचाप, क्रोधित होना, उत्तेजित होना, वात रोग और गठिया हो जाता है। रक्त की कमी या खराबी वाला रोग हो जाता। व्यक्ति क्रोधी स्वभाव का हो जाता है। मान्यता यह भी है कि बच्चे जन्म होकर मर जाते हैं।

—-ये करें उपाय—-: ताँबा, गेहूँ एवं गुड,लाल कपडा,माचिस का दान करें। तंदूर की मीठी रोटी दान करें। बहते पानी में रेवड़ी व बताशा बहाएँ, मसूर की दाल दान में दें। हनुमद आराधना करना,हनुमान जी को चोला अर्पित करना, हनुमान मंदिर में ध्वजा दान करना, बंदरो को चने खिलाना,हनुमान चालीसा,बजरंग बाण,हनुमानाष्टक,सुंदरकांड का पाठ और ॐ अं अंगारकाय नमः का १०८ बार नित्य जाप करना श्रेयस्कर होता है।

—-बुध ग्रह —- बुध व्यापार व स्वास्थ्य का करक माना गया है। यह मिथुन और कन्या राशि का स्वामी है। बुध वाक् कला का भी द्योतक है। विद्या और बुद्धि का सूचक है। कुंडली में बुध की अशुभता पर दाँत कमजोर हो जाते हैं। सूँघने की शक्ति कम हो जाती है। गुप्त रोग हो सकता है। व्यक्ति वाक् क्षमता भी जाती रहती है। नौकरी और व्यवसाय में धोखा और नुक्सान हो सकता है।

—-ये करें उपाय—-भगवान गणेश व माँ दुर्गा की आराधना करे। गौ सेवा करे। काले कुत्ते को इमरती देना लाभकारी होता है। नाक छिदवाएँ। ताबें के प्लेट में छेद करके बहते पानी में बहाएँ। अपने भोजन में से एक हिस्सा गाय को, एक हिस्सा कुत्तों को और एक हिस्सा कौवे को दें, या अपने हाथ से गाय को हरा चारा, हरा साग खिलाये। उड़दकी दाल का सेवन करे व दान करे। बालिकाओं को भोजन कराएँ। किन्नेरो को हरी साडी, सुहाग सामग्री दान देना भी बहुत चमत्कारी है। ॐ बुं बुद्धाय नमः का १०८ बार नित्य जाप करना श्रेयस्कर होता है आथवा गणेशअथर्वशीर्ष का पाठ करे। पन्ना धारण करे या हरे वस्त्र धारण करे यदि संभव न हो तो हरा रुमाल साथ रक्खे।

—–गुरु ग्रह —-वृहस्पति की भी दो राशि है धनु और मीन। कुंडली में गुरु के अशुभ प्रभाव में आने पर सिर के बाल झड़ने लगते हैं। परिवार में बिना बात तनाव, कलह – क्लेश का माहोल होता है। सोना खो जाता या चोरी हो जाता है। आर्थिक नुक्सान या धन का अचानक व्यय,खर्च सम्हलता नहीं, शिक्षा में बाधा आती है। अपयश झेलना पड़ता है। वाणी पर सयम नहीं रहता।

—-ये करें उपाय—-ब्रह्मण का यथोचित सामान करे। माथे या नाभी पर केसर का तिलक लगाएँ। कलाई में पीला रेशमी धागा बांधे। संभव हो तो पुखराज धारण करे अन्यथा पीले वस्त्र या हल्दी की कड़ी गांड साथ रक्खे। कोई भी अच्छा कार्य करने के पूर्व अपना नाक साफ करें। दान में हल्दी, दाल, पीतल का पत्र, कोई धार्मिक पुस्तक, १ जोड़ा जनेऊ, पीले वस्त्र, केला, केसर,पीले मिस्ठान, दक्षिणा आदि देवें। विष्णु आराधना करे। ॐ व्री वृहस्पतये नमः का १०८ बार नित्य जाप करना श्रेयस्कर होता है।

—-शुक्र ग्रह :—– शुक्र भी दो राशिओं का स्वामी है, वृषभ और तुला। शुक्र तरुण है, किशोरावस्था का सूचक है, मौज मस्ती,घूमना फिरना,दोस्त मित्र इसके प्रमुख लक्षण है। कुंडली में शुक्र के अशुभ प्रभाव में होने पर मनं में चंचलता रहती है, एकाग्रता नहीं हो पाती। खान पान में अरुचि, भोग विलास में रूचि और धन का नाश होता है। अँगूठे का रोग हो जाता है। अँगूठे में दर्द बना रहता है। चलते समय अगूँठे को चोट पहुँच सकती है। चर्म रोग हो जाता है। स्वप्न दोष की श‍िकायत रहती है।

ये करें उपाय — माँ लक्ष्मी की सेवा आराधना करे। श्री सूक्त का पाठ करे। खोये के मिस्ठान व मिश्री का भोग लगाये। ब्रह्मण ब्रह्मणि की सेवा करे। स्वयं के भोजन में से गाय को प्रतिदिन कुछ हिस्सा अवश्य दें। कन्या भोजन कराये। ज्वार दान करें। गरीब बच्चो व विद्यार्थिओं में अध्यन सामग्री का वितरण करे। नि:सहाय, निराश्रय के पालन-पोषण का जिम्मा ले सकते हैं। अन्न का दान करे। ॐ सुं शुक्राय नमः का 108 बार नित्य जाप करना भी लाभकारी सिद्ध होता है।

—-शनि ग्रह :—- शनि की गति धीमी है। इसके दूषित होने पर अच्छे से अच्छे काम में गतिहीनता आ जाती है। कुंडली में शनि के अशुभ प्रभाव में होने पर मकान या मकान का हिस्सा गिर जाता या क्षतिग्रस्त हो जाता है। अंगों के बाल झड़ जाते हैं। शनिदेव की भी दो राशिया है, मकर और कुम्भ। शारीर में विशेषकर निचले हिस्से में ( कमर से नीचे ) हड्डी या स्नायुतंत्र से सम्बंधित रोग लग जाते है। वाहन से हानि या क्षति होती है। काले धन या संपत्ति का नाश हो जाता है। अचानक आग लग सकती है या दुर्घटना हो सकती है।

ये करें उपाय—हनुमान आराधना करना, हनुमान जी को चोला अर्पित करना, हनुमान मंदिर में ध्वजा दान करना, बंदरो को चने खिलाना, हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, हनुमानाष्टक, सुंदरकांड का पाठ और ॐ हन हनुमते नमः का १०८ बार नित्य जाप करना श्रेयस्कर होता है। नाव की कील या काले घोड़े की नाल धारण करे। यदि कुंडली में शनि लग्न में हो तो भिखारी को ताँबे का सिक्का या बर्तन कभी न दें यदि देंगे तो पुत्र को कष्ट होगा। यदि शनि आयु भाव में स्थित हो तो धर्मशाला आदि न बनवाएँ।कौवे को प्रतिदिन रोटी खिलाएँ। तेल में अपना मुख देख वह तेल दान कर दें (छाया दान करे ) । लोहा, काली उड़द, कोयला, तिल, जौ, काले वस्त्र, चमड़ा, काला सरसों आदि दान दें।

—-राहु– मानसिक तनाव, आर्थिक नुक्सान,स्वयं को ले कर ग़लतफहमी,आपसी तालमेल में कमी, बात बात पर आपा खोना, वाणी का कठोर होना व आप्शब्द बोलना, व कुंडली में राहु के अशुभ होने पर हाथ के नाखून अपने आप टूटने लगते हैं। राजक्ष्यमा रोग के लक्षण प्रगट होते हैं। वाहन दुर्घटना,उदर कस्ट, मस्तिस्क में पीड़ा आथवा दर्द रहना, भोजन में बाल दिखना, अपयश की प्राप्ति, सम्बन्ध ख़राब होना, दिमागी संतुलन ठीक नहीं रहता है, शत्रुओं से मुश्किलें बढ़ने की संभावना रहती है। जल स्थान में कोई न कोई समस्या आना आदि। —ये करें उपाय — —गोमेद धारण करे। दुर्गा, शिव व हनुमान की आराधना करे। तिल, जौ किसी हनुमान मंदिर में या किसी यज्ञ स्थान पर दान करे। जौ या अनाज को दूध में धोकर बहते पानी में बहाएँ, कोयले को पानी में बहाएँ, मूली दान में देवें, भंगी को शराब, माँस दान में दें। सिर में चोटी बाँधकर रखें। सोते समय सर के पास किसी पत्र में जल भर कर रक्खे और सुबह किसी पेड़ में दाल दे,यह प्रयोग 43 दिन करे। इसके साथ हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, हनुमानाष्टक, हनुमान बाहुक, सुंदरकांड का पाठ और ॐ रं राहवे नमः का 108  बार नित्य जाप करना लाभकारी होता है।

—- केतु—- कुंडली में केतु के अशुभ प्रभाव में होने पर चर्म रोग, मानसिक तनाव, आर्थिक नुक्सान,स्वयं को ले कर ग़लतफहमी, आपसी तालमेल में कमी, बात बात पर आपा खोना, वाणी का कठोर होना व आप्शब्द बोलना, जोड़ों का रोग या मूत्र एवं किडनी संबंधी रोग हो जाता है। संतान को पीड़ा होती है। वाहन दुर्घटना,उदर कस्ट, मस्तिस्क में पीड़ा आथवा दर्द रहना, अपयश की प्राप्ति, सम्बन्ध ख़राब होना, दिमागी संतुलन ठीक नहीं रहता है, शत्रुओं से मुश्किलें बढ़ने की संभावना रहती है।

- —ये करें उपाय— दुर्गा, शिव व हनुमान की आराधना करे। तिल, जौ किसी हनुमान मंदिर में या किसी यज्ञ स्थान पर दान करे। कान छिदवाएँ। सोते समय सर के पास किसी पत्र में जल भर कर रक्खे और सुबह किसी पेड़ में दाल दे,यह प्रयोग 43 दिन करे। इसके साथ हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, हनुमानाष्टक, हनुमान बाहुक, सुंदरकांड का पाठ और ॐ कें केतवे नमः का १०८ बार नित्य जाप करना लाभकारी होता है। अपने खाने में से कुत्ते,कौव्वे को हिस्सा दें। तिल व कपिला गाय दान में दें। पक्षिओं को बाजरा दे। चिटिओं के लिए भोजन की व्यस्था करना अति महत्व्यपूर्ण है।

कभी भी किसी भी उपाय को 43 दिन करना चहिये तब ही फल प्राप्ति संभव होती है। मंत्रो के जाप के लिए रुद्राक्ष की माला सबसे उचित मानी गई है। इन उपायों का गोचरवश प्रयोग करके कुण्डली में अशुभ प्रभाव में स्थित ग्रहों को शुभ प्रभाव में लाया जा सकता है। सम्बंधित ग्रह के देवता की आराधना और उनके जाप, दान उनकी होरा, उनके नक्षत्र में अत्यधिक लाभप्रद होते है।

ये हें ग्रह दोष निवारण के सरल/आसन उपाय—-

- घर की पूर्व दिशा में लगे हुए किसी भी वट वृक्ष की जड़ को शुभ मुहूर्त में निकालकर पास रखने से राहु ग्रह की पीड़ा शांत होती है.

- यदि राहु ग्रह के अशुभ प्रभाव को दूर करना हो तो जल में २ वट पत्र को डालकर उस जल से स्नान करना चाहिए. यह राहु के दुष्प्रभाव को मिटाने का सरल और प्रभावी तरीका है.

- चतुर्दशी के दिन वट वृक्ष की जड़ में दूध चढ़ाने से देव बाधा दूर होती है.

- गिरी के गोले में छेद करके उसमें मेवा और शक्कर भर दें तथा उसे जमीन  में दबा दें. इससे केतु ग्रह का प्रभाव शांत होता है.

- महालक्ष्मी पूजन के समय सीताफल को शामिल करने से दरिद्रता योग का नाश होता है. दीपावली पर इसे पूजन में रखना शुभ होता है.

- चन्द्र ग्रह की पीड़ा शांत करने हेतु चमेली के पुष्प से चन्द्र पूजन करना चाहिए.

- शिवजी को नित्य चमेली का फूल अर्पित करने से भूत बाधा दूर होती है.

- जिस व्यक्ति को नजर लगी हो तो उसके ऊपर लोहे की कील ११ बार उतारकर गूलर वृक्ष के तने में ठोंक दें नजर उतर जाती है. दुकान,व्यापार की नजर उतारने के लिए भी यह प्रयोग किया जा सकता है.

- किसी भी प्रकार के प्रमेह को दूर करने के लिए गूलर की लकड़ी का शहद और गन्ने के रस के साथ हवन करना चाहिए. इससे डायबिटीज़ का शमन होता है.

- मेष राशि के सूर्य के समय एक मसूर तथा दो नीम की पत्तियों को खाने से एक साल तक सर्प भय नहीं रहता.

- अनिंद्रा की स्थिति में मेहँदी के फूल सिरहाने रखने चाहिए. नींद आती है.

- बिल्ब, देवदारु और प्रियंगु की जड़ों को एक साथ कूटकर चूर्ण बना लें. इस चूर्ण की धूनी देने से भूत प्रेत भाग जाते हैं.

- भविष्य पुराण के अनुसार जो व्यक्ति पलाश का पुष्प शिवजी पर अर्पित करता है उसे भूत बाधा और पितर दोष नहीं सताते हैं.

- व्याधियों के शमन के लिए पलाश के पत्तों की पत्तल में कुछ दिन निरंतर भोजन करना चाहिए.

- सत्यानाशी की जड़ पास रखने से राहु पीड़ा शांत होती है.

- भरणी नक्षत्र में निकाली गई ग्वारपाठे की जड़ को अपने पास रखने से अस्त्र शस्त्र का भय नहीं रहता.

- हरसिंगार के पुष्प प्रत्येक पूर्णिमा को बाबड़ी में डालने से चन्द्र पीड़ा दूर होती है.

- नवमी तिथि के दिन आंवले के वृक्ष का पूजन करने से सौभाग्य में वृद्वि होती है. वैधव्य का नाश होता है.

- तीन गुलाब, तीन बेला के पुष्प पानी की कुईया /बाबड़ी में डालने से रुका हुआ कार्य बनता है.

 

श्रावण माह में भोले की आराधना!

श्रावण मास में भगवान शिवजी का विशेष पूजन-अर्चन किया जाता है। यह मास अत्यंत पवित्र माना गया है, एक तो चहुंओर हरियाली एवं मंद-मंद फुहार होने से मन उल्लास से भर जाता है।

जब मन प्रसन्न हो तब ही भगवान की आराधना करना चाहिए। मन प्रसन्न रहेगा तो पूजन में भी मन लगेगा। आइए जानते हैं श्रावण माह में कैसे करें भोलेनाथ का पूजन : -

चंद्र-कुंडली में सूर्य और भविष्यफल

सूर्य का चंद्र कुंडली में परिभ्रमण : – प्रत्येक ग्रह परिभ्रमण करते है एवं कुंडली में अलग-अलग भाव में विराजमान रहते हैं। चंद्र-कुंडली में सूर्य परिभ्रमण करते समय अलग-अलग भाव में जातक को क्या फल देता है, जानिए :-

महीनों के नाम कैसे और क्यों पड़े

महीने के नामों को तो हम सभी जानते हैं, लेकिन क्या आप यह जानते हैं कि महीनों के यह नाम कैसे पड़े एवं किसने इनका नामकरण किया। नहीं न! तो जानिए……

जनवरी : रोमन देवता ‘जेनस’ के नाम पर वर्ष के पहले महीने जनवरी का नामकरण हुआ। मान्यता है कि जेनस के दो चेहरे हैं। एक से वह आगे तथा दूसरे से पीछे देखता है। इसी तरह जनवरी के भी दो चेहरे हैं। एक से वह बीते हुए वर्ष को देखता है तथा दूसरे से अगले वर्ष को। जेनस को लैटिन में जैनअरिस कहा गया। जेनस जो बाद में जेनुअरी बना जो हिन्दी में जनवरी हो गया।

मंगल का ‘अमंगल’ होने का कारण!

आय का स्वामी मंगल जब मेष राशि का होकर पंचम विद्या, बुद्धि, संतान, मनोरंजन, प्रेम भाव में हो तो थोड़ी इन बातों में कमी के बाद परिश्रम द्वारा सफलता मिलती है। आय भाव का स्वामी यहां से आय को देखने से आय में कमी नहीं लाता है।

कुंडली में मंगल दोष कब और क्यों?

* यदि इन्हीं स्थानों पर 1-4-7-8-12 में एक की कुंडली में मंगल हो तथा दूसरे की कुंडली में शनि, राहु या स्वयं मंगल हो तो ‘मंगल दोष’ नहीं होता है।

* यदि मंगल नीच राशि, शत्रु राशि में हो या अस्त या वक्री हो तो भी ‘मंगल दोष’ नहीं होता।

* केंद्र एवं त्रिकोण स्थानों में शुभ ग्रह तथा 3-6-11 स्थानों में अशुभ ग्रह हों तो ‘मंगली दोष’ नहीं होता।

 

श्रावण माह में भोले की आराधना!

श्रावण मास में भगवान शिवजी का विशेष पूजन-अर्चन किया जाता है। यह मास अत्यंत पवित्र माना गया है, एक तो चहुंओर हरियाली एवं मंद-मंद फुहार होने से मन उल्लास से भर जाता है।

जब मन प्रसन्न हो तब ही भगवान की आराधना करना चाहिए। मन प्रसन्न रहेगा तो पूजन में भी मन लगेगा। आइए जानते हैं श्रावण माह में कैसे करें भोलेनाथ का पूजन : -

श्रावण मास:भोले का प्रिय महीना!

युधिष्ठिर ने लोमश ऋषि से पूछा, “हे मुनिवर! राजा भगीरथ गंगा को किस प्रकार पृथ्वी पर ले आये? कृपया इस प्रसंग को भी सुनायें।” लोमश ऋषि ने कहा, “धर्मराज! इक्ष्वाकु वंश में सगर नामक एक बहुत ही प्रतापी राजा हुये।

उनके वैदर्भी और शैव्या नामक दो रानियाँ थीं। राजा सगर ने कैलाश पर्वत पर दोनों रानियों के साथ जाकर शंकर भगवान की घोर आराधना की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उनसे कहा कि हे राजन्! तुमने पुत्र प्राप्ति की कामना से मेरी आराधना की है।

बाइबिल का संदेश और पवित्र विचार!

* भलाई से बुराई को जीतो।

* बुराई को अपने ऊपर हावी मत होने दो।

* जो कोई दया करे, वह हंसी-खुशी के साथ दया करें।

* प्रेम में कोई कष्ट नहीं होना चाहिए।

* बुराई से घृणा करनी चाहिए।

* भलाई में लगे रहना चाहिए।

* एक-दूसरे के साथ भाईचारे का प्रेम करना चाहिए।

* एक-दूसरे का आदर करने में होड़ करनी चाहिए।

* प्रयत्न करने में आलस नहीं करना चाहिए।

* आशा में प्रसन्न रहो। दुःख में स्थिर रहो।

* सज्जनों की सहायता करो। अतिथियों की सेवा करो।

* सताने वालों को आशीर्वाद दो।

* हंसने वालों के साथ हंसो। रोने वालों के साथ रोओ।

* बुराई के बदले बुराई न करो।

* भले काम करो। सबसे मेल रखो।

* किसी से बदला मत लो।

* तुम्हारा शत्रु भूखा हो, तो उसे खाना खिलाओ।

* प्यासा हो, तो पानी पिलाओ।

* जो कोई दान दे, वह सिधाई के सात दान दें।

धर्म के अनुसार जानें ‘गॉड पार्टिकल्स’

भारतीय दार्शनिक कपिल, कणाद, अक्षपाद गौतम, आद्याचार्य जैमिनि, महर्षि वादरायण, पतंजलि, योगाचार्य, अष्टावक्र आदि ने इस ब्रह्माणु की अलग-अलग तरीके से व्याख्या की है। ‘गॉड पार्टिकल्स’ को हिन्दू ‘ब्रह्माणु’, जैन पुद्‍गल और बौद्ध अनात्मा कहते हैं।

ऐसे अणु ‍जिसे तोड़ नहीं जा सकता वह परमाणु कहलाता है अर्थात अंतिम अणु। भारतीय और पाश्चात्य दार्शनिकों में इसके गुण और धर्म के बारे में मतभेद है। हर तरह के विज्ञान की थ्‍योरी 10 हजार साल पहले ही लिखी जा चुकी है आज तो सिर्फ प्रयोग हो रहे हैं।

शिव पुराण अनुसार : अरबों साल पहले ब्रह्मांड नहीं था, सिर्फ अंधकार था। अचानक एक बिंदु की उत्पत्ति हुई। फिर वह बिंदु मचलने लगा। फिर उसके अंदर भयानक परिवर्तन आने लगे। इस बिंदु के अंदर ही होने लगे विस्फोट। शिव पुराण मानता है कि नाद और बिंदु के मिलन से ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई।

नाद अर्थात ध्वनि और बिंदु अर्थात प्रकाश। इसे अनाहत (जो किसी आहत या टकराहट से पैदा नहीं हो) की ध्वनि कहते हैं जो आज भी सतत जारी है इसी ध्वनि को हिंदुओं ने ॐ के रूप में व्यक्त किया है। ब्रह्म प्रकाश ‘स्वयं प्रकाशित’ है। परमेश्वर का प्रकाश। इसे ही इस्लाम में खुदा-ए-नूर कहते हैं।

वेद अनुसार : ‘सृष्टि के आदिकाल में न सत् था न असत्, न वायु था न आकाश, न मृत्यु थी और न अमरता, न रात थी न दिन, उस समय केवल वही एक था जो वायुरहित स्थिति में भी अपनी शक्ति से सां स ले रहा था। उसके अतिरिक्त कुछ नहीं था।’- ऋग्वेद (नासदीयसूक्त) 10-129

ब्रह्म, ब्रह्मांड और आत्मा- यह तीन तत्व ही हैं। ब्रह्म शब्द ब्रह् धातु से बना है, जिसका अर्थ ‘बढ़ना’ या ‘फूट पड़ना’ होता है। ब्रह्म वह है, जिसमें से सम्पूर्ण सृष्टि और आत्माओं की उत्पत्ति हुई है, या जिसमें से ये फूट पड़े हैं। विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश का कारण ब्रह्म है।- उपनिषद

ब्रह्म स्वयं प्रकाश है। उसी से ब्रह्मांड प्रकाशित है। उस एक परम तत्व ब्रह्म में से ही आत्मा और ब्रह्मांड का प्रस्फुटन हुआ। ब्रह्म और आत्मा में सिर्फ इतना फर्क है कि ब्रह्म महाआकाश है तो आत्मा घटाकाश। घटाकाश अर्थात मटके का आकाश। ब्रह्मांड से बद्ध होकर आत्मा सीमित हो जाती है और इससे मुक्त होना ही मोक्ष है।

वेद अनुसार यह सृष्टि पंच कोषों वाली है- अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय। अन्न अर्थात जड़ जगत, प्राण अर्थात वायु जगत, मनोमय अर्थात मन, विज्ञानमय अर्थात मन से भी बढ़कर है अंतरमन और आनंदमय अर्थात आत्मा का स्वरूप या समाधि रूप।

उत्पत्ति का वैदिक क्रम :

पदार्थ के संगठित रूप को जड़ कहते हैं और विघटित रूप परम अणु है, इस अंतिम अणु को ही वेद परम तत्व कहते हैं जिसे ब्रह्माणु भी कहा जाता है और श्रमण धर्म के लोग इसे पुद्‍गल कहते हैं। भस्म और पत्थर को समझें। भस्मीभूत हो जाना अर्थात पुन: अणु वाला हो जाना।

आकाश के पश्चात वायु, वायु के पश्चात अग्न‍ि, अग्नि के पश्चात जल, जल के पश्चात पृथ्वी, पृथ्वी से औषधि, औ‍षधियों से अन्न, अन्न से वीर्य, वीर्य से पुरुष अर्थात शरीर उत्पन्न होता है।- तैत्तिरीय उपनिषद

गीता अनुसार : इस ब्रह्म (परमेश्वर) की दो प्रकृतियाँ हैं पहली ‘अपरा’ और दूसरी ‘परा’। संपूर्ण ब्रह्मांड आठ तत्वों वाला है। अपरा को ब्रह्मांड कहा गया और परा को चेतन रूप आत्मा। उस एक ब्रह्म ने ही स्वयं को दो भागों में विभक्त कर दिया, किंतु फिर भी वह अकेला बचा रहा। पूर्ण से पूर्ण निकालने पर पूर्ण ही शेष रह जाता है, इसलिए ब्रह्म सर्वत्र माना जाता है और सर्वत्र से अलग भी उसकी सत्ता है।

पुराणों अनुसार मान की उत्पत्ति : सप्तचरुतीर्थ के पास वितस्ता नदी की शाखा देविका नदी के तट पर मनुष्य जाति की उत्पत्ति हुई। प्रमाण यही बताते हैं कि आदि मानव की सृष्टि की उत्पत्ति भारत के उत्तराखण्ड अर्थात् इस ब्रह्मावर्त क्षेत्र में ही हुई।

संसार के प्रथम पुरुष स्वायंभुव मनु और प्रथम स्त्री थी शतरूपा। इन्हीं प्रथम पुरुष और प्रथम स्त्री की सन्तानों से संसार के समस्त जनों की उत्पत्ति हुई। मनु की सन्तान होने के कारण वे मानव कहलाए।

यहूदी और ईसाई के अनुसार : इस ब्रह्मांड की रचना परमेश्वर (यहोवा, गॉड) ने छह दिन में की सातवें दिन उन्होंने आराम किया। सृष्टि रचना के क्रम में परमेश्वर ने ग्रह, नक्षत्रों के निर्माण के बाद आदम को रचा और फिर उसी की एक पसली से हव्वा को। इस ब्रह्मांड का कारण है परमेश्वर।- शतायु

कैसे करें हनुमान की उपासना और मंत्रोचारण!

भगवान रामभक्त हनुमान की उपासना से जीवन के सारे कष्ट, संकट मिट जाते है। माना जाता है कि हनुमान एक ऐसे देवता है जो थोड़ी-सी प्रार्थना और पूजा से ही शीघ्र प्रसन्न हो जाते है।
जहां मंगलवार और शनिवार का दिन इनके पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं वहीं हिन्दू पंचांग के अनुसार पौष कृष्ण अष्टमी एवं चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को हनुमान पूजन विशेष मायने रखता है। यह दिन पौष कृष्ण अष्टमी यानी हनुमान अष्टमी और चैत्र शुक्ल पूर्णिमा यानी हनुमान जयंती के नाम से भी जानी जाती है।

बलिहारी गुरू आपने गोविन्द दियो बताये

 सच है गुरू की महिमा अपरंपार है। गुरू के बिना रास्ता अन्धकारमय होता है। इस दोहे से पत चलता है कि हमारे देश में गुरूओं का दर्जा इश्वर से भी पहले रखा गया है। आज गुरू पूर्णिमा के अवसर पर गुरूओं को नमन।

इस दोहे को हर विद्यार्थी ने पढ़ा है। सच है गुरू की महिमा अपरंपार है। गुरू के बिना रास्ता अन्धकारमय होता है। इस दोहे से पत चलता है कि हमारे देश में गुरूओं का दर्जा इश्वर से भी पहले रखा गया है। आज गुरू पूर्णिमा के अवसर पर गुरूओं को नमन।

भारत में गुरु पूर्णिमा पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है। आषाढ़ के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को ही गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। वैसे तो देश भर में एक से बड़े एक अनेक विद्वान हुए हैं, परंतु उनमें महर्षि वेद व्यास, जो चारों वेदों के प्रथम व्याख्याता थे, उनका पूजन आज के दिन किया जाता है।

प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता था, तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी शक्ति, अपने सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर कृतकृत्य होता था।

हमें वेदों का ज्ञान देने वाले व्यासजी ही हैं, अतः वे हमारे आदिगुरु हुए। इसीलिए इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। उनकी स्मृति हमारे मन मंदिर में हमेशा ताजा बनाए रखने के लिए हमें इस दिन अपने गुरुओं को व्यासजी का अंश मानकर उनकी पाद-पूजा करनी चाहिए तथा अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए गुरु का आशीर्वाद जरूर ग्रहण करना चाहिए। साथ ही केवल अपने गुरु-शिक्षक का ही नहीं, अपितु माता-पिता, बड़े भाई-बहन आदि की भी पूजा का विधान है।

कैसे करे गुरू की पूजा

* प्रातः घर की सफाई, स्नानादि नित्य कर्म से निवृत्त होकर साफ-सुथरे वस्त्र धारण करके तैयार हो जाएं।

* घर के किसी पवित्र स्थान पर पटिए पर सफेद वस्त्र बिछाकर उस पर 12-12 रेखाएं बनाकर व्यास-पीठ बनाना चाहिए।

* फिर हमें ‘गुरुपरंपरासिद्धयर्थं व्यासपूजां करिष्ये’ मंत्र से पूजा का संकल्प लेना चाहिए।

* तत्पश्चात दसों दिशाओं में अक्षत छोड़ना चाहिए।

* फिर व्यासजी, ब्रह्माजी, शुकदेवजी, गोविंद स्वामीजी और शंकराचार्यजी के नाम, मंत्र से पूजा का आवाहन करना चाहिए।

* अब अपने गुरु अथवा उनके चित्र की पूजा करके उन्हें यथा योग्य दक्षिणा देना चाहिए।

गुरु पूर्णिमा पर विशेश 

* गुरु पूर्णिमा पर व्यासजी द्वारा रचे हुए ग्रंथों का अध्ययन-मनन करके उनके उपदेशों पर आचरण करना चाहिए।

* यह पर्व श्रद्धा से मनाना चाहिए, अंधविश्वास के आधार पर नहीं।

* इस दिन वस्त्र, फल, फूल व माला अर्पण कर गुरु को प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।

* गुरु का आशीर्वाद सभी-छोटे-बड़े तथा हर विद्यार्थी के लिए कल्याणकारी तथा ज्ञानवर्द्धक होता है।

* इस दिन केवल गुरु (शिक्षक) ही नहीं, अपितु माता-पिता, बड़े भाई-बहन आदि की भी पूजा का विधान है।

यदि आपका जन्म मई में हुआ हो?

आपका जन्म किसी भी साल के मई महीने में हुआ है तो एस्ट्रोलॉजी कहती है कि आप आकर्षक और लोकप्रिय होंगे। थोड़े से लापरवाह, थोड़े से सनकी। एक बार अगर कुछ ठान लें तो उसे पाकर ही रहते हैं। मई में जन्में जातक अव्वल दर्जे के घमंडी होते हैं लेकिन इनमें त्याग करने की प्रवृत्ति भी प्रबल होती है। स्वभाव से राजसी होते हैं।

सपनों का अद्भुत संसार, स्वप्न और उनका फल

आदि काल से ही मानव मस्तिष्क अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने के प्रयत्नों में सक्रिय है। परंतु जब किसी भी कारण इसकी कुछ अधूरी इच्छाएं पूर्ण नहीं हो पाती (जो कि मस्तिष्क के किसी कोने में जाग्रत अवस्था में रहती है) तो वह स्वप्न का रूप ले लती हैं।

आधुनिक विज्ञान में पाश्चात्य विचारक सिगमंड फ्रायड ने इस विषय में कहा है कि स्वप्न” मानव की दबी हुई इच्छाओं का प्रकाशन करते हैं जिनको हमने अपनी जाग्रत अवस्था में कभी-कभी विचारा होता है। अर्थात स्वप्न हमारी वो इच्छाएं हैं जो किसी भी प्रकार के भय से जाग्रत्‌ अवस्था में पूर्ण नहीं हो पाती हैं व स्वप्नों में साकार होकर हमें मानसिक संतुष्टि व तृप्ति देती है।

सपने या स्वप्न आते क्यों है?

इस प्रश्न का कोई ठोस प्रामाणिक उत्तर आज तक खोजा नहीं जा सका है। प्रायः यह माना जाता है कि स्वप्न या सपने आने का एक कारण ÷नींद’ भी हो सकता है। विज्ञान मानता है कि नींद का हमारे मस्तिष्क में होने वाले उन परिवर्तनों से संबंध होता है, जो सीखने और याददाश्त बढ़ाने के साथ-साथ मांस पेशियों को भी आराम पहुंचाने में सहायक होते हैं। इस नींद की ही अवस्था में न्यूरॉन (मस्तिष्क की कोशिकाएं) पुनः सक्रिय हो जाती हैं।

वैज्ञानिकों ने नींद को दो भागों में बांटा है पहला भाग आर ई एम अर्थात्‌ रैपिड आई मुवमेंट है। (जिसमें अधिकतर सपने आते हैं) इसमें शरीर शिथिल परंतु आंखें तेजी से घूमती रहती हैं और मस्तिष्क जाग्रत अवस्था से भी ज्यादा गतिशील होता है। इस आर ई एम की अवधि १० से २० मिनट की होती है तथा प्रत्येक व्यक्ति एक रात में चार से छह बार आर ई एम नींद लेता है। यह स्थिति नींद आने के लगभग १.३० घंटे अर्थात ९० मिनट बाद आती है। इस आधार पर गणना करें तो रात्रि का अंतिम प्रहर आर ई एम का ही समय होता है (यदि व्यक्ति समान्यतः १० बजे रात सोता है तो ) जिससे सपनों के आने की संभावना बढ़ जाती है।

सपने बनते कैसे हैं : दिन भर विभिन्न स्रोतों से हमारे मस्तिष्क को स्फुरण (सिगनल) मिलते रहते हैं। प्राथमिकता के आधार पर हमारा मस्तिष्क हमसे पहले उधर ध्यान दिलवाता है जिसे करना अति जरूरी होता है, और जिन स्फुरण संदेशों की आवश्यकता तुरंत नहीं होती उन्हें वह अपने में दर्ज कर लेता है। इसके अलावा प्रतिदिन बहुत सी भावनाओं का भी हम पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। जो भावनाएं हम किसी कारण वश दबा लेते हैं (गुस्सा आदि) वह भी हमारे अवचेतन मस्तिष्क में दर्ज हो जाती हैं। रात को जब शरीर आराम कर रहा होता है मस्तिष्क अपना काम कर रहा होता है। (इस दौरान हमें चेतनावस्था में कोई स्कुरण संकेत भावनाएं आदि नहीं मिल रही होती) उस समय मस्तिष्क दिन भर मिले संकेतों को लेकर सक्रिय होता है जिनसे स्वप्न प्रदर्शित होते हैं। यह वह स्वप्न होते हैं जो मस्तिष्क को दिनभर मिले स्फुरण, भावनाओं को दर्शाते हैं जिन्हें दिनमें हमने किसी कारण वश रोक लिया था। जब तक यह प्रदर्शित नहीं हो पाता तब तक बार-बार नजर आता रहता है तथा इन पर नियंत्रण चाहकर भी नहीं किया जा सकता।

स्वप्न मनुष्य के लिए बड़े ही आकर्षक लुभावने और रहस्यमय होते है. डरावने और बुरे स्वप्न जहां उसे भयभीत करते है. वहीं दिलचस्प, मनोहारी और अच्छे स्वप्न उसे आत्मविभोर कर देते है.

रात्री में सुप्त अवस्था में देखे गए स्वप्नों के स्वप्न जाल में घिरा वह सारादिन एक अजीब सी खुशी का अनुभव करता है.एक अजीब सी ऊर्जा उसके भीतर प्रवाहित होतीरहती है. मनुष्य स्वभाव ही ऐसा है, जो बुरेस्वप्न के फल को भी जानना चाहता है.और अच्छे स्वप्न के फल को भी जानने के लिएउत्सुक रहता है.

आखिर स्वप्न क्या है, जो सदियों से मनुष्य को अपने शुभ अशुभ संकेतों द्वारा सचेत करता रहा है. असल मेंस्वप्न व्यक्ति के व्यक्तित्व का एक ऐसा “भाग्यसूचक” है.

जो वह सब कुछ उसको निन्द्रावस्था में बताजाता है. जो उसके जीवन में शुभ अशुभ घटने वाला होता है. ऐसी सूक्ष्म और प्रामाणिकजानकारी मनुष्य को किसी भी पद्धति से नहीं मिल सकती है.

कुछ स्वप्न बड़े ही विचित्र और आश्चर्यजनकहोते है. व्यक्ति उन्हें देख कर अवाक रह जाता है. कि वह स्वप्न में कैसे आसमान मेंउड़ रहा था. कुछ स्वप्न ऐसे भी होते है.

जो भविष्य में घटने वाली शुभ अशुभ घटनाओंका बोध कराते है. और कुछ स्वप्न बिलकुल ही मानव जीवन की सच्चाइयो से जुड़े होते है.

आप अगर रात के प्रथम पहर में कोई स्वप्न देखते हैतो उस स्वप्न का शुभ या अशुभ फल आपको साल भर में मिलने की संभावना रहती है.

 

रात केदूसरे पहर में आप कोई स्वप्न देखते है.उसका शुभ या अशुभ फल मिलने का समय आठ महीनेका होता है.

रात के तीसरे पहर में आप कोई स्वप्न देखते है तो तीन महीने में उसकाशुभ अशुभ फल मिलता है.

रात के चौथे पहर के स्वप्न के फल प्राप्ति का समय एक माह होता है. और जो स्वप्न सुबह भोर काल में देखे जाते है उसका फल शीघ्र ही आपको मिलजाता है.

दिन निकलने के बाद देखे जाने वाले स्वप्नों का फल आधे माह के भीतर ही मिलजाते है. जीवनमें बहुत प्रकार के स्वप्न दिखाई देते है और विभिन्न विषयों पर स्वप्न दृश्यमानहोते है,

उन सभी चयन करना असंभव है फिर भी अधिकतर स्वप्न का फल बताने का प्रयासकिया जा रहा है जो कि शब्दों के क्रमवार से लिखने का प्रयास कर रहा हूँ…..

स्वप्न मनुष्य के लिए बड़े ही आकर्षकलुभावने और रहस्यमय होते है. डरावने और बुरे स्वप्न जहां उसे भयभीत करते है. वहींदिलचस्प, मनोहारी और अच्छे स्वप्न उसे आत्मविभोर करदेते है.

रात्री में सुप्त अवस्थामें देखे गए स्वप्नों के स्वप्न जाल में घिरा वह सारा दिन एक अजीब सी खुशी काअनुभव करता है.एक अजीब सी ऊर्जा उसके भीतर प्रवाहित होती रहती है. मनुष्य स्वभावही ऐसा है, जो बुरे स्वप्न के फल को भी जानना चाहताहै.और अच्छे स्वप्न के फल को भी जानने के लिए उत्सुक रहता है.

आखिर स्वप्न क्या है, जो सदियों सेमनुष्य को अपने शुभ अशुभ संकेतों द्वारा सचेत करता रहा है. असल में स्वप्न व्यक्तिके व्यक्तित्व का एक ऐसा “भाग्य सूचक” है.

जो वह सब कुछ उसको निन्द्रावस्था में बताजाता है. जो उसके जीवन में शुभ अशुभ घटने वाला होता है. ऐसी सूक्ष्म और प्रामाणिकजानकारी मनुष्य को किसी भी पद्धति से नहीं मिल सकती है.

कुछ स्वप्न बड़े ही विचित्र औरआश्चर्यजनक होते है. व्यक्ति उन्हें देख कर अवाक रह जाता है. कि वह स्वप्न मेंकैसे आसमान में उड़ रहा था. कुछ स्वप्न ऐसे भी होते है.

जो भविष्य में घटने वाली शुभ अशुभघटनाओं का बोध कराते है. और कुछ स्वप्न बिलकुल ही मानव जीवन की सच्चाइयो से जुड़े होते है.

हमारे प्राचीनकाल के ग्रंथों में स्वप्न विज्ञान को काफी महत्व दिया गया है। स्वप्न परमात्मा की ओर से होने वाली घटनाओं के पूर्व संकेत होते हैं। स्वप्न का प्रभाव निश्चित रूप से हर मनुष्य पर पड़ता है।

यदि कोई अच्छा-सा स्वप्न दिखाई दे तो हम खुश होते हैं, किंतु बुरा दिखाई दे तो घबराकर तुरंत ज्योतिषियों के पास पहुँच जाते हैं। स्वप्न तो छोटे-छोटे निरीह बालकों को भी नहीं छोड़ते हैं। वे नींद में कभी हँसते हैं और कभी डर से रोने लगते हैं।

हमारे प्राचीनकाल के ग्रंथों में स्वप्न विज्ञान को काफी महत्व दिया गया है। स्वप्न परमात्मा की ओर से होने वाली घटनाओं के पूर्व संकेत होते हैं। स्वप्न का प्रभाव निश्चित रूप से हर मनुष्य पर पड़ता है।

यदि कोई अच्छा-सा स्वप्न दिखाई दे तो हम खुश होते हैं, किंतु बुरा दिखाई दे तो घबराकर तुरंत ज्योतिषियों के पास पहुँच जाते हैं। स्वप्न तो छोटे-छोटे निरीह बालकों को भी नहीं छोड़ते हैं। वे नींद में कभी हँसते हैं और कभी डर से रोने लगते हैं।

इन्सान मे यह गुण है कि वह सपनों को सजाता रहता है या यूँ कहे कि भीतर उठने वाली हमारी भावनाएं ही सपनो का रूप धारण कर लेती हैं। इन उठती भावनाओं पर किसी का नियंत्रण नही होता। हम लाख चाहे,लेकिन जब भी कोई परिस्थिति या समस्या हमारे समक्ष खड़ी होती है,हमारे भीतर भावनाओं का जन्म होनें लगता है। ठीक उसी तरह जैसे कोई झीळ के ठहरे पानी में पत्थर फैंकता है तो पानी के गोल-गोल दायरे बननें लगते हैं। यह दायरे प्रत्येक इन्सान में उस के स्वाभावानुसार होते हैं। इन्हीं दायरों को पकड़ कर हम सभी सपने बुननें लगते हैं। यह हमारी आखरी साँस तक ऐसे ही चलता रहता है।

इसी लिए हम सभी सपने दॆखते हैं।शायद ही ऐसा कोई इंसान हो जिसे रात को सोने के बाद सपनें ना आते होगें। जो लोग यह कहते हैं कि उन्हें सपनें नही आते, या तो वह झूठ बोल रहे होते हैं या फिर उन्हें सुबह उठने के बाद सपना भूल जाता होगा। हो सकता है उन की यादाश्त कमजोर हो। या फिर उनकी नीदं बहुत गहरी होती होगी। जैसे छोटे बच्चों की होती है। उन्हें आप सोते समय अकसर हँसता- रोता हुआ देखते रहे होगें , ऐसी गहरी नीदं मे सोनें वाले भी सपनों को भूल जाते हैं और दावा करते हैं कि उन्हें सपनें नही आते। लेकिन सपनों का दिखना एक स्वाभाविक घटना है। इस लिए यह सभी को आते हैं।

निद्रा और स्वप्न का चोली-दामन का संबंध है। नींद के बिना सपने नहीं आते हैं। यह धारणा गलत है कि गहरी नींद में सपने नहीं आते हैं। गहरी नींद में भी सपने आते हैं, अलबत्ता कुछ लोगों को ऐसे सपने याद नहीं रहते। सपना सभी देखते हैं कुछ वर्ष पहले यह बात समाचार-पत्रों में आई कि पाश्चात्य शोध ने सिद्ध कर दिया है कि मनुष्य ही नहीं, पशु भी सपने देखते हैं। यह तथ्य हमारे चिंतकों ने सदियों पहले बताया था।

प्रश्नोपनिषद के पांचवें श्लोक में यह स्पष्ट है कि सभी प्राणी स्वप्न देखते हैं। सर्वपश्यतिसर्व:पश्यति मान्यता है कि उपनिषदों का समय लगभग 6 हजार वर्ष पहले का है। दरअसल, मनुष्य या किसी भी प्राणी में शरीर, मन और आत्मा की प्रधानता होती है। मुख्य रूप से स्वप्न मन के विषय हैं। यही कारण है कि मनोविज्ञान विषय के अन्तर्गत उसका अध्ययन किया जाता है। उपनिषद कहते हैं-अत्रैषदेव:स्वप्नेमहिमानमनुभवति।

स्वप्न अक्सर सही होते हैं, कभी-कभी ही यह सच नहीं होता। स्वप्न संबंधी किंवदंतियां लोगों के अनुभवों पर आधारित होती हैं। इसलिए उन्हें अंधविश्वास कह कर गलत नहीं ठहराया जा सकता है।

क्या है अर्थ?

स्वप्न देखने के बाद हम उसका कुछ न कुछ अर्थ लगाते हैं। इसके आधार पर स्वप्नों के कुछ प्रकार हैं-निरर्थक सार्थक, भविष्यसूचक,शुभफलदायी,अशुभफलदायी,दैवी, आवश्यकता-पूर्ति-कारक, आनंद देने वाला, भय दर्शाने वाला इत्यादि। निरर्थक स्वप्न ऐसे होते हैं, जो मन के भटकावसे उत्पन्न होते हैं। जागने पर प्राय: हम उसे भूल जाते हैं। जो स्वप्न हमें याद रहते हैं, वे सार्थक कहलाते हैं। ये स्वप्न शुभ फलदायी,अशुभ फलदायी या भविष्य सूचक भी हो सकते हैं। छत्रपति शिवाजी की इष्ट देवी तुलजा भवानी थीं। स्थानीय लोग मानते हैं कि उन्होंने स्वप्न में प्रकट होकर शिवाजी से बीजापुरके सेनापति अफजल से युद्ध करने का आदेश दिया था। जनश्रुतियोंके अनुसार, स्वयं शिव और पार्वती तुलसीदास के स्वप्न में आए। उन दोनों ने उन्हें रामचरितमानस लोक भाषा में लिखने का आदेश दिया।

गोस्वामी के शब्दों में —–

सपनेहुंसाथिमोपर, जो हर गौरी पसाउ।

तेफुट होइजो कहहीं, सब भाषा मनितिप्रभाउ।

लोक-भाषा अवधि में लिखा गया रामचरितमानस और तुलसी दोनों अमर हो गए।

इंटरप्रिटेशन ऑफ ड्रीम्स:—— पाश्चात्य चिंतकों ने भी सपनों का विश्लेषण किया है। इनमें फ्रॉयडका नाम उल्लेखनीय है। उनका इंटरप्रिटेशन ऑफ ड्रीम्स बहुत लोकप्रिय हुआ। फ्रॉयडके अनुसार, हम अपनी नींद को तीन अवस्था में बांट सकते हैं-चेतन (कॉन्शस), अचेत (अनकॉन्शस), अर्द्धचेतन (सब कॉन्शस)।अर्द्धचेतन अवस्था में ही हम स्वप्न देखते हैं। उनके अनुसार, स्वप्न में हम सभी उन्हीं इच्छाओं को पूरी होते हुए देखते हैं, जिसे हम अपने मन में दबाए रखते हैं। यह इच्छा किसी लक्ष्य को पाने, यहां तक कि हमारी दमित काम भावना भी हो सकती है। फ्रॉयडका कहना था कि हमें उन स्वप्नों को सच मानने के बजाय उनका विश्लेषण करना चाहिए।स्वप्न के आधार पर फलकथन करने में ज्योतिषियों को आसानी होती है। सपनों में कुछ भी कर सकने की आजादी होती है। चाहे तो मछली को सड़क पर दौड़ा दें या गरूड़ को पानी में तैरते हुए देखें। जब मनुष्य गहरी नींद में होता है तो उसका इलेक्ट्रो एनसेफलोग्राफ (ईईजी) अल्फा तरंगों को स्थिर गति में दिखाता है, जिसमें सामान्य श्वास, नाड़ी धीमी और शरीर का तापमान कम हो जाता है। परंतु स्वप्न अवस्था में गतिशीलता बढ़ जाती है।

 

हमारे प्राचीनकाल के ग्रंथों में स्वप्न विज्ञान को काफी महत्व दिया गया है। स्वप्न परमात्मा की ओर से होने वाली घटनाओं के पूर्व संकेत होते हैं। स्वप्न का प्रभाव निश्चित रूप से हर मनुष्य पर पड़ता है। यदि कोई अच्छा-सा स्वप्न दिखाई दे तो हम खुश होते हैं।

शब्द बहुत छोटा है स्वप्न। भौतिक और जगत के अध्यात्म का समन्वय ही स्वप्न है। भौतिक अर्थात जो कुछ आंखों से दिख रहा है, इंद्रियां जिसे अनुभव कर रही हैं और दूसरा आध्यात्मिक अर्थात जो हमें खुली आंखों और स्पर्श से नहीं अनुभूत हो रहा। ये दोनों अवस्थाएं जीवन के दो पहलू हैं। दोनों सत्य है। एक बार एक लकड़हारा रात में सोते समय सपने देखने लगा कि वह बहुत अमीर हो गया है। नींद खुलने पर बहुत प्रसन्न हुआ। उसकी पत्नी रूखा सूखा भोजन देने आई तो वह बोला कि अब हम अमीर हैं, ऐसा खाना नहीं खाता हूं। पत्नी समझ गई कि उसका पति कोई निकृष्ट स्वप्न देख कर जगा है। शाम तक उसने उसे कुछ नहीं दिया जब लकड़हारा भूख से व्याकुल हुआ तो उसे सपने के सत्य-असत्य का ज्ञान हुआ और पुनः वह अपनी वास्तविक स्थिति पर लौट आया। अब प्रश्न यह उठता है कि स्वप्न, सत्य-असत्य कैसे है? कुछ क्षण के लिए सत्य का भान कराता है बाद में असत्य हो जाता है, कभी सत्य हो जाता है।

 

ऋषि, महर्षि, आचार्यों ने इस भूमि पर रह कर संसार को असत्य अर्थात स्वप्निल कहा है, स्वप्न के समान। गृहस्थ भी समाज देश में रह कर अपना स्थान मात्र स्मारक, फोटो फ्रेम तक सीमित मान लें, तो यह आध्यात्मिक सत्य है। ईश्वर को देखा नहीं गया है, लेकिन विश्व का हर देश, समाज, संप्रदाय किसी न किसी रूप में इसे स्वीकारता है। अतः यह पूर्ण सत्य है। जगत का सत्य अर्थात स्वप्निल संसार से सपनों का अर्थ निकालने में इसे ÷भ्रम’ कहा जा सकता है। ÷भ्रम’ इस अर्थ में कि अभी इस पर बहुत कुछ आधुनिक विज्ञान से पाने की संभावना बनती है।

 

हर मनुष्य की दो अवस्थाएं होती हैं, पहला जाग्रत या अनिंद्रित, दूसरी पूर्ण निंद्रा में अर्थात सुषुप्त। इसमें पुनः दो बार संधि काल आता है पहला जब सोने जाते हैं -पूर्ण निंद्रा में जाने से पहले और दूसरा, सोकर उठने से कुछ काल पहले का समय होता है। जाग्रत और पूर्ण निद्रावस्था के बीच के समय प्रायः स्वप्न आते हैं। एक विचार से नींद में दिखने वाला सब कुछ असत्य होता है, तो दूसरी विचारधारा में स्वप्न, पूर्व का घटित सत्य होता है। आगे इस पर विचार करेंगे कि प्रायः दिखने वाले स्वप्नों के क्या कारण हो सकते हैं ? भौतिक शरीर नहीं रहने पर, मन बुद्धि और मस्तिष्क के विचारों का, क्या शव के साथ दहन-दफन हो जाता है? कदापि किसी भी उर्जा का क्षय नहीं होता, रूपांतरण होता है। यह सर्वसत्य तथा वैज्ञानिक, मनीषियों की विवेचना है। जन्म-जन्मांतर में ये संस्कारिक रूप में आते हैं। वैसे सुषुप्त अवस्था में, मन बुद्धि और मस्तिष्क का ज्ञान भंडारपूर्ण सुषुप्त नहीं होता। निद्रा देवी अर्थात नींद कैसे आती है और कहां चली जाती है। इसे कौन नियंत्रित करता है ? वह ÷मन’ है। शांत भाव से सोचते हैं कि सोना है और धीरे धीरे सो जाते हैं। अगर मन में यह बात बैठी है कि प्रातःकाल अमुक समय उठना है तो नींद गायब भी, समय पर हो जाती है। जैसे बंद मोबाइल, कंप्यूटर जब भी चालू करेंगे, वह समय ठीक ही बताएगा। अर्थात उसमें कुछ बंद अवस्था में भी चल रहा है। मानव शरीर एक विलक्षण यंत्र है इसमें वैदिक ज्ञान से लेकर अकल्पनीय कार्य क्षमता का समावेश है। भगवान की इस रचना के लिए श्रीगीता का एक श्लोक है – न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्‌।

कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥

 

 

श्रीगीता के इस श्लोक का यह भाव है कि सुषुप्त अवस्था में भी मन द्वारा मस्तिष्क के संचित ज्ञान भंडार से कुछ न कुछ कार्य होता रहता है। सुषुप्त अवस्था में भी क्षण मात्र को कोई भी प्राकृतिक गुण-धर्म से अलग नहीं होता। प्रथम प्रकृति ही ईश्वर है। वह सदा साथ रहता है, मानव शरीर से शीर्ष पर, अर्थात सबसे ऊपर जो हमारा मस्तिष्क है। दिमाग की थोड़ी सी चूक उसे प्रगति से दूर्गति तक पहुंचा देती है। मस्तिष्क का संचालक ÷मन’ है, हमारी सोच है। कल्याणकारी सोच अच्छे सपनों को जन्म देती है, निकृष्ट सोच सदा बुरे सपनों को संजोता है। मनोवैज्ञानिक भी यही कहते हैं कि स्वप्न मन की उपज है।

 

मनुष्य मस्तिष्क में असंख्य तंतुओं का जाल या संग्रहालय है। जागृत अवस्था में मन से उसे संचालन करते हैं फिर भी बहुत से मस्तिष्क रूपी कंप्यूटर खोलने और बंद करने में दिन भर की बाधाएं आती रहती हैं। मस्तिष्क की व्यवस्था जब विधिवत्‌ बंद नहीं होती तो दिमाग बोझिल होकर निंद्रा में, कार्य करने पर स्वप्नों का निर्माण करता है। जब जगते हैं तो उनका अपुष्ट स्वरूप ध्यान आता है, फिर विचार करते हैं कि यह शुभ फल देगा या अशुभ। स्वप्न का अर्थ हमेशा निरर्थक नहीं होता, क्योंकि पूर्वजन्म की मनोदशा और ज्ञान संस्कार पुनः आगे के जन्मों में परिलक्षित होते हैं। बाह्य चेतना जन्य बोध, वर्तमान चेतना के बोध को भले ही अस्वीकार करे, लेकिन सच्चा ज्ञान एवं घटित कार्य कलाप अंतरात्मा में निहित होते हैं। मन से मस्तिष्क के ज्ञान का उदय, दिवा या रात्रि स्वप्न होते हैं।

 

बार-बार एक ही तरह के स्वप्न को देखने वाले कई लोग एक ही प्रकार की उपलब्धि पाते हैं तो स्वप्न विचारक मनीषी इसे तालिका के रूप में प्रस्तुत करते हैं। बहुत ही प्राचीन काल से यह धारणा चली आ रही है और प्रायः यह सत्य के करीब है। स्वर्ण, आभूषण, रत्न आदि की प्राप्ति का स्वप्न, आने वाले समय में इसका क्षय दर्शाते हैं। वैसे ही मल मूत्र और अशुद्धियों से युक्त वातावरण के सपने से सम्मान पाना तथा शुभ वातावरण में समय व्यतीत होना लिखा है। लेकिन मरे हुए पशु और सूखे ताल का दृश्य इसका विपरीत बोध नहीं कराता, बल्कि आने वाले समय में विभिषीका को दर्शाता है। स्वप्न में सूर्य, चंद्र, मंदिर और भगवान स्वरूपों के दर्शन अति शुभ लिखे गए हैं। ऐसी तालिकाएं प्रायः पंचांगों में विद्वान ज्योतिषाचार्यों ने दे रखी हैं। ज्योतिषीय विवेचना में चंद्र को मन का कारक कहा गया है। अतः मन ही सपनों का जनक कहा जा सकता है। जिस जातक के लग्न में कमजोर ग्रह, दूषित चंद्र या दृष्टिगत शत्रु ग्रह होते हैं, वे जातक आसन के कमजोर माने जाते हैं। ऐसे लोगों को स्वप्न ज्यादा दिखते हैं तथा नजर दोष, डर, भय के ज्यादा शिकार होते हैं। मनोवैज्ञानिक भी इसके उपचार में यथासाध्य दिमागी रोग का इलाज करते हैं। ज्योतिष संभावनाओं और पूर्व सूचनाओं का संपूर्ण विज्ञान है। दिवा स्वप्न हो या रात्रि स्वप्न, डरावने सपने हों या निरर्थक स्वप्न, इन सबों से छूटकारा पाने का एक मंत्र, जो प्रख्यात आचार्यों द्वारा प्रतिपादित है यहां दिया जा रहा है -

मंगलम्‌ भगवान विष्णु मंगलम्‌ गरुड़ोध्वजः।

मंगलम्‌ पुण्डरीकाक्ष मंगलायस्तनोहरिः।

यः स्मरेत्‌ पुण्डिरीकाक्षं सः बाह्याभ्यन्तरः शुचिः’॥

बुरे सपनों को दूर करने हेतु जातक या उसके माता पिता को श्रद्धा से पूजा-पाठ के समय इसका जप करना चाहिए। नियमित रूप से इष्ट/गुरु के सम्मुख इस मंत्र की प्रार्थना का प्रभाव देखा जा सकता है। कुछ ही दिनों में भय उत्पन्न करने वाले एवं निकृष्ट सपनों का निश्चित परिमार्जन होता देखा गया है। साथ ही साथ आनेवाले समय में देवी-देवताओं की आकृतियों का आभास होने लगता है। आंखें बंद कर पूजा करने वाले भी देवताओं की आकृति का स्मरण करते हैं, वैसे ही स्वप्नों में भी इनकी आकृति अतिशुभ है। जीवन के होते हुए भी मृत्यु सत्य है, वैसे ही जगत के स्वप्निल होते हुए भी स्वप्न का अस्तित्व है, चाहे वे इस जीवन के हों या जन्म जन्मांतरण के। अंतरात्मा का ज्ञान एक मूर्त सत्य है, यह पूर्ण श्रद्धा उदित करती है और यही इसका आधार है।

 

साँस तेज, नाड़ी तेज और तापमान भी अधिक रहता है। यह अवस्था प्रायः रात में 4-5 बार आती है। इस अवस्था में शरीर के अंग गतिमान होते हैं। नाड़ी बढ़ी हुई और मस्तिष्क जागृति वाली स्थिति का प्रकार दर्शाता है।

 

सपने देखना मानव जीवन की एक आवश्यक आवश्यकता है। सपने देखने में कमी होने का मतलब है आप में प्रोटीन की कमी है या फिर आप पर्सनॉलिटी डिसऑर्डर के शिकार हैं।

 

—–साँप- भारतीय परंपरा में मदमस्त साँप को देखने का अर्थ है, कुंडली का जागृत होना तथा आंतरिक प्रेरणा एवं बाहरी सजग दृष्टिकोण के बीच संघर्ष के रहते सपनों में हिलते सर्प दिखाई देते हैं।

—– पक्षी- पक्षी आत्मा या वासनाओं से मुक्ति का प्रतीक होता है। स्वप्न में पक्षी किस अवस्था में दिखता है उसी से आत्मा की स्थिति का अनुमान लगाया जाता है।

—– उड़ना- यह आत्मविश्वास या स्वतंत्रता एवं मोक्ष का दर्शन है। आधुनिक विचारधारा इसे असाधारण क्षमता के प्रतीक के रूप में देखती है।

—-घोड़े- घोड़े का दिखना स्वस्थ होने का सूचक है। यह परोक्ष दर्शन की क्षमता सुझाता है। कुछ लोग इसका संबंध प्रजनन से जोड़ते हैं।

 

कुछ स्वप्न और उनका प्रभाव—–

—– यदि स्वप्न में व्यक्ति खुद को पर्वत पर चढ़ता पाए, तो उसे एक दिन सफलता निश्चित मिलती है।

——- उल्लू दिखाई दे, तो यह रोग अथवा शोक का सूचक माना जाता है।

यदि कोई बुरा स्वप्न दिखाई दे, तो नींद खुलते ही गायत्री मंत्र पढ़कर पानी पी लेना चाहिए। उसी समय हनुमान चालीसा का पाठ अवश्य करना चाहिए और फिर नहीं सोना चाहिए।

————– कबूतर दिखाई दे तो यह शुभ समाचार का सूचक है।

—– व्यक्ति खुद को रोटी बनाता देखे, तो यह रोग का सूचक है।

—- भंडारा कराते देखने पर व्यक्ति का जीवन धनधान्य से पूर्ण रहेगा।

—– दिन में दिखे स्वप्न निष्फल होते हैं।

—— सपनों में मनुष्य की रुचि हमेशा से ही है। हमारे वेदों-पुराणों में भी सपनों के बारे में जिक्र किया गया है। यदि कोई बुरा स्वप्न दिखाई दे, तो नींद खुलते ही गायत्री मंत्र पढ़कर पानी पी लेना चाहिए। उसी समय हनुमान चालीसा का पाठ अवश्य करना चाहिए और फिर नहीं सोना चाहिए।

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शुभाशुभ स्वप्नों के पुराणोक्त फल—-

 

जागृतावस्था में देखे, सुने एवं अनुभूत प्रसंगों की पुनरावृत्ति, सुषुप्तावस्था में मनुष्य को किसी न किसी रूप में एवं कभी-कभी बिना किसी तारतम्य के, शुभ और अशुभ स्वप्न के रूप में, दिग्दर्शित होती है, जिससे स्वप्न दृष्टा स्वप्न में ही आह्‌लादित, भयभीत और विस्मित होता है।

ज्ञानिक, या चिकित्सकीय दृष्टि से मानसिक उद्विग्नता, पाचन विकार, थकान, चिंता एवं आह्‌लाद के आधिक्य पर भी स्वप्न आधारित होते हैं। बहरहाल, शुभ स्वप्नों से शुभ कार्यों के अधिकाधिक प्रयास से कार्यसिद्धि में संलग्न होने का संकेत मिलता है और अशुभ स्वप्नों में आगामी संभावित दुखद स्थिति के प्रति सचेत रहने की नसीहत लेना विद्वानों द्वारा श्रेयष्कर बताया गया है। तदनुसार -

 

लक्षण स्वप्न शुभाशुभ, कह्यो, मत्स्य भगवान।

शुभ प्रयासरत, अशुभ से होंहि सचेत सुजान॥

 

श्री मत्स्य पुराण के २४२ वें अध्याय में बताया गया है कि सतयुग में जब भगवान अनंत जगदीश्वर ने मत्स्यावतार लिया था, तो मनु महाराज ने उनसे मनुष्य द्वारा देखे गये शुभाशुभ स्वप्न फल का वृत्तांत बताने का आग्रह किया था।

 

मनु महराज ने, अपनी जिज्ञासा शांत करने हेतु, मत्स्य भगवान से पूछा कि हे भगवान! यात्रा, या अनुष्ठान के पूर्व, या वैसे भी सामान्यतया जो अनेक प्रकार के स्वप्न मनुष्य को समय-समय पर दिखायी देते हैं, उनके शुभाशुभ फल क्या होते हैं, बताने की कृपा करें, यथा-

 

स्वप्नाख्यानं कथं देव गमने प्रत्युपस्थिते। दृश्यंते विविधाकाराः कशं तेषां फलं भवेत्‌॥

मत्स्य भगवान ने स्वप्नों के फलीभूत होने की अवधि के विषय में बताते हुये कहा :

कल्कस्नानं तिलैर्होमो ब्राह्मणानां च पूजनम्‌। स्तुतिश्च वासुदेवस्य तथा तस्यैव पूजनम्‌॥६॥

नागेंद्रमोक्षश्रवणं ज्ञेयं दुःस्वप्नाशनम्‌। स्वप्नास्तु प्रथमे यामे संवस्तरविपाकिनः॥७॥

षड्भिर्भासैर्द्वितीये तु त्रिभिर्मासैस्तृतीयके। चतुर्थे मासमात्रेण पश्यतो नात्र संशयः॥८॥

अरुणोदयवेलायां दशाहेन फलं भवेत्‌। एकस्यां यदि वा रात्रौशुभंवा यदि वाशुभम्‌॥९।

पश्र्चाद् दृषृस्तु यस्तत्र तस्य पाकं विनिर्दिशेत्‌। तस्माच्छोभनके स्वप्ने पश्र्चात्‌ स्वप्नोनशस्यते॥२०॥

 

अर्थात, रात्रि के प्रथम प्रहर में देखे गये स्वप्न का फल एक संवत्सर में अवश्य मिलता है। दूसरे प्रहर में देखे गये स्वप्न का फल ६ माह में प्राप्त होता है। तीसरे पहर में देखे गये स्वप्न का फल ३ माह में प्राप्त होता है। चौथे पहर में जो स्वप्न दिखायी देता है, उसका फल 1 माह में निश्चित ही प्राप्त होता है। अरुणोदय, अर्थात सूर्योदय की बेला में देखे गये स्वप्न का फल १० दिन में प्राप्त होता है। यदि एक ही रात में शुभ स्वप्न और दुःस्वप्न दोनों ही देखे जाएं, तो उनमें बाद वाला स्वप्न ही फलदायी माना जाना चाहिए, अर्थात्‌ बाद वाले स्वप्न फल के आधार पर मार्गदर्शन करना चाहिए। क्योंकि बाद वाला स्वप्न फलीभूत होता है, अतः यदि रात्रि में शुभ स्वप्न दिखायी दे, तो उसके बाद सोना नहीं चाहिए।

 

शैलप्रासादनागाश्र्ववृषभारोहणं हितम्‌। द्रुमाणां श्वेतपुष्पाणां गमने च तथा द्विज॥२॥

द्रुमतृणारवो नाभौ तथैव बहुबाहुता। तथैव बहुशीर्षत्वं फलितोद्भव एवं च॥२२॥

सुशुक्लमाल्यधारित्वं सुशुक्लांबरधारिता। चंद्रार्कताराग्रहणं परिमार्जनमेव च॥२३॥

सक्रध्वजालिंग्नं च तदुच्छ्रायक्रिया तथा। भूंयंबुधीनां ग्रसनं शत्रुणां च वधक्रिया॥२४॥

 

अर्थात, शुभ स्वप्नों के फल बताते हुए श्री मत्स्य भगवान ने मनु महाराज को बताया कि पर्वत, राजप्रासाद, हाथी, घोड़ा, बैल आदि पर आरोहण हितकारी होता है तथा जिन वृक्षों के पुष्प श्वेत, या शुभ हों, उनपर चढ़ना शुभकारी है। नाभि में वृक्ष एवं घास-फूस उगना तथा अपने शरीर में बहुत सी भुजाएं देखना, या अनेक शिर, या मस्तक देखना, फलों को दान करते देखना, उद्भिजों के दर्शन, सुंदर, शुभ अर्थात्‌ श्वेत माला धारण करना, श्वेत वस्त्र पहनना, चंद्रमा, सूर्य और ताराओं को हाथ से पकड़ना, या उनके परिमार्जन का स्वप्न दिखायी देना, इंद्र धनुष को हृदय से लगाना, या उसे ऊपर उठाने का स्वप्न दिखायी देना और पृथ्वी, या समुद्र को निगल लेना एवं शत्रुओं का वध करना, ऐसे स्वप्न देखना सर्वथा शुभ होता है। इसके अतिरिक्त भी जो स्वप्न शुभ होते हैं, वे निम्न हैं :

जयो विवादे द्यूते व संग्रामे च तथा द्विज। भक्षणं चार्द्रमांसानां मत्स्यानां पायसस्य च॥२५॥

दर्शनं रुधिरस्यापि स्नानं वा रुधिरेण च। सुरारुधिरमद्यानां पानं क्षीरस्य चाथ वा॥२६॥

अन्त्रैर्वा वेषृनं भूमौ निर्मलं गगनं तथा। मुखेन दोहनं शस्तं महिषीणां तथा गवाम्‌॥२७॥

सिंहीनां हस्तिनीनां च वडवानां तथैव च। प्रसादो देवविप्रेभ्यो गुरुभ्यश्र्च तथा शुभः॥२८॥

मत्स्य भगवान ने, मनु महाराज से उक्त तारतम्य में स्वप्नों के शुभ फलों की चर्चा करते हुए, बताया कि स्वप्न में संग्राम, वाद-विवाद में विजय, जुए के खेल में जीतना, कच्चा मांस खाना, मछली खाना, खून दिखाई देना, या रुधिर से नहाते हुए दिखाई देना, सुरापान, रक्तपान, अथवा दुग्धपान, अपनी आंतों से पृथ्वी को बांधते हुए देखना, निर्मल नभ देखना, भैंस, गाय, सिंहनी, हथिनी, या घोड़ी के थन में मुंह लगा कर दूध पीना, देवता, गुरु और ब्राह्मण को प्रसन्न देखना सभी शुभ फलदायी एवं शुभ सूचक होते हैं। मत्स्य भगवान ने और भी शुभ स्वप्नों की चर्चा करते हुए मनु महाराज को बताया :

अंभसा त्वभिषेकस्तु गवां श्रृग्सुतेन वा। चंद्राद् भ्रष्टेना वाराज४ाशेयोसज्यप्रदो हि सः॥२९॥

राज्याभिषेकश्र्च तथा छेदनं शिरसस्तथा। मरणं चह्निदाहश्र्च वह्निदाहो गृहादिषु॥३०।

लब्धिश्र्च राज्यलिग्नां तंत्रीवाद्याभिवादनम्‌। तथोदकानां तरणं तथा विषमलड़घनम्‌॥३१॥

हस्तिनीवडवानां च गवां च प्रसवों गृहे। आरोहणमथाश्र्वानां रोदनं च तथा शुभम्‌॥३२।

वरस्रीणां तथा लाभस्तथालिग्नमेव च। निगडैर्बंधनं धन्यं तथा विष्ठानुलेपनम्‌॥३२॥

जीवतां भूमिपालानां सुह्‌दामपि दर्शनम्‌। दर्शनं देवतानां च विमलानां तथांभसाम्‌॥३४॥

शुभांयथैतानि नरस्तु हष्ट्वा प्राप्नोत्ययत्वाद् ध्रुवमर्थलाभम्‌।

स्वप्नानि वै धर्मभृतां वरिष्ठ व्याधेर्विमोक्षं च तथातुरोऽपि॥३५॥

और भी अधिक शुभ स्वप्नों के फल मनु महाराज को बताते हुए श्री मत्स्य भगवान ने कहा कि राजन ! गौवों के सींग से स्रवित जल, या चंद्रमा से गिरते हुए जल से स्नान का स्वप्न सर्वथा शुभ एवं राज्य की प्राप्ति कराने वाला होता है। राज्यारोहण का स्वप्न, मस्तक कटने का स्वप्न, अपनी मृत्यु, प्रज्ज्वलित अग्नि देखना, घर में लगी आग का स्वप्न देखना, राज्य चिह्नों की प्राप्ति, वीणा वादन, या श्रवण, जल में तैरना, दुरूह स्थानों को पार करना, घर में हस्तिनी, घोड़ी तथा गौ का प्रसव देखना, घोड़े की सवारी करते देखना, स्वयं को रोते देखना आदि स्वप्न शुभ और मंगल शकुन के द्योतक होते हैं। इसके अतिरिक्त सुंदरियों की प्राप्ति तथा उनका आलिंगन, जंजीर में स्वयं को बंधा देखना, शरीर में मल का लेप देखना, जो राजा मौजूद हैं, उन्हें स्वप्न में देखना, मित्रों को स्वप्न में देखना, देवताओं का दर्शन, निर्मल जल देखने के स्वप्न भी सर्वथा शुभकारी होते हैं, जिससे बिना प्रयास के धन-ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है तथा रुग्ण व्यक्ति रोगमुक्त हो जाता है। अशुभ स्वप्नों एवं उनके फलों के विषय में श्री मत्स्य भगवान मनु महाराज को बताते हुए कहते हैं :

इदानीं कथयिष्यामि निमित्तं स्वप्नदर्शने। नाभिं विनान्यगात्रेषु तृणवृक्षसमुरवः॥२।

चूर्णनं मूध्निं कांस्यानां मुण्डनं नग्नता तथा। मलिनांबरधारित्त्वमभ्यग्ः पटदिग्धता॥३॥

उच्चात्‌ प्रपतनं चैव दोलारोहणमेव च। अर्जनं पटलोहानां हयानामपि मारणम्‌॥४॥

रक्तपुष्पद्रुमाणां च मंडलस्य तथैव च। वराहर्क्षखरोष्ट्राणां तथा चारोहणक्रिया॥५॥

भक्षणं पक्षिमत्स्यानां तैलस्य कृसरस्य च। नर्तनं हसनं चैव विवाहो गीतमेव च॥६॥

तंत्रीवाद्यविहीनानां वाद्यानामभिवादनम्‌। स्रोतोऽवगाहगमनं स्नानं गोमयवारिणा॥७॥

पटोदकेन च तथा महीतोयेन चाप्यथ। मातुः प्रवेशा जठरे चितारोहणमेव च॥८॥

शक्रध्वजाभिपतनं पतनं शशिसूर्ययोः। दिव्यांतरिक्षभौमानामुत्पातानां च दर्शनम्‌॥९॥

अर्थात, मत्स्य भगवान ने विभिन्न स्वप्नों के अशुभ फलों की ओर इंगित करते हुए मनु महाराज से कहा कि हे राजन! स्वप्न में नाभि के अतिरिक्त, शरीर के अन्य अंगों में घास, फूस, पेड़-पौधे उगे हुए देखना, सिर पर कांसे को कुटता देखना, मुंडन देखना, अपने को नग्न देखना, स्वयं को मैले कपड़े पहने हुए देखना, तेल लगाना, कीचड़ में धंसना, या कीचड़ लिपटा देखना, ऊंचे स्थान से गिरना, झूला झूलना, कीचड़ और लोहा आदि एकत्रित करना, घोड़ों को मारना, लाल फूलों के पेड़ पर चढ़ना, या लाल पुष्पों के पेड़ों का मंडल, सूअर, भालू, गधे और ऊंटों की सवारी करना, पक्षियों का भोजन करना, मछली, तेल और खिचड़ी खाना, नृत्य करना, हंसना, विवाह एवं गाना-बजाना देखना, बीणा के अलावा अन्य वाद्यों को बजाना, जल स्रोत में नहाने जाना, गोबर लगा कर जल स्नान, कीचड़युक्त उथले जल में नहाना, माता के उदर में प्रवेश करना, चिता पर चढ़ना, इंद्र पताका का गिरना, चंद्रमा एवं सूर्य को गिरते देखना, अंतरिक्ष में उल्का पिंडों के उत्पात आदि स्वप्न में देखना सर्वथा अशुभ है।

देवद्विजातिभूपालगुरूणं क्रोध एवं च। आलिग्नं कुमारीणां पुरुषाणां च मैथुनम्‌॥१०॥

हानिश्चैव स्वगात्राणां विरेकवमनक्रिया। दक्षिणाशाभिगमनंव्याधिनाभिभवस्तथा॥११॥

फलापहानिश्र्च तथा पुष्पहानिस्तथैव च। गृहाणां चैव पातश्च गृहसम्मार्जनं तथा॥२॥

क्रीड़ा पिशाचक्रव्याद्वानरर्क्षनररैपि। परादभिभवश्चैव तस्मांच व्यसनारवः॥३॥

काषायवस्रधारित्वं तद्वत्‌ स्त्रीक्रीडनं तथा। स्नेहपानवगाहौ च रक्तमाल्यानुलेपनम्‌॥४॥

एवमादीनि चान्यानि दुःस्वप्नानि विनिर्दिशेत्‌। एषा। संकथनं धन्यं भूयः प्रस्वापनं तथा॥५॥

अर्थात, श्री मत्स्य भगवान्‌, स्वप्नों के अशुभ फलों के विषय में मनु महाराज को बताते हुए पुनः कहते हैं कि देवता! राजा और गुरुजनों को क्रोध करते देखना, स्वप्न में कुमारी कन्याओं का आलिंगन करना, पुरुषों का मैथुन करना, अपने शरीर का नाश, कै-दस्त करते स्वयं को देखना, स्वप्न में दक्षिण दिशा की यात्रा करना, अपने को किसी व्याधि से ग्रस्त देखना, फलों और पुष्पों को नष्ट होते देखना, घरों को गिरते देखना, घरों में लिपाई, पुताई, सफाई होते देखना, पिशाच, मांसाहारी पशुओं, बानर, भालू एवं मनुष्यों के साथ क्रीड़ा करना, शत्रु से पराजित होना, या शत्रु की ओर से प्रस्तुत किसी विपत्ति से ग्रस्त होना, स्वयं को मलिन वस्त्र स्वयं पहने देखना, या वैसे ही वस्त्र पहने स्त्री के साथ क्रीड़ा करना, तेल पीना, या तेल से स्नान करना, लाल पुष्प, या लाल चंदन धारण करने का स्वप्न देखना आदि सब दुःस्वप्न हैं। ऐसे दुःस्वप्नों को देखने के बाद तुरंत सो जाने से, या अन्य लोगों को ऐसे दुःस्वप्न बता देने से उनका दुष्प्रभाव कम हो जाता है।

दुःस्वप्नों के दुष्प्रभाव के शमन का उपाय बताते हुये मत्स्य भगवान मनु महाराज से कहते है :

कलकस्नानं तिलैर्होमो ब्रह्मणानां च पूजनम्‌। स्तुतिश्च वासुदेवस्य तथातस्यैव पूजनम्‌॥

नागेंद्रमोक्ष श्रवणं ज्ञेयं दुःस्वप्नाशनम्‌॥

अर्थात, ऐसे दुःस्वप्न देखने पर कल्क स्नान करना चाहिए, तिल की समिधा से हवन कर के ब्राह्मणों का पूजन, सत्कार करना चाहिए। भगवान वासुदेव की स्तुति (पूजन द्वादश अक्षरमंत्र ÷ त्त् नमो भगवते वासुदेवाय’ का जप) करनी चाहिए और गजेंद्र मोक्ष कथा का पाठ, या श्रवण करना चाहिए। इनसे दुःस्वप्नों के दुष्प्रभाव का शमन होता है।

लेकिन हमें सपने आते क्यूँ हैं ?

इस बारे में सभी स्वप्न विचारकों के अपने-अपने मत है। कुछ विचारक मानते हैं कि सपनॊं का दिखना इस बात का प्रमाण है कि आप के भीतर कुछ ऐसा है जो दबाया गया है। वहीं सपना बन कर दिखाई देता है। हम कुछ ऐसे कार्य जो समाज के भय से या अपनी पहुँच से बाहर होने के कारण नही कर पाते, वही भावनाएं हमारे अचेतन मन में चले जाती हैं और अवसर पाते ही सपनों के रूप में हमे दिखाई देती हैं। यह स्वाभाविक सपनों की पहली स्थिति होती है।

एक दूसरा कारण जो सपनों के आने का है,वह है किसी रोग का होना। प्राचीन आचार्य इसे रोगी की “स्वप्न-परिक्षा” करना कहते थे।

हम जब भी बिमार पड़ते हैं तो मानसिक व शरीरिक पीड़ा के कारण हमारी नीदं या तो कम हो जाती है या फिर झँपकियों का रूप ले लेती है। ऐसे में हम बहुत विचित्र-विचित्र सपने देखते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि बहुत डरावनें सपने आने लगते हैं। जिस कारण रात को कई-कई बार हमारी नीदं खुल जाती है और फिर भय के कारण हमे सहज अवस्था मे आने में काफी समय लग जाता है।

 

इस बारे में प्राचीन आयुर्वेदाचार्यों का मानना है कि रोगी अवस्था मे आने वाले सपनें अकसर रोग की स्थिति की ओर संकेत करते हैं। वे आचार्य रोगी के देखे गए सपनों के आधार पर रोग की जटिलता या सहजता का विचार करने में समर्थ थे। वह इन का संम्बध , उन रोगीयों की मानसिक दशाओ की खोज का विषय मानते थे और उसी के परिणाम स्वरूप जो निष्कर्ष निकलते थे , उसी के अनुसार अपनी चिकित्सा का प्रयोग उस रोग का निदान करने मे करते थे। उन आचार्यों के स्वप्न विचार करने के कुछ उदाहरण देखें-

 

१.यदि रोगी सिर मुंडाएं ,लाल या काले वस्त्र धारण किए किसी स्त्री या पुरूश को सपने में देखता है या अंग भंग व्यक्ति को देखता है तो रोगी की दशा अच्छी नही है।

 

२. यदि रोगी सपने मे किसी ऊँचे स्थान से गिरे या पानी में डूबे या गिर जाए तो समझे कि रोगी का रोग अभी और बड़ सकता है।

 

३. यदि सपने में ऊठ,शेर या किसी जंगली जानवर की सवारी करे या उस से भयभीत हो तो समझे कि रोगी अभी किसी और रोग से भी ग्र्स्त हो सकता है।

 

४. यदि रोगी सपने मे किसी ब्राह्मण,देवता राजा गाय,याचक या मित्र को देखे तो समझे कि रोगी जल्दी ही ठीक हो जाएगा।

 

५.यदि कोई सपने मे उड़ता है तो इस का अभिप्राय यह लगाया जाता है कि रोगी या सपना देखने वाला चिन्ताओं से मुक्त हो गया है।

 

६.यदि सपने मे कोई मास या अपनी प्राकृति के विरूध भोजन करता है तो ऐसा निरोगी व्यक्ति भी रोगी हो सकता है।

 

७,यदि कोई सपने में साँप देखता है तो ऐसा व्यक्ति आने वाले समय मे परेशानी में पड़ सकता है।या फिर मनौती आदि के पूरा ना करने पर ऐसे सपनें आ सकते हैं।

 

ऊपर दिए गए उदाहरणों के बारे मे एक बात कहना चाहूँगा कि इन सपनों के फल अलग- अलग ग्रंथों मे कई बार परस्पर मेल नही खाते। लेकिन यहाँ जो उदाहरण दिए गए हैं वे अधिकतर मेल खाते हुए हो,इस बात को ध्यान मे रख कर ही दिए हैं।

 

ऐसे अनेकों सपनों के मापक विचारों का संग्रह हमारे प्राचीन आयुर्वेदाचार्यों ने जन कल्याण की भावना से प्रेरित हो , हमारे लिए रख छोड़ा है। यह अलग तथ्य है कि आज उन पर लोग विश्वास कम ही करते हैं।

 

यहाँ सपनों के आने का तीसरा कारण भी है।वह है सपनों के जरीए भविष्य-दर्शन करना।

 

हम मे से बहुत से ऐसे व्यक्ति भी होगें जिन्होंने सपनें मे अपने जीवन मे घटने वाली घटनाओं को, पहले ही देख लिया होगा। ऐसा कई बार देखने मे आता है कि हम कोई सपना देखते हैं और कुछ समय बाद वही सपना साकार हो कर हमारे सामने घटित हो जाता है। यदि ऐसे व्यक्ति जो इस तरह के सपने अकसर देखते रहते हैं और उन्हें पहले बता देते हैं , ऐसे व्यक्ति को लोग स्वप्न द्रष्टा कहते हैं।

 

हमारे प्राचीन ग्रंथों में भी कई जगह ऐसे सपने देखनें का जिक्र भी आया है , जैसे तृजटा नामक राक्षसी का उस समय सपना देखना,जब सीता माता रावण की कैद मे थी और वह सपनें मे एक बड़े वानर द्वारा लंका को जलाए जाने की बात अपनी साथियों को बताती है। यह भी एक सपने मे भविष्य-दर्शन करना ही है।

 

कहा जाता है कि ईसा मसीह सपनों को पढना जानते थे। वह अकसर लोगो द्वारा देखे सपनों की सांकेतिक भाषा को सही -सही बता देते थे। जो सदैव सत्य होते थे।

 

आज की प्रचलित सम्मोहन विधा भी भावनाऒं को प्रभावित कर,व्यक्ति को सपने की अवस्था मे ले जाकर, रोगी की मानसिक रोग का निदान करने में प्रयोग आती है। वास्तव मे इस विधा का संम्बध भी सपनों से ही है। इस मे भावनाओं द्वारा रोगी को कत्रिम नीदं की अवस्था मे ले जाया जाता है।

 

कई बार ऐसा होता है कि हम जहाँ सो रहे होते है, वहाँ आप-पास जो घटित हो रहा होता है वही हमारे सपने में जुड़ जाता है। या जैसे कभी हमे लघुशंका की तलब लग रही होती है तो हम सपने भी जगह ढूंढते रहते हैं। हमारा सपना उसी से संबंधित हो जाता

 

स्वप्न की प्रक्रिया और फलादेश——

स्वप्न मुख्यतः ÷स्वप्न निद्रा’ की अवस्था में आते हैं। सुषुप्ति अवस्था में देखे गये स्वप्न प्रायः सुबह तक याद नहीं रहते। यह आवश्यक नहीं कि स्वप्न में देखा गया सब कुछ अर्थपूर्ण हो। मानस और चिकित्सा शास्त्रियों के अनुसार जो व्यक्ति अनावश्यक इच्छाओं, चंचल भावनाओं, उच्च आकांक्षाओं और भूत-भविष्य की चिंता से अपने को मुक्त रखते हैं, वही गहरी निद्रा ले पाते हैं। गहरी निद्रा स्वस्थ जीवन के लिए परम आवश्यक है।

 

दू धर्म शास्त्रों-अथर्ववेद, योगसूत्र, पुराण, उपनिषदों इत्यादि में स्वप्नों का आध्यात्मिक विश्लेशण मिलता है, जिसके अनुसार स्वप्न की क्रिया मनुष्य की आत्मा से जुड़ी है और आत्मा परमात्मा से। मन की कल्पना शक्ति असीम है। महर्षि वेदव्यास ÷ब्रह्मसूत्र’ में बताते हैं कि मस्तिष्क में पिछले जन्मों का ज्ञान सुषुप्त अवस्था में रहता है। शुद्ध आचरण वाले धार्मिक और शांत चित्त व्यक्ति के सपने, दैविक संदेशवाहक होने के कारण, सत्य होते हैं। परंतु चिंताग्रस्त, या रोगी व्यक्ति का मन अशांत होने के कारण उसके स्वप्न निष्फल होते हैं। स्वप्न भावी जीवन यात्रा से जुड़े शुभ और अशुभ प्रसंग, यहां तककि विपत्ति, बीमारी और मृत्यु की पूर्व सूचना देते हैं।

गौतम बुद्ध के जन्म से कुछ दिन पहले उनकी माता रानी माया ने स्वप्न में एक सूर्य सा चमकीला, ६ दांतों वाला सफेद हाथी देखा था, जिसका अर्थ राज्य के मनीषियों ने एक उच्च कोटि के जगत प्रसिद्ध राजकुमार के जन्म का सूचक बताया, जो सत्य हुआ।

पाश्चात्य देशों में स्वप्न पर शोध कार्य सर्वप्रथम शारीरिक और फिर मानसिक स्तर पर किया गया। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में चिकित्सकों के मतानुसार अप्रिय स्वप्नों का कारण अस्वस्थता, सोते समय सांस लेने में कठिनाई और मस्तिष्क में ऑक्सीजन की कमी होना था। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार तलाक, नौकरी छूटना, व्यापार में घाटा, या परिवार में किसी सदस्य की अचानक मृत्यु के कारण उत्पन्न मानसिक तनाव बार-बार आने वाले स्वप्नों में परिलक्षित होते हैं।

पाश्चात्य शोध के अनुसार जाग्रत अवस्था में सांसारिक वस्तुओं और घटनाओं का मानव मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ता है, जिससे अनेक विचारों और इच्छाओं का जन्म होता है। जो प्रसंग मन में अपूर्ण रहते हैं, वे निद्रा की अवस्था में, व्यवस्थित या अव्यवस्थित रूप में, अभिव्यक्त होते हैं। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक सिगमंड फ्रॉयड ने अपनी पुस्तक ÷थ्योरी ऑफ ड्रीम्स’ में बताया कि मनुष्य की इच्छाएं (मुख्यतः काम वासनाएं) जो समाज के भय से जाग्रत अवस्था में पूर्ण नहीं हो पातीं, वे स्वप्न में चरितार्थ हो कर व्यक्ति को मानसिक तृप्ति देती हैं और उसको तनावमुक्त और संतुलित रहने में सहायता करती हैं। परंतु यह सिद्धांत अंधे व्यक्ति द्वारा देखे गये स्वप्नों को समझाने में असमर्थ था। कुछ समय बाद फ्रॉयड ने अपने विचारों में परिवर्तन किया।

ड्रीम टेलीपैथी’ के लेखक डा. स्टैनली के अनुसार स्वप्नों की पुनरावृत्ति का संबंध वर्तमान में होने वाली समस्याओं और घबराहट से ही नहीं, अपितु अतीत से भी हो सकता है। बचपन में घटी कोई भयानक घटना का मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ने से उससे संबंधित स्वप्न अधिक दिखाई देते हैं।

स्वप्न की प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए डा. स्टैनली ने बताया कि मनुष्य का मस्तिष्क छोटी-छोटी घटनाओं एवं जानकारियों को संगठित रूप दे कर एक ऐसे निष्कर्ष (स्वप्न) पर पहुंचता है, जो कभी-कभी बहुत सही होता है। रोम के सम्राट जूलियस सीज+र की पत्नी ने उनकी हत्या की पिछली रात सपने में देखा था कि वह अपने बाल बिखेरे पति का लहूलुहान शरीर उठाये फिर रही है। उसने सीज+र को सीनेट जाने से मना किया, पर वह नहीं माना और सीनेट पहुंचने पर ब्रूटस ने उसकी हत्या कर दी। इसी प्रकार अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने अपनी हत्या को कुछ दिन पहले स्वप्न में देखा था।

पाश्चात्य शोधकर्ता अब भारतीय विचारधारा से सहमत हो रहे हैं। फ्रॉयड ने नये अनुभवों के आधार पर अगली पुस्तक ÷इंटरप्रटेशन ऑंफ ड्रीम्‌स’ में स्वीकार किया कि स्वप्न कभी-कभी मनुष्य की दबी इच्छाओं और मन की उड़ान से बहुत आगे की सूचना देने में सक्षम होते हैं। डॉ. हैवलॉक एलाईस अपनी पुस्तक ÷दि वर्ल्ड ऑफ ड्रीम्‌स’ में मानते हैं कि स्वप्न में सुषुप्त मस्तिष्क और ÷एकस्ट्रा सेंसरी परसेप्शन’ की बड़ी भूमिका होती है।

बुच सोसाईटी फॉर साईकिक रिसर्च’ हॉलैंड, के शोधकार्य ने यह प्रमाणित किया है कि कुछ स्वप्न भविष्य की घटनाओं की सही-सही पूर्वसूचना देते हैं। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डॉ. हैफनर मोर्स के अनुसार सतत प्रयत्न द्वारा सुषुप्त मस्तिष्क को जगा कर सपनों द्वारा ÷दिव्य दृष्टि’ प्राप्त की जा सकती है।

अत्यंत वृद्ध और काले शरीर वाली स्त्री का नाच देखना, अथवा नंगधडंग फकीर को नाचते, हंसते, अपनी ओर क्रूर दृष्टिपात करते देखना, काले वस्त्र पहने, हाथ में लौह का डंडा लिये किसी को देखना मृत्यु के सूचक होते हैं।

सपनों के शुभ-फल स्वप्न विषय शुभ फल स्वच्छ आकाश ऐश्वर्य वृद्धि आम का वृक्ष संतान प्राप्ति अपमान चिंताएं दूर होना अपनी मृत्यु आयु वृद्धि खड़ी फसल धन प्राप्ति अर्थी देखना रोग मुक्ति इमारत बनना धन लाभ, उन्नति हाथी, गाय, मोर धन लाभ, समृद्धि मधुमक्खी देखना लाभ ऊंचाई पर चढ़ना उन्नति कब्रिस्तान प्रतिष्ठा में वृद्धि काला नाग राज्य से सम्मान गंगा दर्शन सुखी जीवन किला देखना तरक्की होगी घोड़े पर चढ़+ना पदोन्नति छिपकली देखना अचानक धन लाभ डर कर भागना कष्ट से छुटकारा डोली देखना इच्छा पूरी होना तारे देखना मनोरथ पूरा होना तलवार देखना शत्रु पर विजय देवी-देवता खुशी की प्राप्ति धन एवं रत्न संतान सुख नाखून काटना रोग तथा दुख से मुक्ति न्यायालय झगड़े में सफलता मिठाई खाना मान-सम्मान हरा-भरा जंगल खुशी मिलेगी परीक्षा में असफल होना सफलता पत्र आना शुभ सूचक लहराता झंडा विजय की प्राप्ति भोजनयुक्त थाल शुभ सूचक तांबे का सिक्का मिलना धनदायक भोजन पकाना शुभ समाचार माला जपना भाग्योदय सीधी सड़क पर चलना सफलता खुला दरवाजा देखना नया काम बनना कौआ उड़ाना मुसीबत से छुटकारा सपनों के अशुभ फल स्वप्न विषय अशुभ फल अग्नि देखना पित्त संबंधी रोग अग्नि उठाना परेशानी होगी अपनी शादी संकट आना अतिथि आना आकस्मिक विपत्ति अंधेरा देखना दुख मिलेगा आंधी-तूफान मुसीबत में फंसना उल्लू देखना रोग-शोक होगा उल्टा लटकना अपमान होना कटा सिर देखना चिंता, परेशानी कुत्ते का काटना शत्रु भय घोड़े से गिरना परेशानी चोर देखना धन हानि जेब कटना धन हानि झाड़ू देखना नुकसान होना डूबते देखना अनिष्ट सूचक दीवार गिरना धन हानि नल देखना चिंता नंगा देखना कष्ट प्राप्ति ऊंचाई से गिरना हानि होना बंदूक देखना संकट आना बिल्ली देखना लड़ाई होना भाषण देना वाद-विवाद कौआ दर्शन अशुभ सूचक ताला लगा होना कार्य रुकना भोजनरहित थाली अशुभ सूचक खराब सड़क पर चलना परेशानी आना

 

कुछ शब्दों के अनुसार उनके स्वप्न फल —-

 

अ——

अखरोट देखना – भरपुर भोजन मिले तथा धन वृद्धि हो

अनाज देखना -चिंता मिले

अनार खाना (मीठा ) – धन मिले

अजनबी मिलना – अनिष्ट कीपूर्व सूचना

अजवैन खाना – स्वस्थ्य लाभ

अध्यापक देखना – सफलता मिले

अँधेरा देखना – विपत्ति आये

अँधा देखना – कार्य मेंरूकावट आये

अप्सरा देखना – धन और मानसम्मान की प्राप्ति

अर्थी देखना – धन लाभ हो

अमरुद खाना – धन मिले

अनानास खाना – पहले परेशानीफिर राहत मिले

अदरक खाना – मान सम्मान बढे

अनार के पत्ते खाना – शादी शीघ्र हो

अमलतास के फूल – पीलिया या कोढ़का रोग होना

अरहर देखना – शुभ

अरहर खाना – पेट में दर्द

अरबी देखना – सर दर्द या पेटदर्द

अलमारी बंद देखना – धन प्राप्ति हो

अलमारी खुली देखना – धन हानि हो

अंगूर खाना – स्वस्थ्य लाभ

अंग रक्षक देखना – चोट लगने काखतरा

अपने को आकाश में उड़ते देखना – सफलता प्राप्तहो

अपने पर दूसरौ का हमला देखना – लम्बी उम्र

अंग कटे देखना – स्वास्थ्य लाभ

अंग दान करना – उज्जवल भविष्य , पुरस्कार

अंगुली काटना – परिवार मेंकलेश

अंगूठा चूसना – पारवारिकसम्पति में विवाद

अन्तेस्ति देखना – परिवार मेंमांगलिक कार्य

अस्थि देखना – संकट टलना

अंजन देखना – नेत्र रोग

अपने आप को अकेला देखना – लम्बी यात्रा

अख़बार पढ़ना, खरीदना – वाद विवाद

अचार खाना , बनाना – सिर दर्द, पेट दर्द

अट्हास करना – दुखद समाचारमिले

अध्यक्ष बनना – मान हानि

अध्यन करना -असफलता मिले

अपहरण देखना – लम्बी उम्र

अभिमान करना – अपमानित होना

अध्र्चन्द्र देखना – औरत से सहयोगमिले

अमावस्या होना – दुःख संकट सेछुटकारा

अगरबत्ती देखना – धार्मिकअनुष्ठान हो

अगरबत्ती जलती देखना – दुर्घटना हो

अगरबत्ती अर्पित करना – शुभ

अपठनीय अक्षर पढना – दुखद समाचारमिले

अंगीठी जलती देखना – अशुभ

अंगीठी बुझी देखना – शुभ

अजीब वस्तु देखना – प्रियजन के आनेकी सूचना

अजगर देखना – शुभ

अस्त्र देखना – संकट से रक्षा

अंगारों पर चलना – शारीरिक कष्ट

अंक देखना सम – अशुभ

अंक देखना विषम – शुभ

अस्त्र से स्वयं को कटा देखना – शीघ्र कष्टमिले

अपने दांत गिरते देखना – बंधू बांधव कोकष्ट हो

आंसू देखना – परिवार मेंमंगल कार्य हो

आवाज सुनना – अछा समय आनेवाला है

आंधी देखना – संकट सेछुटकारा

आंधी में गिरना – सफलता मिलेगी

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आ—-

आइना देखना –इच्छा पूरण हो , अछा दोस्तमिले

आइना में अपना मुहं देखना – नौकरी मेंपरेशानी , पत्नी में परेशानी

आसमान देखना – ऊचा पदप्राप्त हो

आसमान में स्वयं को देखना – अच्छीयात्रा का संकेत

आसमान में स्वयं को गिरते देखना – व्यापारमें हानि

आग देखना – गलत तरीकेसे धन की प्राप्ति हो

आग जला कर भोजन बनाना – धन लाभ , नौकरी मेंतरक्की

आग से कपडा जलना – अनेक दुखमिले , आँखों का रोग

आजाद होते देखना – अनेकचिन्ताओ से मुक्ति

आलू देखना – भरपूर भोजनमिले

आंवला देखना – मनोकामनापूर्ण न होना

आंवला खाते देखना – मनोकामनापूर्ण होना

आरू देखना – प्रसनता कीप्राप्ति

आक देखना – शारारिककष्ट

आम खाते देखना – धन औरसंतान का सुख

आलिंगन देखना पुरुष का औरत से – काम सुख कीप्राप्ति

आलिंगन देखना औरत का पुरुष से – पति सेबेवफाई की सूचना

आलिंगन देखना पुरुष का पुरुष से- शत्रुताबढ़ना

आलिंगन देखना औरत का औरत से – धनप्राप्ति का संकेत

आत्महत्या करना या देखना – लम्बी आयु

आवारागर्दी करना – धन लाभ होनौकरी मिले

आँचल देखना – प्रतियोगितामें विजय

आँचल से आंसू पोछना – अछा समयआने वाला है

आँचल में मुँह छिपाना – मान समानकी प्राप्ति

आरा चलता हुआ देखना – संकट शीघ्रसमाप्त होगे

आरा रूका हुआ देखना- नए संकट आने का संकेत

आवेदन करना या लिखना – लम्बी यात्राहो

आश्रम देखना – व्यापारमें घाटा

आट्टा देखना – कार्य पूराहो

आइसक्रीम खाना – सुख शांतिमिले

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इ—–

इमली खाते देखना – औरत के लिए शुभ ,पुरुष के लिए अशुभ

इडली साम्भर खाते देखना – सभी से सहयोगमिले

इष्ट देव की मूर्ति चोरी होना – मृत्युतुल्यकष्ट आये

इश्तहार पढना – धोखा मिले, चोरी हो

इत्र लगाना – अछे फल कीप्राप्ति, मान सम्मान बढेगा

इमारत देखना – मान सम्मान बढे, धन लाभ हो

ईंट देखना – कष्ट मिलेगा

इंजन चलता देखना – यात्रा हो , शत्रु सेसावधान

इन्द्रधनुष देखना – संकट बढे , धन हानि हो

इक्का देखना हुकम का – दुःख व् निराशामिले

इक्का देखना ईंट का -कष्टकारक स्तिथि

इक्का देखना पान का -पारवारिक क्लेश

इक्का देखना चिड़ी का – गृह क्लेश ,अतिथि आने कीसूचना

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ल——————

लंगर खाना या देखना -धन वृद्धि हो ,व्यवसाय में तेजी आये

लंगूर देखना -शुभ समाचार मिले

लंगोटी देखना -आर्थिक कठिनाईया बढे

लकीर खींचना -गृह कलेश बढे , अनावश्यक झगडे हो

लटकना या लटकते हुए देखना -सोचा हुआ काम शीघ्र बने , आर्थिक समृद्धि बढे

लड़का गोद में देखना (अपना) – धन वृद्धि हो , व्यवसाय में तेजी आये

लड़का गोद में देखना (अनजान) – परेशानी बढे ,घर में कलेश हो

लड़ना – विद्रोहियों के साथ – देश तथा समाज में अशांति फैले

लगाम देखना -मान सम्मान बढे , धन वृद्धि हो

लक्ष्मी का चित्र देखना -धन तथा सुख सौभाग्य की वृद्धि हो

लहसुन देखना – धन वृद्धि हो परन्तु अन्न व् सब्जी के व्यापार में हानि हो

लक्कड़ बाघ देखना – नयी मुसीबतें आने का संकेत

लपटें देखना (आग की ) – परिवार में शान्ति बढे , झगडा ख़तम हो

लाल आँखे देखना – शुभ फल की प्राप्ति

लालटेन जलना – चलते हुए काम में रोड़ा अटके

लालटेन बुझाना – अनेक समस्या स्वयं निपट जाये

लाट या मीनार देखना -आयु वृद्धि हो , सुख शान्ति बढे

लाठी देखना -सुख शांति में वृद्धि हो ,अच्छे सहयोगी मिले

लाल टीका देखना -सत्संग से लाभ हो, कामो में सफलता मिले

लाल वस्त्र दिखाई देना – धन नाश हो ,खतरा बढे

लाल आकाश में देखना -लडाई झगडा व् आतंक में वृद्धि ,धन तथा देश की हानि हो

लिबास (अपने कपडे)सफ़ेद देखना – सुख , शान्ति तथा समृद्धि में वृद्धि हो

लिबास हरा देखना – धन दौलत बढे , स्वस्थ्य अच्चा हो

लिबास पीला देखना -स्वस्थ्य में खराबी आये ,चोरी हो

लिबास मैला देखना -धन हानि हो ,खराब समय आने वाला है

लिफाफा खोलना -समाज में मानहानि हो , गुप्त बात सामने आये

लोहा देखना – काफी मेहनत करने के बाद सफलता मिले

लोहार देखना – मान सम्मान बढे , शत्रुओं पर विजय प्राप्त हो

लोबिया खाना – धन तथा व्यवसाय में वृद्धि हो

लौकी देखना या खाना -शुभ समाचार मिले , धन वृद्धि हो ,नौकरी में पदोंनिती हो

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उ—–

उजाड़ देखना –दूर स्थान की यात्रा हो

उस्तरा प्रयोग करना – यात्रा मेंधन लाभ हो

उपवन देखना – बीमारी कीपूर्व सूचना

उदघाटन देखना – अशुभ संकेत

उदास देखना – शुभ समाचारमिले

उधार लेना या देना – धन लाभ कासंकेत

स्वयं को उड़ते देखना – गंभीरदुर्घटना की पूर्व सूचना

उछलते देखना -दुखद समाचार मिलने का संकेत

उल्लू देखना -दुखों का संकेत

उबासी लेना – दुःख मिले

उल्टे कपडे पहनना – अपमान हो

उजाला देखना – भविष्य मेंसफलता का संकेत

उजले कपडे देखना -इज्जत बढे , विवाह हो

उठना और गिरना – संघर्षबढेगा

उलझे बाल या धागे देखना – परेशानियाबढेगी

उस्तरा देखना – धन हानि , चोरी का भय

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ऊ——-

ऊंघना – धन हानि , चोरी का भय

ऊंचाई पर अपने को देखना – अपमानित होना

ऊन देखना – धन लाभ हो

ऊंचे पहाड़ देखना – काफी मेहनत केबाद कार्य सिद्ध होना

ऊंचे वृक्ष देखना – मनोकामना पूरीहोने में समय लगना

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औ—

औषधी देखना –गलत संगति देखना

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ऐ—————–

ऐनक लगते देखना – विद्या मिले, ख़ुशी इज्जत मिले

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ट—–

टंकी खाली देखना –शुभ लक्षण

टंकी भरी देखना – अशुभ घटनाका संकेत

टाई सफेद देखना – अशुभ

टाई रंगीन देखना – शुभ

टेलेफोन करना – मित्रो कीसंख्या में वृद्धि

टोकरी खाली देखना – शुभ लक्षण

टोकरी भरी देखना – अशुभ घटनाका संकेत

टोपी उतारना – मान सम्मानबढे

टोपी सिर पर रखना – अपमान हो

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ठ—–

ठण्ड में ठिठुरना –सुख मिले

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च——

चलता पहिया देखना – कारोबार में उन्नत्ति हो

चप्पल पहनना – यात्रा पर जाना

चक्की देखना – मान सम्मान बढेगा

चमडा देखना – दुःख हो

चबूतरा देखना -मान सम्मान बढेगा

चट्टान देखना (काली ) – शुभ

चट्टान देखना (सफेद ) – अशुभ

चपत मारना – धन हानि हो

चपत खाना – शुभ फल की प्राप्ति

चरबी देखना – आग लगने का संकेत

चलना जमीन पर -नया रोजगार मिले

चलना पानी पर – कारोबार में हानि

चलना आसमान पर – बीमारी आने का संकेत

चन्द्र ग्रहण देखना – सभी कार्य बिगडे

चमगादर उड़ता देखना – लम्बी यात्रा हो

चमगादर लटका देखना – अशुभ संकेत

चम्मच देखना – नजदीकी व्यक्ति धोखा दे

चप्पल देखना – यात्रा पर जाना

चटनी खाना – दुखो में वृद्धि

चरखा चलाना – मशीनरी खराब हो

चश्मा खोना – चोरी के संकेत

चांदी के बर्तन में दूध पीना – संम्पत्ति में वृद्धि हो

चारपाई देखना – हानि हो

चादर शरीर पर लपेटना -गृह क्लेश बढे

चादर मैली देखना – धन लाभ हो

चादर समेट कर रखना – चोरी होने का संकेत

चंचल आँखे देखना – बीमारी आने की सूचना

चांदी का सामान देखना – गृह क्लेश बढे

चोकलेट खाना -अच्छा समय आने वाला है

चाय देखना – धन वृद्धि हो

चावल देखना – कठिनाई से धन मिले

चाकू देखना – अंत में विजय

चित्र देखना – पुराने मित्र से मिलन हो

चिडिया देखना – मेहमान आने का संकेत

चींटी देखना – धन लाभ हो

चींटिया बहुत अधिक देखना – परेशानी आये

चील देखना – बदनामी हो

चींटी मारना – तुंरत सफलता मिले

चुम्बन लेना – आर्थिक समृधि हो

चुम्बन देना – मित्रता बढे

चुटकी काटना – परिवार में कलेश

चुंगी देना – चलते काम में रूकावट

चुंगी लेना – आर्थिक लाभ

चुडैल देखना -धन हानि हो

चूहा देखना -औरत से धोखा

चूहा फंसा देखना – शरीर को कष्ट

चूहा चूहे दानी से निकलते देखना – कष्ट से मुक्ति

चूहा मरा देखना – धन लाभ

चूहा मारना – धन हानि

चूडिया तोड़ना – पति दीर्घायु हो (औरत के लिए )

चूल्हा देखना – उत्तम भोजन प्राप्त हो

चूरन खाना – बीमारी में लाभ

चेचक निकलना – धन की प्राप्ति

चोर पकड़ना – धन आने की सूचना

चोटी पर स्वयं को देखना – हानि हो

चोराहा देखना – यात्रा में सफलता

चौकीदार देखना – अचानक धन आये

चौथ का चाँद देखना – बहुत अशुभ

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ड—–

डंडा देखना –दुश्मन से सावधान रहे

डफली बजाना – घर मेंउत्सव की सूचना

डाक खाना देखना – बुरासमाचार मिले

डाकिया देखना – शुभ सूचनामिले

डॉक्टर देखना – निराशामिले

डाकू देखना – धन वृद्धिहो

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त——

तरबूज देखना –धन लाभ

तराजू देखना – कार्यनिष्पक्ष पूर्ण हो

तबला बजाना – जीवनसुखपूर्वक गुजरे

तकिया देखना – मान सम्मानबढे

तलवार देखना – शत्रु परविजय

तपस्वी देखना -मन शांत हो

तला पकवान खाना – शुभ समाचारमिले

तलाक देना – धन वृद्धिहो

तमाचा मारना -शत्रु पर विजय

तराजू में तुलना – भयंकरबीमारी हो

तवा खाली देखना – अशुभ लक्षण

तवे पर रोटी सेकना – संपत्तिबढे

तहखाना देखना या उसमे प्रवेश करना – तीर्थयात्रा पर जाने का संकेत

ताम्बा देखना – सरकार सेलाभ मिले

तालाब में तैरना – स्वस्थ्य लाभ

ताला देखना -चलते काम में रूकावट

ताली देखना – बिगडे कामबनेगे

तांगा देखना – सुख मिले, सवारी कालाभ हो

ताबीज बांधना – काम मेंहानि हो

ताबीज़ देखना – शुभ समय काआगमन

ताश देखना – मित्र अथवापडोसी से लडाई हो

तारा देखना – अशुभ

तितली देखना – विवाह होया प्रेमिका मिले

तितली उड़ कर दूर जाना – दांपत्यजीवन में क्लेश हो

तिल देखना – कारोबारमें लाभ

तिराहा देखना – लडाई झगडाहो

त्रिशूल देखना – अच्छामार्ग दर्शन मिले

त्रिमूर्ति देखना – सरकारीनौकरी मिले

तितली पकड़ना – नई संतानहो

तिजोरी बंद करना – धन वृद्धिहो

तिजोरी टूटती देखना – कारोबारमें बढोतरी

तिलक करना – व्यापारबढे

तूफान देखना या उसमे फँसना – संकट सेछुटकारा मिले

तेल या तेली देखना – समस्या बढे

तोलना –महंगाई बढे

तोप देखना -शत्रु पर विजय

तोता देखना – ख़ुशी मिले

तोंद बढ़ी देखना – पेट मेंपरेशानी हो

तोलिया देखना – स्वस्थ्यलाभ हो

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थ—–

थप्पर खाना –कार्य में सफलता

थप्पर मारना – झगडे मेंफँसना

थक जाना – कार्य मेंसफलता मिले

थर थर कंपना -मान सम्मान बढे

थाली भरी देखना – अशुभ

थाली खाली देखना – सफलता मिले

थूकना –मान सम्मान बढे

थैली भरी देखना – जमीनजायदाद में वृद्धि

थैली खाली देखना – जमीनजायदाद में झगडा हो

 

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ध————–

धमाका सुनना –कष्ट बढे

धतूरा खाना – संकट सेबचना

धनिया हरा देखना – यात्रा परजाना पढ़े

धनुष देखना – सभी कर्मोमें सफलता मिले

धब्बे देखना – शुभ संकेत

धरोहर लाना या देखना – व्यापारमें हानि हों

धार्मिक आयोजना देखना – शुभ संकेत

धागा देखना – कार्य मेंवृद्धि हों

धुरी देखना – मान सम्मानमें वृद्धि हों

धुआ देखना – कष्ट बढे , परेशानीमें फंसना पढ़े

धुंध देखना – शुभ समाचारमिले

धुन सुनना – परेशानीबढे

धूमधाम देखना – परेशानीबढे

धूल देखना – यात्रा हों

धोबी देखना – काम मेंसफलता मिले

धोती देखना – यात्रा परजाना पड़े

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म—–

मछर देखना – अपमानित होना पड़े

मछली देखना – गृहस्थी का सुख मिले

मखी देखना – धन हानि हो

मकडी देखना – बहुत अधिक मेहनत करनी पड़े

मकान बनते देखना – मान सम्मान में वृद्धि हो

मलाई खाना – धन वृद्धि हो

मंदिर या मस्जिद देखना – खुशहाली बढे

मंदिर में पुजारी देखना – गृह कलेश बढे

मर जाना – धन वृद्धि हो

मखमल पर बैठना – लम्बी बीमारी आये

मगरमच देखना – शुभ समाचार मिले

मंत्री देखना – मान सम्मान में वृद्धि हो

माला ( पूजा वाली ) शुभ समय आने का संकेत

माला फूलों की पहनाना- मान सम्मान में वृद्धि हो

मातम करना – खुशहाली बढे

माली देखना – घर में समृधि बढे

मिर्च खाना – काम में सफलता मिले

मिर्गी से पीड़ित होना या देखना – बुद्दि तेज हो

मिठाई खाना या बाँटना – बिगडे काम बने

मीट खाना – मनोकामना पूरण हो

मुर्दा उठा कर ले जाते देखना – बिना कमाया माल मिले

मुर्दे को जिन्दा देखना – चिंता दूर हो

मुर्दा शारीर से आवाज़ आना – बना काम बिगड़ जाना

मुर्दों का समूह देखना – गलत सोसाइटी में काम करना पड़े

मुर्दे को नहलाना – धन वृद्धि हो

मुर्दे को कुछ देना – शुभ समाचार

मुर्दे के साथ खाना -अच्छा समय आये

मुर्गा देखना -विदेश व्यापार बढे

मुर्गी देखना -गृहस्थी का सुख मिले

मोहर लगाना – धन वृद्धि हो

मुरझाये फूल देखना – संतान को कष्ट हो

मुंडन कराना या होते देखना -गृहस्थी का तनाव दूर हो

मुहर्रम देखना – कारोबार में उन्नत्ति हो

मूंगा पहनना या देखना – कारोबार में उन्नत्ति हो

मूंग मसूर या मोठ देखना – अनेक परेशानी हो

मोची देखना -यात्रा लाभदायक हो

मोम देखना – झगडे या विवाद में समझोता हो

मोर नाचते देखना – शुभ समाचार मिले

मोर मोरनी देखना – दांपत्य सुख में वृद्धि हो

मोजा पहनना – पति पत्नी में प्रेम बड़े

मोमबत्ती देखना – विवाह हो

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व—–

वकील देखना – कठिनाई बढे , झगडा हो

वजीफा पाना -काम में असफलता मिले , धनहानि हो

वरमाला देखना या डालना -घर में कलेश हो मित्र से लडाई हो

वसीयत करना -भूमि सम्बन्धी विवाद हो , घर में तनाव बढे

वायदा करना – झूठ बोलने की आदत पढ़े

वाह वाह करके हसना -मान सम्मान का ध्यान रखे , शत्रु बदनाम करेंगे

वार्निश करना (घर की वस्तुओं पर)- परिवार पर संकट आये, स्वस्थ्य खराब हो

वाष्प उड़ते देखना – धनहानि हो , दुर्घटना तथा शारीरिक कष्ट हो

विदाई समारोह में भाग लेना – व्यापार में तेजी आये , धन वृद्धि हो

विमान देखना – धन हानि हो

विस्फोट देखना या सुनना – नया कारोबार शुरू हो , बड़े व्यक्तियों से मुलाकात हो

वीणा बजाना (स्वयं द्वारा) – धन धान्य तथा समृद्धि प्राप्त हो

वीणा बजाना – शोक समारोह में शामिल होना पड़े , (दूसरो द्वारा)मानसिक कष्ट हो

वृद्धा देखना – अशुभ समाचार मिले

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द—–

दरवाजा बंद देखना – चिंता बढे

दही देखना -धन लाभ हो

दलिया खाना या देखना – स्वस्थ्य कुछ समय के लिए ख़राब हो

दरार देखना – घर में फूट

दलदल देखना – काम में आलस्य हो

दरवाजा खोलना – नया कार्य शुरू हो

दरवाजा गिरना – अशुभ संकेत

दक्षिणा लेना या देना – व्यापार में घाटा

दमकल चलाना – धन वृद्धि हो

दर्पण देखना – मानसिक अशांति

दस्ताना पहनना – शुभ समाचार

दहेज़ लेना या देना – चोरी की सम्भावना

दरजी को काम करते देखना – कोर्ट से छुटकारा

दवा खाना या खिलाना – अच्छा मित्र मिले

दवा गिरना – बीमारी दूर हो

दांत टूटना – शुभ

दांत में दर्द देखना -नया कार्य शुरू हो

दाडी देखना – मानसिक परेशानी हो

दादा या दादी देखना जो मृत हो – मान सम्मान बढे

दान लेना – धन वृद्धि हो

दान देना – धन हानि हो

दाह क्रिया देखना – सोचा हुआ कार्य बनने के संकेत

दातुन करना -कष्ट मिटे

दाना डालना पक्षियो को – व्यापार में लाभ हो

दाग देखना – चोरी हो

दामाद देखना -पुत्री को कष्ट हो

दाल कपड़ो पर गिरना -शुभ लक्षण

दाल पीना – कार्य में रूकावट

दाढ़ी सफेद देखना – काम में रूकावट

दाढ़ी काली देखना – धन वृद्धि हो

दियासिलाई जलाना – दुश्मनी बढे

दीपक बुझा देना – नया कार्य शुरू हो

दीपक जलाना – अशुभ समाचार मिले

दीवाली देखना – व्यापार में घाटा हो

दीपक देखना – मान सम्मान बढे

दुल्हन देखना – सुख मिले

दुकान करना – मान सम्मान बढे

दुकान बेचना – मानहानि हो

दुकान खरीदना – धन का लाभ होना

दुकान बंद होना – कष्टों में वृद्धि हो

दुपट्टा देखना – स्वस्थ्य में सुधार हों

दूल्हा /दुल्हन बनना – मानहानि हों

दूल्हा /दुल्हन बारात सहित देखना -बीमारी आये

दूरबीन देखना – मान सम्मान में हानि हों

दूध देखना – आर्थिक लाभ मिले

दुकान पर बैठना – प्रतिष्ट बढे,धन लाभ हों

देवता से मंत्र प्राप्त होना – नए कार्य में सफलता

देवी देवता देखना – सुख संपत्ति की वृद्धि होना

दोना देखना – धन संपत्ति प्राप्त होना

दोमुहा सांप देखना – दुर्घटना हों, मित्र द्वारा विश्वासघात मिले

दौड़ना – कार्य में असफलता हों

देवी देवता देखना – कृष्ण – प्रेम संबंधो में वृद्धि

देवी देवता देखना – राम – सफलता मिले

देवी देवता देखना – शिव – मानसिक शांति बढे

देवी देवता देखना – विष्णु – सफलता मिले

देवी देवता देखना – ब्रह्मा – अच्छा समय आने वाला है

देवी देवता देखना – हनुमान -शत्रु का नाश हो

देवी देवता देखना – दुर्गा – रोग दूर हो

देवी देवता देखना – सीता – पहले कष्ट मिले फिर समृधि हो

देवी देवता देखना – राधा – शारीरिक सुख मिले

देवी देवता देखना – लक्ष्मी – धन धन्य की प्राप्ति हो

देवी देवता देखना – सरस्वती -भविष्य सुखद हो

देवी देवता देखना – पार्वती – सफलता मिले

देवी देवता देखना – नारद -दूर से शुभ समाचार मिले..

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क—-

कब्र खोदना – धन पाए , मकान बनाये

कत्ल करना स्वयं का – अच्छा सपना है , बुरे काम से बचे

कद अपना छोटा देखना – अपमान सहना , परेशानी उठाना

कद अपना बड़ा देखना – भारी संकट आना

कसम खाते देखना – संतान का दुःख भोगना

कलम देखना – विद्या धन की प्राप्ति

कर्जा देना – खुशहाली आये

कर्जा लेना – व्यापार में हानि

कला कृतिया देखना – मान समान बढे

कपूर देखना – व्यापार में लाभ

कबाडी देखना – अच्छे दिनों की शुरूआत

कबूतर देखना – प्रेमिका से मिलना

कबूतरों का झुंड – शुभ समाचार मिले

कमल का फूल – ज्ञान की प्राप्ति

कपास देखना – सुख समृधि हो

कंगन देखना – अपमान हो

कदू देखना – पेट दर्द

कन्या देखना – धन वृद्धि हो

कफन देखना – लम्बी उम्र

कली देखना – स्वास्थ्य खराब हो

कछुआ देखना – शुभ समाचार मिले

कलश देखना – सफलता

कम्बल देखना – बीमारी आये

कपडा धोना – पहले रूकावट , फिर लाभ

कटा सिर देखना – शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी

कब्रिस्तान देखना – निराशा हो

कंघी देखना – चोट लगना , दांत या कान में दर्द

कसरत – बीमारी आने की सूचना

काली आँखे देखना – व्यापार में लाभ

काला रंग देखना – शुभ फल

काजू खाना – नया व्यापार शुरू हो

कान देखना – शुभ समाचार

कान साफ करना – अच्छी बातो का ज्ञान

काउंटर देखना – लेने देने में लाभ हो

कारखाना देखना – दुर्घटना में फसने की सूचना

काली बिल्ली देखना – लाभ हो

कुंडल पहने देखना – संकट हो

कुबडा देखना – कार्य में विघ्न

कुमकुम देखना – कार्य में सफलता

कुल्हाडी देखना – परिश्रम अधिक, लाभ कम

कुत्ता भोंकना – लोगो द्वारा मजाक उड़ना

कुत्ता झपटे – शत्रु की हार

कुर्सी खाली देखना – नौकरी मिले

कूड़े का ढेर देखना – कठिनाई के बाद धन मिले

किला देखना – ख़ुशी प्राप्त हो

कील देखना / ठोकना – परिवार में बटवारा हो

केश संवारना – तीर्थ यात्रा

केला खाना / देखना – ख़ुशी हो

केक देखना – अच्छी वस्तु मिले

कैमरा देखना – अपने भेद छिपा कर रखे

कोढ़ी देखना – धन का लाभ

कोहरा – संकट समाप्त हो

कोठी देखना – दुःख मिले

कोयल देखना / सुनना – शुभ समाचार

कोया देखना – शुभ संकेत

किसी ऊंचे स्थान से कूदना – असफलता

नर कंकाल देखना – उम्र बढने का संकेत

जप करना – विजय

कद लम्बा देखना – मृत्युतुल्य कष्ट हो

कद घटना – अपमान हो

कटोरा देखना – बनते काम बिगढ़ना

कनस्तर खाली देखना – शुभ

कनस्तर भरा देखना – अशुभ

कमंडल देखना – परिवार के किसी सदस्य से वियोग

करवा चौथ – औरत देखे तो आजीवन सधवा, पुरुष देखे तो धन धान्य संपूरण

कागज कोरा – शुभ

कागज लिखा देखना – अशुभ

सफेद कुरता देखना – शुभ

अन्य रंग का कुरता देखना – अशुभ

कुर्सी पर स्वयं को बैठे देखना – नया पद, पदोनती

कुर्सी पर अन्य को बैठे देखना – अपमान

कब्र खोदना – मकान का निर्माण करना

कपूर देखना – व्यापार नौकरी में लाभ

कबूतर देखना – प्रेमिका से मिलन

कपडा बेचते देखना – व्यापार में लाभ

कपडे पर खून के दाग – व्यर्थ बदनामी

कछुआ देखना – धन आशा से अधिक मिलना

कमल ककडी देखना – सात्विक भोजन में आनंद, ख़ुशी मिले

कपास देखना – सुख, समृधि घर आये

करी खाना – विधवा से विवाह, विधुर से विवाह

कृपाण – धरम कार्य पूर्ण होने की सूचना

कान देखना – शुभ समाचार

कान कट जाना – अपनों से वियोग

काला कुत्ता देखना – कार्य मे सफलता

काउंटर देखना – लेन देन में लाभ

काली बिल्ली देखना – शुभ समाचार

पीली बिल्ली देखना – अशुभ समाचार

काना व्यक्ति देखना – अनकूल समय नहीं

कीडा देखना – शक्ति का प्रतीक

कुम्हार देखना – शुभ समाचार

केतली देखना – दांपत्य जीवन में शांति हो

केला देखना या खाना – शुभ समाचार

कैंची – अकारण किसी से वाद- विवाद होना

कोठी देखना – दुःख मिले

कोयला देखना – प्रेम के जाल में फँस कर दुःख पाए

कुरान- सुख शांति की भावना बढे

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र—–

रजाई ओड़ना – धन मिले

रजाई नई बनवाना – स्थान परिवर्तन हो

रजाई फटी पुरानी देखना – शुभ कार्य के लिए निमंत्रण हो

रस्सी लपेटना – सफलता मिले

रथ देखना -यात्रा करनी पड़े

रसभरी खाना – विवाह हो

रसगुल्ला खाना – धन वृद्धि हो

रद्दी देखना – रुका हुआ धन मिले

रंग करना – सम्बंधित वास्तु की हानि हो

रक्षा करना – मान सम्मान में वृद्धि हो

रफू करना – नई वस्त्रो या आभूषनो की प्राप्ति हो

रक्षा बंधन देखना – धन वृद्धि हो

रसोई घर गन्दा देखना – अच्छा भोजन मिले

रसोई घर स्वछ देखना -धन का संकट आये

रास्ता देखना (साफ) -तरक्की मिले

रास्ता देखना (टेड़ा मेडा ) परेशानी हो

राख देखना – धन नाश हो

रॉकेट देखना – धन संपत्ति में वृद्धि हो

रात देखना -परेशानी आये

राइ देखना – काम में रूकावट आये

राक्षश देखना – संकट आये

रामलीला देखना – सुख सौभाग्य में वृद्धि

रिश्वत लेना – सावधान रहे

रिवाल्वर चलाना – शत्रुता समाप्त हो

रिक्शा देखना या उसमे बैठना – प्रसन्त्ता बढे

रेलवे स्टेशन देखना -लाभदायक यात्रा हो

रेल देखना – कष्ट दायक यात्रा हो

रेडियो बजता देखना – प्रगति में रूकावट हो

रेफ्रिजिरटर देखना – आर्थिक लाभ हो

रेगिस्तान देखना – धन सम्पदा में वृद्धि

रोजा रखना – आर्थिक संकट आने का संकेत

रोना – मान सम्मान में वृद्धि हो

रोशनदान से देखना – विदेश से धन की प्राप्ति हो

रोटी खाना या पकाना – बीमारी आने का संकेत

रोटी बाँटना – धन लाभ हो

रोटी फैंकना या गिरी हुई देखना – देश में मन न लगे , विदेश की यात्रा शीघ्र हो

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स्याही देखना – सरकार से सम्मान मिले

स्टोव जलाना – भोजन अच्छा मिले

संडास देखना – धन वृद्धि हो

संगीत देखना या सुनना – कष्ट बढे

संदूक देखना – पत्नी सेवा करे , अचानक धन मिले

सगाई देखना या उसमे शामिल होना -

सजा पाना – संकटों से छुटकारा मिलाना

सट्टा खेलना – धोखा होने का संकेत

सलाद खाते देखना – धन वृद्धि हो

सर्कस देखना – बहुत मेहनत करनी पड़े

सलाई देखना – मान सम्मान बढे

सरसों का साग खाना – बीमारी दूर हो

सरसों देखना – व्यापार में लाभ हो

ससुर देखना – शुभ समाचार मिले

सर कटा देखना – विदेश यात्रा हो

सर फटा देखना – कारोबार में हानि हो

सर मुंडाना – गृह कलेश में वृद्धि हो

सर के बाल झड़ते देखना – क़र्ज़ से मुक्ति मिले

ससुराल जाना – गृह कलेश में वृद्धि हो

समुद्र पार करना – उनत्ति मिले

साइकिल देखना -सफलता मिले

साइकिल चलाना – काम में तरक्की मिले

साइन बोर्ड देखना – व्यापार में लाभ हो

सावन देखना – जीवन में ख़ुशी मिले

साडी देखना – विवाह हो , दाम्पत्य जीवन में सुख मिले

सारस देखना – धन वृद्धि हो

साला या साली देखना – दाम्पत्य जीवन में सुख हो , मेहमान आये , धनवृद्धि हो

सागर सूखता देखना -बीमारी आये , अकाल पड़े

सारंगी बजाना – अपयश मिले , धन हानि हो

साग देखना – अचानक विवाद हो , सावधान रहे

साबुन देखना – स्वस्थ्य लाभ हो , बीमारी दूर हो

सांप मारना या पकड़ना – दुश्मन पर विजय हो , अचानक धन मिले

सांप से डर जाना -नजदीकी मित्र से विश्वासघात मिले

सांप से बातें करना -शत्रु से लाभ मिले

सांप नेवले की लडाई देखना – कोर्ट कचेहरी जाना पड़े

सांप के दांत देखना -नजदीकी रिश्तेदार हानि पहुंचाएंगे

सांप छत्त से गिरना – घर में बीमारी आये तथा कोर्ट कचहरी में हानि हो

सांप का मांस देखना या खाना – अपार धन आये परन्तु घर में धन रुके नहीं

सिपाही देखना – कानून के विपरीत काम कारनेका संकेत

सिनेमा देखना – समय व्यर्थ में नष्ट हो

सिगरेट पीते देखना -व्यर्थ में धन बर्बाद हो

सिलाई मशीन देखना – पति पत्नी में झगडा हो

सिलाई करना – बिगडा काम बन जाये

सियार देखना -धन हानि हो , बीमारी आये

सिन्दूर देखना – दुर्घटना की सम्भावना

सिन्दूर देवता पर चडाना – मनोकामना पूर्ण हो

सीताफल देखना -कुछ समय के बाद गरीबी दूर होगी

सीता जी को देखना -मान सम्मान बढे

सीमा पार करना -विदेश व्यापार में लाभ हो

सिप्पी देखना – उसे देखने पर हानि , उठाने पर लाभ

सीना चौडा होना – लोकप्रियता में वृद्धि हो

सीड़ी पर चढ़ना – काम में असफलता मिले

सुनहार देखना – साथी से धोखा मिले

सुटली कमर में बंधना -गरीबी आये , संघर्ष करना पढ़े

सुम्भा देखना (लोहे का)- कार्य में सफलता मिले , विवाह हो

सुदर्शन चक्र देखना – बईमानी का दंड शीघ्र मिले

सुपारी देखना -विवाह शीघ्र हो , मित्रों की संख्या में वृद्धि हो

सुनहरी रंग देखना – रुका हुआ धन मिले

सुरंग देखना या सुरंग में प्रवेश करना – नया कार्य आरंभ हो

सूई देखना – एक देखने पर सुख तथा अनेक देखने पर कष्ट में वृद्धि हो

सुलगती आग देखना – शोक समाचार मिले

सुन्दर स्त्री देखना – मान सम्मान में हानि हो

सुनहरी धूप देखना – सरकार से धन लाभ हो , मान सम्मान बढे

सुराही देखना – गृहस्थी में तनाव हो , पति या पत्नी का चरित्र ख़राब हो , रोग दूर हो

सुगंध महसूस करना – चमड़ी की बीमारी आये

सुनसान जगह देखना – बलवृद्धि हो

सूद लेते देखना – मुफ्त का धन मिले

सूद देते देखना -धन नाश हो , गरीबी आये

सूली पर चढ़ना – चिन्ताओ से मुक्ति हो , शुभ समाचार मिले

सूर्य देखना – धन संपत्ति तथा मान सम्मान बढे

सूर्य की तरह अपना चेहरा चमकता देखना – पुरस्कार मिले , मान सम्मान बढे

सूअर देखना – बुरे कामों में फँसना पड़े , बुरे लोगों से दोस्ती हो तथा मानहानि हो

सूअर का दूध पीना – चरित्र खराब हो , जेल जाना पढ़े

सूरजमुखी का फूल देखना – संकट आने की सूचना

सूर्य चन्द्र आदि का विनाश देखना – मृत्यु तुल्य कष्ट मिले

सेम की फली देखना – धन हानि हो परन्तु अच्छा भोजन मिले

सेब का फल देखना – दुःख व् सुख में बराबर वृद्धि हो

सेंध लगाना – प्रिये वस्तु गुम होना

सेवा करना – मेहनत का फल मिलेगा

सेवा करवाना – स्वस्थ्य खराब होने के लक्षण है

सेहरा बंधना – दाम्पत्य जीवन में कलेश की संभावना

सैनिक देखना – साहस में वृद्धि हो

सोंठ खाना – धन हानि हो , स्वस्थ्य में सुधार हो

सोना देखना – परिवार में बीमारी बढे , धन हानि हो

सोना मिलना – धन वृद्धि हो

सोना दुसरे को देना – अपनी मुर्खता से दूसरों को लाभ पहुंचाना

सोना लुटाना – परेशानिया बढे , अपमान सहना पढ़े

सोना गिरवी रखना – बईमानी करे और अपमान हो

सोते हुए शेर को देखना – निडरता से कार्य करे , सफलता मिलेगी

सोलह श्रृंगार देखना -स्वस्थ्य खराब होने का संकेत

स्वप्न में मानिक रत्न देखना – शक्ति तथा अधिकारों में वृद्धि

स्वप्न में मोती रत्न देखना – मानसिक शांति मिले

स्वप्न में मूंगा रत्न देखना – शत्रु पर विजय मिले

स्वप्न में पन्ना रत्न देखना – व्यवसाय में वृद्धि हो

स्वप्न में पुखराज रत्न देखना -वैर विरोध की भावना बढे

स्वप्न में हीरा रत्न देखना – आर्थिक प्रगति हो

स्वप्न में नीलम रत्न देखना – उन्नत्ति हो

स्वप्न में गोमेद रत्न देखना – समस्या अचानक आये

स्वप्न में लहसुनिया रत्न देखना – मान सम्मान बढे

स्वप्न में फेरोज़ा रत्न देखना – व्यवसाय में वृद्धि

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श्र——

श्रंगार करना – प्रेम प्रसंगों में वृद्धि हो

श्रंगार दान टूटना – दांपत्य जीवन में सुख व् सफलता मिले

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ड—–

डंडा देखना – दुश्मन से सावधान रहे

डफली बजाना – घर में उत्सव की सूचना

डाक खाना देखना – बुरा समाचार मिले

डाकिया देखना – शुभ सूचना मिले

डॉक्टर देखना – निराशा मिले

डाकू देखना – धन वृद्धि हो

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स्वप्न का बहुत बड़ा विज्ञान है। यह जीवन-दिशा को बदलने वाला, नीरस को सरस बनाने वाला होता है। यदि हम स्वप्न के प्रतीकों क ो समझ सकें, उसकी सांकेतिक भाषा को जान सकें तो स्वप्न में बहुत लाभान्वित हो सकते हैं। सचमुच यह गूढ़ विद्या है। स्वप्न अच्छा हो या बुरा, यदि सही जानकारी होती है तो अनिष्ट से बचा जा सकता है और इष्ट को संपादित किया जा सकता है।

स्वप्न के अनेक प्रकार होते हैं। काल के आधार पर भी उनका विभाजन होता है। कुछ स्वप्न दिन में आते हैं और कुछ रात में। कुछ रात के पहले प्रहर में और कुछ दूसरे-तीसरे और चौथे प्रहर में। कौन-सा कल्याणकारी होता है और कौन सा अकल्याणकारी – इसे सब नहीं जानते। स्वप्न शास्त्र के भी अपने नियम हैं। एक नियम है कि कल्याणकारी स्वप्न आने के बाद तत्काल उठकर ईश्वर जाप में लग जाना चाहिए। पुन: नींद नहीं लेनी चाहिए। जो पुन: सो जाते हैं, उनके स्वप्न का इष्ट परिणाम नष्ट हो जाता है। दिन में लिये जाने वाले स्वप्न को दिवास्वप्न कहते हैं। इनमें भी कल्पना होती है। ये यथार्थ भी होते हैं।

स्वप्न के विषय में हमारी जानकारी बहुत ही कम है। यदि पूरी जानकारी हो तो उससे पूरा लाभ उठाया जा सकता है। स्वास्थ्य, संपदा, व्यापार, आध्यात्म विकास आदि के साथ स्वप्न जुड़े हुये होते हैं। एक विदेशी लेखक की टांगेें टूट गयी। उसने स्वप्न में देखा कि एक फरिश्ता आया है, उसकीटांगे ठीक कर रहा है। प्रात: वह उठा, देखा कि उसकी टांगे ठीक हैं। वह चल-फिर सकता है।

अध्यात्म-विद्या ने वस्तु की नश्वरशीलता को दिखाने के लिए स्वप्न की उपमा दी गयी है। जैसे स्वप्न की चीजें नश्वर होती हैं, स्वप्न नश्वर होता है, वैसे ही संसार के सभी पदार्थ नश्वर हैं। एक भिखारी ने स्वप्न देखा कि वह राजा बन गया है। उसके महल हैं, रानियां हैं, हाथी-घोड़े हैं और वह ठाट-बाट से रह रहा है। इतने में ही एक कुत्ता आता है और सिरहाने रखे भिक्षापात्र को चाटने लगता है। भिक्षापात्र फूट जाता है। उसके स्वप्न का राजसी ठाट-बाट भी चुक जाता है। यह है संसार की नश्वरता।

स्वप्न के देवता पर, ज्योतिषी और स्वप्न पर पूरा भरोसा करना खतरे से खाली नहीं होता। कुछ लोग कहते हैं कि मुझे स्वप्न में देवता ने ऐसा कहा है। वह उसके अनुसार काम करता है और फंस जाता है। इसमें एक बात और है कि स्वप्न की भाषा को समझना बहुत कठिन होता है। उसमें दिखता कुछ है और उसका अर्थ कुछ और ही होता है। इसीलिए ये सारी गड़बड़ियां होती हैं।

जैन आगमों में तीर्थंकर, चक्रवर्ती, बलदेव और वासुदेव की माताएं गर्भावस्था से पूर्व स्वप्न देखती हैं। वे स्वप्न वस्तुपरक होते हैं। उनमें कलश, छत्र, सरोवर, माला आदि-आदि देखे जाते हैं। उनका अर्थ भिन्न-भिन्न होता है। ये सारे प्रतीक हैं। इन प्रतीकों का सही अर्थ जानना सहज नहीं होता। सभी तीर्थंकरों के प्रतीक चिह्न हैं। किसी का मृग, किसी का शेर, किसी का छत्र और किसी का सर्प। ये सब प्रतीक हैं।

स्वप्न भी प्रतीकात्मक होते हैं। दिन में जो घटनाएं घटती हैं, उनके स्वप्न भी आते हैं। यह पुनरावृत्ति होती है। चेतन मन में जो बात रही, वह अचेतन मन के द्वारा प्रकट हो जाती है। कुछ बातों का पूर्वाभास भी होता है। जो घटना भविष्य में घटित होने वाली है, उसको पहले ही जान लिया जाता है। यह है पूर्वाभास। यह बहुत सही होता है। अध्यात्म के लोगों ने इस संसार को दो-तीन उपमाओं में उपमित किया है – स्वप्न, इंद्रजाल और मृगमरीचिका। संसार स्वप्न – जैसा है। संसार इंद्रजाल के समान है। संसार मृगमरीचिका के समान है। भारतीय साहित्य में स्वप्न की बहुत चर्चा प्राप्त है। भारतीय विद्या की अनेक शाखाओं में स्वप्न के विषय में बहुत लिखा गया है। अष्टांगनिमित्त शास्त्र का अंग है – स्वप्नशास्त्र। भारत के लोग स्वप्न में बहुत विश्वास करते रहे हैं। ढाई-तीन हजार वर्ष पुराने साहित्य में स्वप्न-पाठकों का विस्तार से उल्लेख प्राप्त है। स्वप्न-पाठक स्वप्न को सुनकर उसका फल बताते थे। उनका फल-निरूपण अक्षरश: सही होता था। स्त्रियों को गर्भावस्था में स्वप्न आने की बात मिलती है। वे स्वप्न-पाठकों से उस स्वप्नों का फलाफल जान लेती थी। जैन साहित्य, बौद्ध साहित्य में स्वप्न की घटनाएं प्रचुरता से प्राप्त हैं।

नींद और स्वप्न का संबंध है। प्रत्येक व्यक्ति स्वप्न देखता है। वह उसे याद रख सके या नहीं, विश्लेषण कर सके या नहीं, यह दूसरी बात है।

विज्ञान की अनेक खोजों के साथ स्वप्न की बात जुड़ी हुई है। वैज्ञानिक को पूरा समाधान नहीं मिल रहा था,। स्वप्न ने उसकी गुत्थी सुलझा दी। सिलाई मशीन की खोज हुई। पूरा समाधान नहीं मिला। स्वप्न में समाधान मिल गया। मनोविज्ञान का पूरा एक विभाग ‘स्वप्न-विज्ञान’ से जुड़ा हुआ है। विशेषावश्यक भाष्य में बताया गया है कि संस्कारों के कारण स्वप्न आते हैं। मनोविज्ञान मानता है कि दमित इच्छाएं, अवचेतन मन की इच्छाएं, स्वप्न में प्रकट होती हैं। दिन में चेतन मन काम करता है। चेतन में बुद्धि है, तर्क है, काट-छांट करने की शक्ति है। वह दिन में कार्यरत रहता है। जब आदमी सो जाता है तब वह निष्क्रिय हो जाता है और अवचेतन मन सक्रिय हो जाता है।

स्वप्न श्रुत, दृष्ट या अनुभूत घटना का ही आता है। अश्रुत, अदृष्ट या अननुभूत घटना का कभी स्वप्न नहीं आता। कुछ लोग कहते हैं – हमें ऐसा स्वप्न आया जिसका दृश्य न श्रुत था, न दृष्ट था और न अनुभूत था। यह बात अन्यथा भी नहीं है। इसका भी पुष्ट कारण है। हमारी स्मृति केवल इस मस्तिष्क की स्मृति नहीं है, इससे परे की स्मृति है, पुर्वजन्म के संस्कारों की स्मृति है। इन संस्कारों की परतें हमारे मस्तिष्क में है। संभव है आज का मस्तिष्क-विज्ञानी इसे न जान पाया हो। अभी मस्तिष्क के अनेक रहस्य अज्ञात हैं। हजारों-हजारों वैज्ञानिक मस्तिष्क के अध्ययन में संलग्न हैं, पर आज भी वह रहस्य बना हुआ है।

1. स्वप्न मे कोई देवता दिखाई दे तो लाभ के साथ-साथ सफलता मिलती है।

2. स्वप्न में कोई व्यक्ति गौमाता के दर्शन करता है यह अत्यन्त शुभ होता है। उस व्यक्ति को यश, वैभव एवं परिवार वृद्घि का लाभ मिलता

है।

3. स्वप्न में गाय का दूध दोहना धन प्राçप्त का सूचक है।

4. सफेद घोडे का दिखाई देना-सुन्दर भाग्य के साथ-साथ धन की प्राप्ति कराता है।

5. स्वप्न में चूहों का दिखाई देना उत्तम भाग्य का प्रतीक माना जाता है जो धन प्रदायक है।

6. स्वप्न में नीलकण्ठ या सारस दिखता है उसे राज सम्मान के साथ-साथ धन लाभ भी होता है।

7. स्वप्न में क्रोंच पक्षी दिखने पर अनायास धन प्राçप्त होती है।

8. यदि मरी हुई चिç़डया दिखाई दे तो अनायास ही धन लाभ होता है।

9. स्वप्न में तोते को खाता हुआ देखना प्रचूर मात्रा में धनप्राçप्त माना जाता है।

10. स्वप्न में यदि घोंघा दिखाई दे तो व्यक्ति के वेतन में वृद्घि तथा व्यापार में लाभ होता है।

11. स्वप्न में सफेद चीटियाँ धन लाभ कराती हंै।

12. स्वप्न में काले बिच्छू का दिखना धन दिलवाता है।

13. स्वप्न में नेवले का दिखाई देना स्वर्णाभूषण की प्राçप्त करवाता है।

14. मधुमक्खी का छत्ता देखना शुभ शकुन है जो धन प्रदायक है।

15. सर्प को फन उठाये हुये स्वप्न में देखना धन प्राçप्त का सूचक होता है।

16. सर्प यदि बिल में जाता या आता हुआ दिखाई दे तो यह अनायास धन प्राçप्त का सूचक होता है।

17. स्वप्न में आम का बाग देखना या बाग में घूमना अनायास धन की प्राçप्त करवाता है।

18. स्वप्न में कदम्ब के वृक्ष को देखना बहुत ही शुभ होता है जो व्यक्ति को धन-दौलत निरोगी काया मान सम्मान एवं राजसम्मान की प्राçप्त करवाता है।

19. यदि हाथ की छोटी अंगुली में अंगूठी पहनें तो अनायास ही धन की प्राçप्त।

20. स्वप्न में कानों में कुण्डल धारण करना शुभ शकुन होता है जो धन प्राçप्त कराता है।

21. स्वप्न में नर्तकी नृत्य करती दिखाई दें तो यह धन प्रदायक है।

22. सफेद चूडियां देखना धन आगमन का सूचक है।

23. स्वप्न से कुमुद-कुमुदनी को देखना धनदायक होता है।

24. स्वप्न में किसान को देखना धन लाभ कराता है।

25. स्वप्न में गौ, हाथी, अश्व, महल, पर्वत और वृक्ष पर चढ़ना भोजन करना तथा रोना धन प्रदायक कहा गया है।

26. स्वप्न में युद्घ में घायल शरीर दिखाई दें तो धनदायक।

महाशिवरात्रि पूजन से पुण्‍य मिलेगा

महाशिवरात्रि शिव और शक्ति का एकाकार होने का पर्व है। यह मिलन कल्याणकारी भी है और प्रेरणादायी भी। यह पर्व हमें शिवत्व का बोध कराता है। धर्मनगरी ही शिव-शक्ति के एकाकार होने की स्थली मानी जाती है। इसलिए यहां इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।

फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को आने वाले महाशिवरात्रि पर्व का धार्मिक महत्व सीधे-सीधे हरिद्वार से जुड़ा हुआ है। पौराणिक मान्यता के अनुसार फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन ही धर्मनगरी के कनखल में शिव शंकर और सती का विवाह हुआ था। इसीलिए हरिद्वार को आशुतोष की ससुराल भी कहा जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शिव-सती के विवाह के समय पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र का योग था।

एक और मान्यता के अनुसार फाल्गुनी मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की मध्यरात्रि को ही भगवान शिव लिंग के रूप में प्रकट हुए थे। इसीलिए भी यह पर्व मनाया जाता है। इस पर्व को मनाने का अर्थ भगवान शिव शंकर की आराधना और शिवत्व का बोध करना है।

स्कंद पुराण में महाशिवरात्रि के व्रत को भी विशेष महत्व दिया है। आराधना तीन प्रकार की बताई गई है। उपवास, शिर्वाचन और रात्रि जागरण। ज्योतिषाचार्य विपिन कुमार पाराशर बताते हैं कि इस बार बीस फरवरी को महाशिवरात्रि सोमवार और श्रवण नक्षत्र में आ रही है। सोमवार और श्रवण नक्षत्र शिव शंकर को अतिप्रिय हैं। ज्योतिषाचार्य धरणीधर शास्त्री ने बताया कि महाशिवरात्रि पर शिवालयों में जलाभिषेक करने से शिव शंकर समस्त मनोकामनाएं पूरी कर देते हैं।

अप्रैल 2012 के लिए आपकी राशि

मेष : मेष राशि वाले जातकों के लिए यह माह धार्मिक कार्यों वाला रहेगा। स्त्री पक्ष के वर्चस्व में वृद्धि होगी। वाहन सावधानी से चलाएं। दुर्घटना का योग बनता है। यात्रा से हानि के योग बनते हैं। पुराने मित्र से सहयोग प्राप्त होगा। व्यापार अच्छा रहेगा। नौकरी में अधिकारी से सामंजस्य बिठाकर चले। कृषि लाभ देगी। दिनांक 4, 16 शुभ। 21 अशुभ है। देव‍ी आराधना लाभप्रद रहेगी।

वृषभ : वृषभ राशि वाले जातकों के लिए अप्रैल का माह व्यापार में लाभ वाला रहेगा। संतान पर विशेष खर्च होगा। पत्नी को पीड़ा के योग है। शत्रु पक्ष की हार होगी। कृषि मध्यम रहेगी। उन्नति के मार्ग खुलेंगे। ससुराल पक्ष से सहयोग प्राप्त होगा। किसी के बहकावे में न आए, हानि हो सकती है। दिनांक 5, 25 शुभ है। 6 अशुभ। राम स्तुति लाभप्रद है।

मिथुन : मिथुन राशि वाले जातकों के लिए यह माह सम्मान प्राप्ति वाला रहेगा। व्यापार में लाभ होगा। कृषि सामान्य लाभ देगी। नौकरी में उन्नति के योग है। विद्यार्थी वर्ग को सफलता मिलेगी। संतान को कष्ट के योग है। रिश्तेदार से सहयोग प्राप्त होगा। किसी मित्र से अनबन के योग है। पर्यटन स्थल के योग है। दिनांक 6, 12 शुभ। 8 अशुभ है। शिव शक्ति की आराधना करें।

कर्क : कर्क राशि वाले जातकों के लिए यह माह भूमि संबंधी लाभ वाला रहेगा। विद्यार्थी को परेशानी रहेगी। व्यापार अच्छा रहेगा। नौकरी में प्रभाव बढ़ेगा। मित्र से सहयोग प्राप्त होगा। बहन पक्ष को कष्ट के योग बनते हैं। माता-पिता को मानसिक कष्ट रहेगा। सामाजिक गतिविधियों में सम्मान बढ़ेगा। दिनांक 12, 30 शुभ है। 3 अशुभ है।

सिंह : सिंह राशि वालों के लिए यह माह पराक्रम वृद्धि से लाभ वाला रहेगा। पत्नी पक्ष का लाभ मिलेगा। कृषि सामान्य रहेगी। व्यापार लाभ प्रदान करेगा। नौकरी में उन्नति होगी। परिवार से सहयोग प्राप्त होगा। अनजान व्यक्ति से दोस्ती‍ के योग बनते है। स्त्री से हानि के योग बनते है। दिनांक 10, 28 शुभ है। 14 अशुभ है। श्रीकृष्ण की आराधना करें।

कन्या : कन्या राशि वाले जातकों के लिए यह माह पराक्रम से लाभ वाला रहेगा। शिक्षा में उन्नति होगी। नौकरी में स्थानांतरण के योग बनते है। व्यापार ठीक रहेगा। कृषि लाभप्रद रहेगी। गलत‍ दिशा में लगाव की संभावना बनती है। ध्यान रखें। शत्रु पक्ष से सावधान रहे। भाई से सहयोग प्राप्त होगा। मामा पक्ष को कष्ट के योग बनते है। दिनांक 8, 14 शुभ है। दिनांक 18 अशुभ। दुर्गा आराधना करें।

तुला : तुला राशि वाले जातकों के लिए अप्रैल का माह व्यापार में उत्तम लाभ वाला रहेगा। शारीरिक पी‍ड़ा दूर होगी। अविवाहित के संबंध तय होंगे। देश-विदेश यात्रा के प्रबल योग बनते है। किसी मित्र से धोखा हो सकता है, अत: ध्यान रखें। माता-पिता का सहयोग प्राप्त होगा। दिनांक 13, 26 शुभ। 10 अशुभ है। शिव आराधना करें।

वृश्चिक : वृश्चिक राशि वाले जातकों के लिए यह माह मिश्रित फल वाला रहेगा। विद्यार्थी को अच्छा लाभ मिलेगा। व्यर्थ कार्यों पर अधिक खर्च होगा। परिवार या रिश्तेदारी में क्लेश हो सकता है, ध्यान दें। स्वास्थ्य संबंधी पीड़ा रहेगी। व्यापार ठीक रहेगा। नौकरी में तकलीफ आएगी। कृषि मध्यम रहेगी। यात्रा में हानि के योग है। दिनांक 5, 15 शुभ है। 2 अशुभ। लक्ष्मी आराधना शुभ है।

धनु : धनु राशि वाले जातकों के लिए यह माह अचानक लाभ मिलने वाला रहेगा। राज्य सम्मान के योग बनते हैं। संतान से सुख प्राप्त होगा। स्वास्थ्य गड़बड़ रहेगा। विद्यार्थी वर्ग को रुकावट आ सकती है। कृषि लाभ मिलेगा। नौकरी में अधिकारी प्रसन्न रहेंगे। पत्नी से लाभ मिलेगा। माता-पिता को कष्‍ट के योग बनते हैं। अपना मान-सम्मान समाज में बढ़ता दिखेगा। दिनांक 9, 27 शुभ है। 8 अशुभ। दुर्गा जी की आराधना लाभप्रद है।

मकर : मकर राशि वाले जातकों के लिए अप्रैल का माह सफलता वाला रहेगा। लेखक एवं कवि के लिए अच्छा लाभ वाला रहेगा। खर्चों में कमी आएगी। व्यापार में उन्नति होगी। कृषि लाभ पहुंचाएगी। नौकरी में स्थानांतरण के योग है। पत्नी को कष्ट के योग बनत‍े हैं। ससुराल पक्ष से सहयोग प्राप्त होगा। पुराने मित्र से मिलन होगा। तीर्थयात्रा के योग है। दिनांक 7, 16 शुभ। 13 अशुभ है। कृष्ण आराधना लाभप्रद है।

कुंभ : कुंभ राशि वाले जातकों के लिए यह माह धार्मिक लाभ वाला रहेगा। स्त्री पक्ष से लाभ मिलेगा। व्यापार सामान्य रहेगा। कृषि मध्यम लाभ देगी। नौकरी में सम्मान प्राप्त होगा। अपने आप पर विश्वास रखें। मानसिक सुख मिलेगा। घर पर मांगलिक कार्य के योग है। दिनांक 10, 22 शुभ। 18 अशुभ है।

मीन : मीन राशि वाले जातकों के लिए यह माह मांगलिक कार्यों वाला रहेगा। व्यापार मध्यम रहेगा। कृषि लाभप्रद है। नौकरी में परेशानी आ सकती है। वाहन एवं यात्रा में नुकसान के योग है। स्वास्थ्य संबंधी पीड़ा रहेगी। माता-पिता को कष्ट आ सकत‍ा है। किसी मित्र से सहयोग प्राप्त होगा। अचानक आया धन हानि दे सकता है। दिनांक 3, 12 शुभ है। 19 अशुभ है। शिव शक्ति की आराधना शुभ है।

कौन बनाता है प्रेम विवाह का योग

प्रेम विवाह करने वाले लडके व लडकियों को एक-दुसरे को समझने के अधिक अवसर प्राप्त होते है। इसके फलस्वरुप दोनों एक-दूसरे की रुचि, स्वभाव व पसन्द-नापसन्द को अधिक कुशलता से समझ पाते है। प्रेम विवाह करने वाले वर-वधू भावनाओ व स्नेह की प्रगाढ डोर से बंधे होते है। ऎसे में जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी दोनों का साथ बना रहता है।

पर कभी-कभी प्रेम विवाह करने वाले वर-वधू के विवाह के बाद की स्थिति इसके विपरीत होती है। इस स्थिति में दोनों का प्रेम विवाह करने का निर्णय शीघ्रता व बिना सोचे समझे हुए प्रतीत होता है। आईये देखे कि कुण्डली के कौन से योग प्रेम विवाह की संभावनाएं बनाते है।

1। राहु के योग से प्रेम विवाह की संभावनाएं

1)  जब राहु लग्न में हों परन्तु सप्तम भाव पर गुरु की दृ्ष्टि हों तो व्यक्ति का प्रेम विवाह होने की संभावनाए बनती है। राहु का संबन्ध विवाह भाव से होने पर व्यक्ति पारिवारिक परम्परा से हटकर विवाह करने का सोचता है। राहु को स्वभाव से संस्कृ्ति व लीक से हटकर कार्य करने की प्रवृ्ति  का माना जाता है।

2।) जब जन्म कुण्डली में मंगल का शनि अथवा राहु से संबन्ध या युति हो रही हों तब भी प्रेम विवाह कि संभावनाएं बनती है। कुण्डली के सभी ग्रहों में इन तीन ग्रहों को सबसे अधिक अशुभ व पापी ग्रह माना गया है। इन तीनों ग्रहों में से कोई भी ग्रह जब विवाह भाव, भावेश से संबन्ध बनाता है तो व्यक्ति के अपने परिवार की सहमति के विरुद्ध जाकर विवाह करने की संभावनाएं बनती है।

3।) जिस व्यक्ति की कुण्डली में सप्तमेश व शुक्र पर शनि या राहु की दृ्ष्टि हो, उसके प्रेम विवाह करने की सम्भावनाएं बनती है।

4)  जब पंचम भाव के स्वामी की उच्च राशि में राहु या केतु स्थित हों तब भी व्यक्ति के प्रेम विवाह के योग बनते है।

 

2। प्रेम विवाह के अन्य योग

1)  जब किसी व्यक्ति कि कुण्ड्ली में मंगल अथवा चन्द्र पंचम भाव के स्वामी के साथ, पंचम भाव में ही स्थित हों तब अथवा सप्तम भाव के स्वामी के साथ सप्तम भाव में ही हों तब भी प्रेम विवाह के योग बनते है।

2)  इसके अलावा जब शुक्र लग्न से पंचम अथवा नवम अथवा चन्द लग्न से पंचम भाव में स्थित होंने पर प्रेम विवाह की संभावनाएं बनती है।

3)  प्रेम विवाह के योगों में जब पंचम भाव में मंगल हों तथा पंचमेश व एकादशेश का राशि परिवतन अथवा दोनों कुण्डली के किसी भी एक भाव में एक साथ स्थित हों उस स्थिति में प्रेम विवाह होने के योग बनते है।

4)  अगर किसी व्यक्ति की कुण्डली में पंचम व सप्तम भाव के स्वामी अथवा सप्तम व नवम भाव के स्वामी एक-दूसरे के साथ स्थित हों उस स्थिति में प्रेम विवाह कि संभावनाएं बनती है।

5)  जब सप्तम भाव में शनि व केतु की स्थिति हों तो व्यक्ति का प्रेम विवाह हो सकता है।

6)  कुण्डली में लग्न व पंचम भाव के स्वामी एक साथ स्थित हों या फिर लग्न व नवम भाव के स्वामी एक साथ बैठे हों, अथवा एक-दूसरे को देख रहे हों इस स्थिति में व्यक्ति के प्रेम विवाह की संभावनाएं बनती है।

7) जब किसी व्यक्ति की कुण्डली में चन्द्र व सप्तम भाव के स्वामी एक -दूसरे से दृ्ष्टि संबन्ध बना रहे हों तब भी प्रेम विवाह की संभावनाएं बनती है।

8) जब सप्तम भाव का स्वामी सप्तम भाव में ही स्थित हों तब विवाह का भाव बली होता है। तथा व्यक्ति प्रेम विवाह कर सकता है।

9) पंचम व सप्तम भाव के स्वामियों का आपस में युति, स्थिति अथवा दृ्ष्टि संबन्ध हो या दोनों में राशि परिवर्तन हो रहा हों तब भी प्रेम विवाह के योग बनते है।

10) जब सप्तमेश की दृ्ष्टि, युति, स्थिति शुक्र के साथ द्वादश भाव में हों तो, प्रेम विवाह होता है।

11) द्वादश भाव में लग्नेश, सप्तमेश कि युति हों व भाग्येश इन से दृ्ष्टि संबन्ध बना रहा हो, तो प्रेम विवाह की संभावनाएं बनती है।

12) जब जन्म कुण्डली में शनि किसी अशुभ भाव का स्वामी होकर वह मंगल, सप्तम भाव व सप्तमेश से संबन्ध बनाते है। तो प्रेम विवाह हो सकता है।

लव करें तो बताएं सबकुछ मंगेतर से

wedding

दूध और पानी जब मिलते हैं तो एक हो जाते हैं। प्रीत की सुंदर रीति देखिए कि यदि कपट की खटाई उसमें पड़ गई तो सारा रस चला जाता है। विवाह प्रेम का ऐसा ही मिलन है जिसमें दो अस्तित्व पानी और दूध की तरह मिल जाते हैं। यदि इस मिलन की बुनियाद ही झूठ पर टिकी हो तब! तब प्रेम और विश्वास का यह मिलन दूध की ही तरह फट जाता है जिसे दोबारा पहले जैसा बनाना संभव ही नहीं है।

शादियों का मौसम शुरू हो चुका है। रिश्ते को जोड़ने से पहले सबसे पहले ध्यान रखें कि आपस में कोई भी ऐसी बात दबी-छुपी हो जो विवाह के बाद आपके साथी की मानसिक परेशानी का कारण बन जाए। आप उन्हें सबकुछ बता दें। इसके बाद आपकी जिम्मेदारी समाप्त। अब यह आपके साथी की इच्छा पर निर्भर है कि वह आपको उसी स्थिति में स्वीकार करता है या नहीं।

किसी को पाने की इच्छा में आपका और आपके परिवार द्वारा किसी बात को छिपाया जाना कपट, झूठ और विश्वासघात की श्रेणी में आएगा। यदि आप ऐसा सोचते हैं कि एक बार शादी हो जाने दो सब ठीक हो जाएगा, तो आप गलत हैं। जीवन की लंबी दूरी तक साथ चलने के लिए चुने गए हमसफर से आप कुछ भी नहीं छुपा पाएंगे। आप कैसे हैं यह आपके व्यवहार से देर-सबेर पता चल ही जाएगा।

इसलिए इस बंधन में बंधने के पूर्व अच्छे माहौल में निष्कपट विचार-विमर्श कीजिए। बता डालिए सब कुछ कि आप क्या हैं, क्या चाहते हैं, आपकी क्या पसंद-नापसंद है, और जितना कुछ है मन में। आपका साथी यदि आपके प्रति वाकई में वफादार रह सकता है तो आपके गुणों-अवगुणों सभी के साथ आप उसे पसंद होंगे। हां, किन मुद्दों पर विशेष रूप से आपको चर्चा करनी है उसकी सूची हम आपको दे रहे हैं।

कहां रहना है?

बहुत सी महिलाएं अपनी निजता और स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए ससुराल से अलग रहना पसंद करती हैं। पर आपको अपने इस आइडिया को अच्छे माहौल में डिस्कस करना चाहिए। यदि आपने अपने करियर या सपनों को लेकर अलग शहर, अलग देश या अलग रहना पसंद किया है तो इस बारे में भी खुलकर बात हो जानी चाहिए।

अधिकतर पुरुष अपने करियर में उन्नति के लिए या प्रमोशन के प्रलोभन में यह अपेक्षा रखते हैं कि उनकी पत्नी और परिवार उनका अनुसरण करें। इससे रिश्तों में दरार आती है। सुमित और प्रिया का ही उदाहरण लें। शादी के कुछ ही महीनों बाद सुमित को लगा कि उसका करियर भारत में कुछ स्थिर सा हो गया है। उसी समय उसे स्पेन में चांस मिला, लेकिन प्रिया स्पेन नहीं जाना चाहती थी। लिहाजा दोनों के रिश्तों में बेवजह खटास आ गई।

मेडिकल हिस्ट्री के विषय में करें बात

मेघा और उसके परिवार ने उसके मिरगी रोग के विषय में मोहित से छुपाया था। शादी के 7 महीने बाद आए मिरगी के दौरे के बाद मोहित को यह बात पता चली। उसने स्वयं को छला महसूस किया, तभी से उनके जीवन में तनाव व्याप्त है। वह घर और बाहर दोनों ही जगह सामान्य जिंदगी नहीं जी पा रहा।

अब बात तलाक तक पहुंच चुकी है पर यह भी आसानी से नहीं हो सकता क्योंकि मेघा मां बनने वाली है। कहीं न कहीं मोहित के मन में मेघा के प्रति कोमल भावनाएं हैं, लेकिन फिर बार-बार उसे यह बात आहत करती है कि उससे सब छुपाया गया और वह इस रिश्ते के प्रति सहज नहीं पाता।

आपके लक्ष्य क्या हैं?

शादी से पहले आप अपने करियर और लक्ष्यों पर भी बात कर लें क्योंकि आपको एक हाउसवाइफ की तरह रखने की अपेक्षा भी आपके पति की हो सकती है। जबकि हो सकता है कि आप अपने करियर के प्रति गंभीर हों। बाद में ऐसी बातें अक्सर विवाद का कारण बनती हैं।

वित्तीय मसले भी सुलझाएं

यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर अक्सर लोग संकोच के कारण बात नहीं कर पाते। बाद में इस विषय पर की गई अतिरिक्त सुरक्षा अविश्वास का कारण बनती है। श्वेता ने शादी के कुछ ही समय बाद अपनी बचत और बैंक अकाउंट्स के मामले में कुछ अधिक सुरक्षा बरतनी शुरू कर दी। जिससे उसके और निमेष के बीच मतभेद उभरने लगे।

निमेष श्वेता के इस व्यवहार से कुछ अस्वाभाविक महसूस करने लगा। जबकि श्वेता का कहना था कि ये अकाउंट ही मेरी सुरक्षा है। अगर मैं इनको लेकर सतर्क नहीं रही तो भविष्य में मुश्किल आने पर कहां जाऊंगी? इसका एक मतलब यह भी है कि उसे भविष्य को लेकर निमेष पर भरोसा नहीं है और निमेष इसी बात को लेकर असहज महसूस करता है।

उन दोनों ने पहले इस पर कभी भी बात नहीं की। इसलिए अब दोनों के बीच अविश्वास का माहौल बना हुआ है। इसलिए तनख्वाह से लेकर, बचत तथा जमापूंजी के बारे में पहले ही निःसंकोच बात करें ताकि आगे जाकर ये छोटी-छोटी बातें आपके रिश्ते में दरार न डाल सकें।

धर्म और आध्यात्मिक विश्वास

सबीना और संस्कार का प्रेम विवाह है। दोनों आपसी सहमति से अपना-अपना धर्म मानते हैं। बात यहां तक तो ठीक थी, लेकिन शादी के एक साल बाद ही उनके यहां आए नन्हे मेहमान के धर्म को लेकर दोनों में मतभेद पैदा हो गया है। स्कूल में दाखिले के समय संस्कार की चाह है उसका बच्चा अपने धर्म के कालम में हिन्दू ही लिखे जबकि सबीना अपने धर्म के लिए ख्वाहिश रखती है। जाहिर है आगे जाकर ये टकराव बच्चे को भी असमंजस और तनाव ही देगा।

अतीत के जीवन का पर चर्चा

अतीत के विषयों पर बिल्कुल पारदर्शिता बरती जानी चाहिए। क्या छुपाया जाना है और क्या बताना है यह आपके विवेक पर निर्भर है। इंटरनेट और नेटवर्किंग साइट्स पर आपको विशेष सावधानी बरतनी है, क्योंकि अध्ययन बता रहे हैं कि ये भी संबंध-विच्छेद का बड़ा कारण सिद्ध हो रहे हैं।

ध्यान रखें ये जो अतीत होता है, वर्तमान और भविष्य पर हमेशा भारी पड़ता है। सभी जोड़ों के बीच असहमति के बिंदु होते हैं, लेकिन मुद्दों के प्रकार और प्रबलता आपके शादीशुदा जीवन की संगतता को परिभाषित करते हैं। संतुलन नहीं है तो जीवन नर्क हो जाता है और यदि आप अपने साथी को छोड़ते हैं तो उस अंतराल को पाटना दोनों के लिए अति दुखद होता है। निश्चित रूप से कई अनजान मुद्दों से भी आप अपने विवाह के बाद रूबरू होते हैं पर कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर शादी से पहले स्पष्ट बात हो जानी आवश्यक है।

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किस्मत चमकानी हो तो करे ये उपाय

लाल किताब के अनुसार जिस घर में कोई ग्रह न हो तथा जिस घर पर किसी ग्रह की नज़र नहीं पड़ती हो उसे सोया हुआ घर माना जाता है।

लाल किताब का मानना है जो घर सोया होता है उस घ्रर से सम्बन्धित फल तब तक प्राप्त नहीं होता है जब तक कि वह घर जागता नहीं है। लाल किताब में सोये हुए घरों को जगाने के लिए कई उपाय  बताए गये हैं।

जिन लोगों की कुण्डली में प्रथम भाव सोया हुआ हो उन्हें इस घर को जगाने के लिए मंगल का उपाय करना चाहिए। मंगल का उपाय करने के लिए मंगलवार का व्रत करना चाहिए। मंगलवार के दिन हनुमान जी को लडुडुओं का प्रसाद चढ़ाकर बांटना चाहिए। मूंगा धारण करने से भी प्रथम भाव जागता है।

अगर दूसरा घर सोया हुआ हो तो चन्द्रमा का उपाय शुभ फल प्रदान करता है। चन्द्र के उपाय के लिए चांदी धारण करना चाहिए। माता की सेवा करनी चाहिए एवं उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। मोती धारण करने से भी लाभ मिलता है।

तीसरे घर को जगाने के लिए बुध का उपाय करना लाभ देता है। बुध के उपाय हेतु दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए। बुधवार के दिन गाय को चारा देना चाहिए।

लाल किताब के अनुसार किसी व्यक्ति की कुण्डली में अगर चौथा घर सोया हुआ है तो चन्द्र का उपाय करना लाभदायी होता है।

 

पांचवें घर को जागृत करने के लिए सूर्य का उपाय करना फायदेमंद होता है। नियमित आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ एवं रविवार के दिन लाल भूरी चीटियों को आटा, गुड़ देने से सूर्य की कृपा प्राप्त होती है।

छठे घर को जगाने के लिए राहु का उपाय करना चाहिए। जन्मदिन से आठवां महीना शुरू होने पर पांच महीनों तक बादाम मन्दिर में चढ़ाना चाहिए, जितना बादाम मन्दिर में चढाएं उतना वापस घर में लाकर सुरक्षित रख दें। घर के दरवाजा दक्षिण में नहीं रखना चाहिए। इन उपायों से छठा घर जागता है क्योंकि यह राहु का उपाय है।

सोये हुए सातवें घर के लिए शुक्र को जगाना होता है। शुक्र को जगाने के लिए आचरण की शुद्धि सबसे आवश्यक है।

सोये हुए आठवें घर के लिए चन्द्रमा का उपाय शुभ फलदायी होता है।

जिनकी कुण्डली में नवम भाव सोया हो उनहें गुरूवार के दिन पीलावस्त्र धारण करना चाहिए। सोना धारण करना चाहिए व माथे पर हल्दी अथवा केशर का तिलक करना चाहिए। इन उपाय से गुरू प्रबल होता है और नवम भाव जागता है।

दशम भाव को जागृत करने हेतु शनिदेव का उपाय करना चाहिए।

एकादश भाव के लिए भी गुरू का उपाय लाभकारी होता है।

अगर बारहवां घ्रर सोया हुआ हो तो घर मे कुत्ता पालना चाहिए। पत्नी के भाई की सहायता करनी चाहिए। मूली रात को सिरहाने रखकर सोना चाहिए और सुबह मंदिर मे दान करना चाहिए।

जानिए क्या हैं शुक्र ग्रह की शान्ति के उपाय

ग्रहों में शुक्र को विवाह व वाहन का कारक ग्रह कहा गया है (Venus is the Karak planet of marriage and transportation)। इसलिये वाहन दुर्घटना से बचने के लिये भी ये उपाय किये जा सकते है।

शुक्र के उपाय करने से वैवाहिक सुख की प्राप्ति की संभावनाएं बनती है। वाहन से जुडे मामलों में भी यह उपाय लाभकारी रहते है।

शुक्र की वस्तुओं से स्नान
ग्रह की वस्तुओं से स्नान करना उपायों के अन्तर्गत आता है। शुक्र का स्नान उपाय करते समय जल में बडी इलायची डालकर उबाल कर इस जल को स्नान के पानी में मिलाया जाता है (boil big cardamom in a water and mix in the bathing water)। इसके बाद इस पानी से स्नान किया जाता है। स्नान करने से वस्तु का प्रभाव व्यक्ति पर प्रत्यक्ष रुप से पडता है। तथा शुक्र के दोषों का निवारण होता है।

यह उपाय करते समय व्यक्ति को अपनी शुद्धता का ध्यान रखना चाहिए। तथा उपाय करने कि अवधि के दौरान शुक्र देव का ध्यान करने से उपाय की शुभता में वृ्द्धि होती है। इसके दौरान शुक्र मंत्र का जाप करने से भी शुक्र के उपाय के फलों को सहयोग प्राप्त होता है (recite Mantra at the time of bathing)।

शुक्र की वस्तुओं का दान
शुक्र की दान देने वाली वस्तुओं में घी व चावन (Ghee and rice are the products of Venus)  का दान किया जाता है।  इसके अतिरिक्त शुक्र क्योकि भोग-विलास के कारक ग्रह है। इसलिये सुख- आराम की वस्तुओं का भी दान किया जा सकता है। बनाव -श्रंगार की वस्तुओं का दान भी इसके अन्तर्गत किया जा सकता है (cosmetics and luxurious products)। दान क्रिया में दान करने वाले व्यक्ति में श्रद्धा व विश्वास होना आवश्यक है। तथा यह दान व्यक्ति को अपने हाथों से करना चाहिए। दान से पहले अपने बडों का आशिर्वाद लेना उपाय की शुभता को बढाने में सहयोग करता है।

शुक्र मन्त्र का जाप
शुक्र के इस उपाय में निम्न श्लोक का पाठ किया जाता है।

“ऊँ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली

दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा “

शुक्र के अशुभ गोचर की अवधि या फिर शुक्र की दशा में इस श्लोक का पाठ प्रतिदिन या फिर शुक्रवार के दिन करने पर इस समय के अशुभ फलों में कमी होने की संभावना बनती है। मुंह के अशुद्ध होने पर मंत्र का जाप नहीं करना चाहिए। ऎसा करने पर विपरीत फल प्राप्त हो सकते है। वैवाहिक जीवन की परेशानियों को दूर करने के लिये इस श्लोक का जाप करना लाभकारी रहता है (recite this Mantra to resolve married life problems)। वाहन दुर्घटना से बचाव करने के लिये यह मंत्र लाभकारी रहता है।

शुक्र का यन्त्र

शुक्र के अन्य उपायों में शुक्र यन्त्र का निर्माण करा कर उसे पूजा घर में रखने पर लाभ प्राप्त होता है। शुक्र यन्त्र की पहली लाईन के तीन खानों में 11,6,13 ये संख्याये लिखी जाती है। मध्य की लाईन में 12,10, 8 संख्या होनी चाहिए। तथा अन्त की लाईन में 07,14,9 संख्या लिखी जाती है। शुक्र यन्त्र में प्राण प्रतिष्ठा करने के लिये किसी जानकार पण्डित की सलाह ली जा सकती है। यन्त्र पूजा घर में स्थापित करने के बाद उसकी नियमित रुप से साफ-सफाई का ध्यान रखना चाहिए।

विद्या की देवी मां सरस्वती जाप मंत्र

वसंत पंचमी का उत्सव ज्ञान की देवी ‘मां सरस्वती’ के जन्म दिवस के रूप संपूर्ण भारत में मनाया जाता है। इसी दृष्टि से वसंत का मौसम सभी के लिए बहुत मायने रखता है। क्योंकि इस दिन शुभ्रवसना, वीणावादिनी, मंद-मंद मुस्कुराती हंस पर विराजमान मां सरस्वती मानव जीवन में अज्ञान रूप जड़ता को दूर कर ज्ञान के प्रकाश से आलौकित करती हैं।

* ‘ॐ शारदा माता ईश्वरी मैं नित सुमरितोय हाथ जोड़ अर्जी करूं विद्या वर दे मोय।’

- जो लोग सरस्वती के कठिन मंत्र का जप नहीं कर सक‍ते उनके लिए प्रस्तुत है मां सरस्वती का सरल मंत्र। वसंत पंचमी के दिन से इस मंत्र जप का आरंभ करने और आजीवन इस मंत्र का पाठ करने से विद्या और बुद्धि में वृद्धि होती है।

- मां सरस्वती का सुप्रसिद्ध मंदिर मैहर में स्थित है। मैहर की शारदा माता को प्रसन्न करने का मंत्र इस प्रकार है।

* ‘शारदा शारदाभौम्वदना। वदनाम्बुजे। सर्वदा सर्वदास्माकमं सन्निधिमं सन्निधिमं क्रिया तू।’

- शरद काल में उत्पन्न कमल के समान मुखवाली और सब मनोरथों को देने वाली मां शारदा समस्त समृद्धियों के साथ मेरे मुख में सदा निवास करें।

* सरस्वती का बीज मंत्र ‘क्लीं’ है। जिसे शास्त्रों में क्लीं कारी कामरूपिण्यै यानी ‘क्लीं’ काम रूप में पूजनीय है। इसलिए वाणी मनुष्य की समस्त कामनाओं की पूर्ति करने वाली हो जाती है।

* सरस्वती गायत्री मंत्र : ‘ॐ वागदैव्यै च विद्महे कामराजाय धीमहि। तन्नो देवी प्रचोदयात्‌।’

प्रथम दिन 5 माला का जाप करने से साक्षात मां सरस्वती प्रसन्न हो जाती हैं तथा साधक को ज्ञान-विद्या का लाभ प्राप्त होना शुरू हो जाता है। नित्य कर्म करने पर साधक ज्ञान-विद्या प्राप्त करने के क्षेत्र में निरंतर बढ़ता जाता है। इसके अलावा विद्यार्थियों को ध्यान करने के लिए त्राटक अवश्य करना चाहिए। 10 मिनट रोज त्राटक करने से स्मरण शक्ति बढ़ती है तथा साधक को एक बार पढ़ने पर कंठस्थ हो जाता है।

* ‘ऎं हीं श्रीं वाग्वादनी सरस्वती देवी मम जिव्हायां। सर्व विद्यां देही दापय-दापय स्वाह।’

* ‘सरस्वत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमो नम:। वेद वेदान्त वेदांग विद्यास्थानेभ्य एव च।।

सरस्वति महाभागे विद्ये कमललोचने। विद्यारूपे विशालाक्षी विद्यां देहि नमोस्तुते।।’

* एकादशाक्षर सरस्वती मंत्र : ॐ ह्रीं ऐं ह्रीं सरस्वत्यै नमः।

* ‘वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणी विनायकौ॥’

अर्थातः अक्षर, शब्द, अर्थ और छंद का ज्ञान देने वाली भगवती सरस्वती तथा मंगलकर्ता विनायक की मैं वंदना करता हूं।

- श्रीरामचरितमानस

वसंत पंचमी के दिन शिव पूजन का भी विशेष महत्व है। इस दिन भगवान भोले की पार्थिव प्रतिमा स्थापित कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर दूध, दही, घी, शक्कर, शहद, पंचामृत और गंगाजल से अभिषेक किया जाता है।

जानिए शनि साढेसाती के तीन चरण

शनि साढेसाती में शनि तीन राशियों पर गोचर करते है। तीन राशियों पर शनि के गोचर को साढेसाती के तीन चरण के नाम से भी जाना जाता है। अलग- अलग राशियों के लिये शनि के ये तीन चरण अलग – अलग फल देते है। शनि कि साढेसाती के नाम से ही लोग भयभीत रहते है।

जिस व्यक्ति को यह मालूम हो जाये की उसकी शनि की साढेसाती चल रही है, वह सुनकर ही व्यक्ति मानसिक दबाव में आ जाता है। आने वाले समय में होने वाली घटनाओं को लेकर तरह-तरह के विचार उसके मन में आने लगते है।

शनि की साढेसाती को लेकर जिस प्रकार के भ्रम देखे जाते है। वास्तव में साढेसाती का रुप वैसा बिल्कुल नहीं है।  आईये शनि के चरणों को समझने का प्रयास करते है-

साढेसाती चरण-फल विभिन्न राशियों के लिये

साढेसाती का प्रथम चरण वृ्षभ, सिंह, धनु राशियों के लिये कष्टकारी होता है। द्वितीय चरण या मध्य चरण- मेष, कर्क, सिंह, वृ्श्चिक, मकर राशियों के लिये अनुकुल नहीं माना जाता है। व अन्तिम चरण- मिथुन, कर्क, तुला, वृ्श्चिक, मीन राशि के लिये कष्टकारी माना जाता है।

इसके अतिरिक्त तीनों चरणों के लिये शनि की साढेसाती निम्न रुप से प्रभाव डाल सकती है-

प्रथम चरण

इस चरणावधि में व्यक्ति की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है। आय की तुलना में व्यय अधिक होते है। विचारें गये कार्य बिना बाधाओं के पूरे नहीं होते है। धन विषयों के कारण अनेक योजनाएं आरम्भ नहीं हो पाती है। अचानक से धन हानि होती है। व्यक्ति को निद्रा में कमी का रोग हो सकता है। स्वास्थय में कमी के योग भी बनते है। विदेश भ्रमण के कार्यक्रम बनकर -बिगडते रह्ते है। यह अवधि व्यक्ति की दादी के लिये विशेष कष्टकारी सिद्ध होती है। मानसिक चिन्ताओं में वृ्द्धि होना सामान्य बात हो जाती है। दांम्पय जीवन में बहुत से कठिनाई आती है। मेहनत के अनुसार लाभ नहीं मिल पाते है।

द्वितीय चरण

व्यक्ति को शनि साढेसाती की इस अवधि में पारिवारिक तथा व्यवसायिक जीवन में अनेक उतार-चढाव आते है। उसे संबन्धियों से भी कष्ट होते है। व्यक्ति को अपने संबन्धियों से कष्ट प्राप्त होते है। उसे लम्बी यात्राओं पर जाना पड सकता है। घर -परिवार से दूर रहना पड सकता है। व्यक्ति के रोगों में वृ्द्धि हो सकती है। संपति से संम्बन्धित मामले परेशान कर सकते है।

मित्रों  का सहयोग समय पर नहीं मिल पाता है। कार्यो के बार-बार बाधित होने के कारण व्यक्ति के मन में निराशा के  भाव आते है। कार्यो को पूर्ण करने के लिये सामान्य से अधिक प्रयास करने पडते है।  आर्थिक परेशानियां भी बनी रह सकती है।

तीसरा चरण

शनि साढेसाती के तीसरे चरण में व्यक्ति के भौतिक सुखों में कमी होती है। उसके अधिकारों में कमी होती है। आय की तुलना में व्यय अधिक होते है। स्वास्थय संबन्धी परेशानियां आती है। परिवार में शुभ कार्यो बाधित होकर पूरे होते है। वाद-विवाद के योग बनते है। संतान से विचारों में मतभेद उत्पन्न होते है। संक्षेप में यह अवधि व्यक्ति के लिये कल्याण कारी नहीं रह्ती है। जिस व्यक्ति की जन्म राशि पर शनि की साढेसाती का तीसरा चरण चल रहा हों, उस व्यक्ति को वाद-विवादों से बचके रहना चाहिए।

कैसा हो आपका वास्तु सम्मत आफिस!

अक्सर लोग मकान, दुकान या ऑफिस बनाते समय वास्तु के बारे में जानकारी लेते देखे जाते हैं। सवाल उठता है कि आखिर वास्तु है क्या और इसके अनुसार मकान, दुकान आदि नहीं बनाने पर क्या होता है। क्या यह कोई विज्ञान है या विज्ञान की कोई शाखा या फिर कोई अंधविश्वास। प्राचीन मान्यताओं की मानें तो हर दिशा विशेष गुण लिए होती है और उन गुणों के मुताबिक इमारत बनाने से लाभ होता है। इन्हीं बातों को दूसरे शब्दों में लोग दिशाओं का विज्ञान मानते हैं और इसके अनुरूप निर्माण कार्य कराने का भरपूर यत्न करते हैं। वास्तु आजकल लोगों के जीवन में उतर चुका है, उनकी जरूरत बन गया है। लोगों की इसी जरूरत ने इसे एक बड़ा करियर बना दिया है, जिसमें संभावनाओं की भरमार है।

वास्तु के दृष्टिकोण से एक अच्छे आफिस में बैठते हुए यह ध्यान रखना जरूरी हैं कि स्वामी की कुर्सी आफिस के दरवाजे के ठिक सामने ना हो।

कमर के पीछे ठोस दीवार होनी चाहिए । यह भी ध्यान रखे कि आफिस की कुर्सी पर बैठते समय आपका मुंह पूर्व या उत्तर दिशा में रहे।

आपका टेलिफोन आपके सीधे हाथ की तरफ, दक्षिण या पूर्व दिशा में रहें तथा कम्प्यूटर भी आग्नेय कोण में (सीधे हाथ की तरफ) होना चाहिए।

इसी प्रकार स्वागत कक्ष (रिसेप्शन) आग्नेय कोण मे होना चाहिए लेकिन स्वागतकर्ता (रिसेप्सनिष्ट) का मुंह उत्तर की ओर होना चाहिए जिससे गलतियां कम होगी ।

आफिस में मंदिर (पूजा स्थल) ईशान कोण में होना चाहिए परन्तु इस स्थान पर एक गमला अवश्य रखें जिससे आफिस की शोभा बढ़ेगी। फाईल या किताबों की रेक वायव्य या पश्चिम में रखना हितकारी होगा ।

परन्तु पूरब की तरफ मुंह करके बैठते समय अपने उल्टे हाथ की तरफ ‘‘कैश बाक्स‘‘ (धन रखने की जगह) बनाए इससे धनवृद्धि होगी ।

उत्तर दिशा में पानी का स्थान बनाए । पश्चिम दिशा में प्रमाण पत्र, शिल्ड व मेडल तथा अन्य प्राप्त पुरस्कार को सजा कर रखें ।

ऐसा करने से आपका आफिस निश्चित रूप से वास्तु संम्मत कहलाएगा व आपको शांति व संमृद्धि देने के साथ साथ आपकी उन्नति में भी सहायक होगा ।

यदि काम रचनात्मक है, तो केबिन की दिशा मुख्य द्वार के विपरीत रखें। अगर आपने ऑफिस घर में ही बनाया हुआ है, तो वह बेडरूम के पास न हो। कॉरपोरेट जगत से जुड़े हैं, तो केबिन की दिशा मेन गेट की ओर रखें।

भारतीय ज्योतिष दर्शन के अनुसार, किसी भी व्यक्ति को दो कारणों से दुख मिलते हैं, गृह दोष और ग्रह दोष। गृह का मतलब है व्यक्ति का घर और ग्रह का मतलब है व्यक्ति की कुंडली के ग्रह। जन्मपत्री में दसवां घर व्यक्ति के प्रोफेशनल करियर पर रोशनी डालता है। यदि जन्मपत्री के दसवें घर में सूर्य हो, तो व्यक्ति को सिर ढकने से करियर में बहुत सहायता मिलती है। वास्तुशास्त्र की लाल किताब के अनुसार, रोजाना गाय, कौए और कुत्ते को खाना खिलाने से व्यक्ति के जीवन में शांति और समृद्धि आती है।

आपके केबिन की लोकेशन:

अगर आपका काम रचनात्मक है, यानी आप लेखन, पत्रकारिता और फिल्म आदि से जुड़े हैं, तो आपके केबिन की दिशा मुख्य दरवाजे के दूसरी ओर यानी विपरीत होनी चाहिए। अगर ऑफिस घर में ही बना हो तो यह बेड रूम के पास नहीं होना चाहिए। अगर आप राजनीति या कॉरपोरेट जगत से जुड़े हैं, तो आपके केबिन की दिशा मेन गेट की ओर हो।

बैठने का इंतजाम:

जब आप मीटिंग रूम में हों तो नुकीली मेज काम में न लाएं। कभी भी मीटिंग में दरवाजे के करीब और उसकी तरफ पीठ करके न बैठें।

मेज का आकार:

करियर में तरक्की के लिए अंडाकार, गोल और यू के आकार की मेज को सही नहीं माना जाता है। इसे चौकोर होना चाहिए। ऑफिस के काम के लिए लकड़ी की मेज को अच्छा मानते हैं। मेज को केबिन के दाहिने किनारे से दूर रखना चाहिए।

फूलों का प्रभाव

मेज के पूर्व में ताजे फूल रखें। इनमें से कुछ कलियां निकल रही हों तो यह नए जीवन का प्रतीक माना जाता है। फूलों को झड़ने से पहले ही बदल देना शुभ होता है।

विभिन्न कार्यालयों हेतु शुभ रंग

1. किसी डाक्टर के क्लिनिक में स्वयं का चैम्बर सफेद या हल्के हरे रंग का होना चाहिए।

2. किसी वकील का सलाह कक्ष काला, सफेद अथवा नीले रंग का होना चाहिए।

3. किसी चार्टर्ड एकाउन्टेंट का चैम्बर सफेद एवं हल्के पीले रंग का हो सकता हैं।

4. किसी ऐजन्ट का कार्यालय गहरे हरे रंग का हो सकता हैं।

जीवन को समृद्धशाली बनाने के लिए व्यवसाय की सफलता महत्वपूर्ण हैं इसके लिए कार्यालय को वास्तु सम्मत बनाने के साथ साथ विभिन्न रंगों का उपयोग लाभदायक सिद्ध हो सकता हैं।

अंक ज्योतिष मिलाए जोड़ी

अंक ज्योतिष (Numerology) भविष्य जानने की एक विद्या है। अंक ज्योतिष से ज्योतिष की अन्य विधाओं की तरह भविष्य और सभी प्रकार के ज्योंतिषीय प्रश्नों का उत्तर ज्ञात किया जा सकता है। विवाह जैसे महत्वपूर्ण विषय में भी अंक ज्योतिष और उसके उपाय काफी मददगार साबित होते हैं।

अंक ज्योंतिष अपने नाम के अनुसार अंक पर आधारित है। अंक शास्त्र के अनुसार सृष्टि के सभी गोचर और अगोचर तत्वों अपना एक निश्चत अंक होता है। अंकों के बीच जब ताल मेल नहीं होता है तब वे अशुभ या विपरीत परिणाम देते हैं। अंकशास्त्र में मुख्य रूप से नामांक, मूलांक और भाग्यांक इन तीन विशेष अंकों को आधार मानकर फलादेश किया जाता है। विवाह के संदर्भ में भी इन्हीं तीन प्रकार के अंकों के बीच सम्बन्ध को देखा जाता है। अगर वर और वधू के अंक आपस में मेल खाते हैं तो विवाह हो सकता है। अगर अंक मेल नहीं खाते हैं तो इसका उपाय करना होता है ताकि अंकों के मध्य मधुर सम्बन्ध स्थापित हो सके।

वैदिक ज्योतिष (Vedic Astrology) एवं उसके समानांतर चलने वाली ज्योतिष विधाओं में वर वधु के वैवाहिक जीवन का आंकलन करने के लिए जिस प्रकार से कुण्डली से गुण मिलाया जाता ठीक उसी प्रकार अंकशास्त्र में अंकों को मिलाकर (Numerology Marriage compatibility) वर वधू के वैवाहिक जीवन का आंकलन किया जाता है।

अंकशास्त्र से वर वधू का गुण मिलान (Matching for marriage through Numerology)

अंकशास्त्र में वर एवं वधू के वैवाहिक गुण मिलान के लिए, अंकशास्त्र के प्रमुख तीन अंकों में से नामांक ज्ञात किया जाता है। नामांक ज्ञात करने के लिए दोनों के नामों को अंग्रेजी के अलग अलग लिखा जाता है। नाम लिखने के बाद सभी अक्षरों के अंकों को जोड़ा जाता है जिससे नामांक ज्ञात होता है। ध्यान रखने योग्य तथ्य यह है कि अगर मूलक 9 से अधिक हो तो योग से प्राप्त संख्या को दो भागों में बांटकर पुन: योग किया जाता है। इस प्रकार जो अंक आता है वह नामांक होता है। उदाहरण से योग 32 आने पर 3+2=5। वर का अंक 5 हो और कन्या का अंक 8 तो दोनों के बीच सहयोगात्मक सम्बन्ध रहेगा, अंकशास्त्र का यह नियम है।

वर वधू के नामांक का फल (Matching by Name Number)

अंकशास्त्र के नियम के अनुसार अगर वर का नामांक 1 है और वधू का नामांक भी एक है तो दोनों में समान भावना एवं प्रतिस्पर्धा रहेगी जिससे पारिवारिक जीवन में कलह की स्थिति होगी। कन्या का नामांक 2 होने पर किसी कारण से दोनों के बीच तनाव की स्थिति बनी रहती है। वर 1 नामांक का हो और कन्या तीन नामांक की तो उत्तम रहता है दोनों के बीच प्रेम और परस्पर सहयोगात्मक सम्बन्ध रहता है। कन्या 4 नामंक की होने पर पति पत्नी के बीच अकारण विवाद होता रहता है और जिससे गृहस्थी में अशांति रहती है। पंचम नामंक की कन्या के साथ गृहस्थ जीवन सुखमय रहता है। सप्तम और नवम नामाक की कन्या भी 1 नामांक के वर के साथ सुखमय वैवाहिक जीवन का आनन्द लेती है जबकि षष्टम और अष्टम नामांक की कन्या और 1 नमांक का वर होने पर वैवाहिक जीवन के सुख में कमी आती है।

वर का नामांक 2 हो और कन्या 1 व 7 नामांक की हो तब वैवाहिक जीवन के सुख में बाधा आती है। 2 नामांक का वर इन दो नामांक की कन्या के अलावा अन्य नामांक वाली कन्या के साथ विवाह करता है तो वैवाहिक जीवन आनन्दमय और सुखमय रहता है। तीन नामांक की कन्या हो और वर 2 नामांक का तो जीवन सुखी होता है परंतु सुख दुख धूप छांव की तरह होता है। वर 3 नामांक का हो और कन्या तीन, चार अथवा पांच नामांक की हो तब अंकशास्त्र के अनुसार वैवाहिक जीवन उत्तम नहीं रहता है। नामांक तीन का वर और 7 की कन्या होने पर वैवाहिक जीवन में सुख दु:ख लगा रहता है। अन्य नामांक की कन्या का विवाह 3 नामांक के पुरूष से होता है तो पति पत्नी सुखी और आनन्दित रहते हैं।

4 अंक का पुरूष हो और कन्या 2, 4, 5 अंक की हो तब गृहस्थ जीवन उत्तम रहता है। चतुर्थ वर और षष्टम या अष्टम कन्या होने पर वैवाहिक जीवन में अधिक परेशानी नहीं आती है। 4 अंक के वर की शादी इन अंकों के अलावा अन्य अंक की कन्या से होने पर गृहस्थ जीवन में परेशानी आती है। 5 नामांक के वर के लिए 1, 2, 5, 6, 8 नामांक की कन्या उत्तम रहती है। चतुर्थ और सप्तम नामांक की कन्या से साथ गृहस्थ जीवन मिला जुला रहता है जबकि अन्य नामांक की कन्या होने पर गृहस्थ सुख में कमी आती है। षष्टम नामांक के वर के लिए 1 एवं  6 अंक की कन्या से विवाह उत्तम होता है। 3, 5, 7, 8 एवं 9 नामांक की कन्या के साथ गृहस्थ जीवन सामान्य रहता है और  2 एवं चार नामांक की कन्या के साथ उत्तम वैवाहिक जीवन नहीं रह पाता।

वर का नामांक 7 होने पर कन्या अगर 1, 3, 6, नामांक की होती है तो पति पत्नी के बीच प्रेम और सहयोगात्मक सम्बन्ध होता है। कन्या अगर 5, 8 अथवा 9 नामंक की होती है तब वैवाहिक जीवन में थोड़ी बहुत परेशानियां आती है परंतु सब सामान्य रहता है। अन्य नामांक की कन्या होने पर पति पत्नी के बीच प्रेम और सहयोगात्मक सम्बन्ध नहीं रह पाता है।

आठ नामांक का वर 5, 6 अथवा 7 नामांक की कन्या के साथ विवाह करता है तो दोनों सुखी होते हैं। 2 अथवा 3 नामांक की कन्या से विवाह करता है तो वैवाहिक जीवन सामान्य बना रहता है जबकि अन्य नामांक की कन्या से विवाह करता है तो परेशानी आती है। 9 नामांक के वर के लिए 1, 2, 3, 6 एवं 9 नामांक की कन्या उत्तम होती है जबकि 5 एवं 7 नामांक की कन्या सामान्य होती है। 9 नामांक के वर के लिए 4 और 8 नामांक की कन्या से विवाह करना अंकशास्त्र की दृष्टि से शुभ नही होता है।

ज्योतिष अनुसार शिक्षा के योग

दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करते ही ‘कौन-सा विषय चुनें’ यह यक्ष प्रश्न बच्चों के सामने आ खड़ा होता है। माता-पिता को अपनी महत्वाकांक्षाओं को परे रखकर एक नजर कुंडली पर भी मार लेनी चाहिए। बच्चे किस विषय में सिद्धहस्त होंगे, यह ग्रह स्थिति स्पष्ट बताती है।

आज जीवन के हर मोड़ पर आम आदमी स्वयं को खोया हुआ महसूस करता है। विशेष रूप से वह विद्यार्थी जिसने हाल ही में दसवीं या बारहवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की है, उसके सामने सबसे बड़ा संकट यह रहता है कि वह कौन से विषय का चयन करे जो उसके लिए लाभदायक हो। एक अनुभवी ज्योतिषी आपकी अच्छी मदद कर सकता है। जन्मपत्रिका में पंचम भाव से शिक्षा तथा नवम भाव से उच्च शिक्षा तथा भाग्य के बारे में विचार किया जाता है।

सबसे पहले जातक की कुंडली में पंचम भाव तथा उसका स्वामी कौन है तथा पंचम भाव पर किन-किन ग्रहों की दृष्टि है, ये ग्रह शुभ-अशुभ है अथवा मित्र-शत्रु, अधिमित्र हैं विचार करना चाहिए। दूसरी बात नवम भाव एवं उसका स्वामी, नवम भाव स्थित ग्रह, नवम भाव पर ग्रह दृष्टि आदि शुभाशुभ का जानना।

तीसरी बात जातक का सुदर्शन चंद्र स्थित श्रेष्ठ लग्न के दशम भाव का स्वामी नवांश कुंडली में किस राशि में किन परिस्थितियों में स्थित है ज्ञात करना, तीसरी स्थिति से जातक की आय एवं आय के स्त्रोत का ज्ञान होगा। जन्मकुंडली में जो सर्वाधिक प्रभावी ग्रह होता है सामान्यत: व्यक्ति उसी ग्रह से संबंधित कार्य-व्यवसाय करता है। यदि हमें कार्य व्यवसाय के बारे में जानकारी मिल जाती है तो शिक्षा भी उसी से संबंधित होगी। जैसे यदि जन्म कुंडली में गुरु सर्वाधिक प्रभावी है तो जातक को चिकित्सा, लेखन, शिक्षा, खाद्य पदार्थ के द्वारा आय होगी।

यदि जातक को चिकित्सक योग है तो जातक जीव विज्ञान विषय लेकर चिकित्सक बनेगा। यदि पत्रिका में गुरु कमजोर है तो जातक आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक, रैकी या इनके समकक्ष ज्ञान प्राप्त करेगा। श्रेष्ठ गुरु होने पर एमबीबीएस की पढ़ाई करेगा। यदि गुरु के साथ मंगल का श्रेष्ठ योग बन रहा है तो शल्य चिकित्सक, यदि सूर्य से योग बन रहा है तो नेत्र चिकित्सा या सोनोग्राफी या इलेक्ट्रॉनिक उपकरण से संबंधित विषय की शिक्षा, यदि शुक्र है तो महिला रोग विशेषज्ञ, बुध है तो मनोरोग तथा राहु है तो हड्डी रोग विशेषज्ञ बनेगा। चंद्र की श्रेष्ठ स्थिति में किसी विषय पर गहन अध्ययन करेगा।

लेखक, कवि, श्रेष्ठ विचारक बनेगा तथा बीए, एमए कर श्रेष्ठ चिंतनशील, योजनाकार होगा। सूर्य के प्रबल होने पर इलेक्ट्रॉनिक से संबंधित शिक्षा ग्रहण करेगा। यदि मंगल अनुकूल है तो ऐसा जातक कला, भूमि, भवन, निर्माण, खदान, केमिकल आदि से संबंधित विषय शिक्षा ग्रहण करेगा। बुध प्रधान कुंडली वाले जातक बैंक, बीमा, कमीशन, वित्तीय संस्थान, वाणी से संबंधित कार्य, ज्योतिष-वैद्य, शिक्षक, वकील, सलाहकार, चार्टड अकाउंटेंट, इंजीनियर, लेखपाल आदि का कार्य करते हैं। अत: ऐसे जातक को साइंस, मैथ्स की शिक्षा ग्रहण करना चाहिए किंतु यदि बुध कमजोर हो तो वाणिज्य विषय लेना चाहिए।

बुध की श्रेष्ठ स्थिति में चार्टड अकाउंटेंट की शिक्षा ग्रहण करना चाहिए। शुक्र की अनुकूलता से जातक साइंस की शिक्षा ग्रहण करेगा। शुक्र की अधिक अनुकूलता होने से जातक फैशन, सुगंधित व्यवसाय, श्रेष्ठ कलाकार तथा रत्नों से संबंधित विषय को चुनता है।

शनि ग्रह प्रबंध, लौह तत्व, तेल, मशीनरी आदि विषय का कारक है। अत: ऐसे जातकों की शिक्षा में व्यवधान के साथ पूर्ण होती है। शनि के साथ बुध होने पर जातक एमबीए फाइनेंस में करेगा। यदि शनि के साथ मंगल भी कारक है तो सेना-पुलिस अथवा शौर्य से संबंधित विभाग में अधिकारी बनेगा।

राहु की प्रधानता कुटिल ज्ञान को दर्शाती है। केतु – तेजी मंदी तथा अचानक आय देने वाले कार्य शेयर, तेजी मंदी के बाजार, सट्टा, प्रतियोगी क्वीज, लॉटरी आदि। कभी-कभी एक ही ग्रह विभिन्न विषयों के सूचक होते हैं तो ऐसी स्थिति में जातक एवं ज्योतिषी दोनों ही अनिर्णय की स्थिति में आ जाते हैं। उसका सही अनुमान लगाना ज्योतिषी का कार्य है। ऐसी स्थिति में देश, काल एवं पात्र को देखकर निर्णय लेना उचित रहेगा। जैसे नवांश में बुध का स्वराशि होना ज्योतिष, वैद्य, वकील, सलाहकार का सूचक है। अब यहां जातक के पिता का व्यवसाय (स्वयं की रुचि) जिस विषय की होगी, वह उसी विषय का अध्ययन कर धनार्जन करेगा।

सामान्यत: वैदिक ग्रंथों के अनुसार सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरू और शनि इन सात ग्रहों का अपना अलग-अलग क्षेत्र और प्रभाव है। लेकिन, जब इन ग्रहों का आपसी योग बनता है तो क्षेत्र और प्रभाव बदल जाते हैं। इन ग्रहों के साथ राहु और केतु मिल जाये, तो कार्य में बाधा उत्पन्न करते हैं।

व्यवहारिक भाशा में कहें तो टांग अड़ाते हैं। जन्मकुंडली के मुख्य कारक ग्रह ही कुंडली के प्रेसिडेंट होते हैं। यानी जो भी कुछ होगा वह उन ग्रहों की देखरेख में होगा, अत: यह ध्यान में जरूर रखें कि इस कुंडली में कारक ग्रह कौन से हैं। अगर कारक ग्रह कमजोर हैं या अस्त है, वृद्धावस्था में हैं तो उसके बाद वाले ग्रहों का असर आरंभ हो जायेगा। मंगल, शुक्र और सूर्य, शनि करियर की दशा तय करते हैं।

बुध और गुरु उस क्षेत्र की बुद्धि और शिक्षा प्रदान करते हैं। यद्यपि क्षेत्र इनका भी निश्चित है, लेकिन इन पर जिम्मेदारियां ज्यादा रहती हैं। इसलिये कुंडली में इनकी शक्ति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आज हम किसी एक या दो ग्रहों के करियर पर प्रभाव की चर्चा करेंगे। जन्मकुंडली में वैसे तो सभी बारह भाव एक दूसरे को पूरक हैं, किंतु पराक्रम, ज्ञान, कर्म और लाभ इनमें महत्?वपूर्ण है। इसके साथ ही इन सभी भावों का प्रभाव नवम भाग्य भाव से तय होता है। अत: यह परम भाव है।

सूर्य और मंगल यानी सोच और साहस के परम शुभ ग्रह माने गये हैं। सूर्य को कुंडली की आत्मा कहा गया है। और शोधपरक, आविष्कारक, रचनात्मक क्षेत्र से संबंधित कार्यों में इनका खास दखल रहता है। मशीनरी अथवा वैज्ञानिक कार्यों की सफलता सूर्यदेव के बगैर संभव ही नहीं है। जब यही  सूक्ष्म कार्य मानव शरीर से जुड़ जाता है तो शुक्र का रोल आरंभ हो जाता है, क्योंकि मेंडिकल एस्ट्रोजॉली में शुक्र तंत्रिका तंत्र विज्ञान के कारक हैं। यानी शुक्र को न्यूरोलॉजी और गुप्त रोग का ज्ञान देने वाला माना गया है। सजीव में शुक्र का रोल अधिक रहता है और निर्जीव में सूर्य का रोल अधिक रहता है।

यदि आपकी कुंडली में ये दोनों ग्रह एक साथ हैं और दक्ष अंश की दूरी पर हैं तो ह मानकर चलें कि इनका फल आपके ऊपर अधिक घटित होगा। तीसरे भाव, पांचवें भाव, दशम भाव और एकादश भाव में इनकी स्थिति आपके कुशल वैज्ञानिक, आविश्कारक, डॉक्टर, संगीतज्ञ, फैशन डिजाइनर, हार्ट अथवा न्यूरो सर्जन बना सकती है। इन दोनों की युति में शुक्र बलवान हों, तो स्त्री रोग विशेषज्ञ बना सकते हैं। साथ ही ललित कला और फिल्म उद्योग में संगीतकार आदि बन सकते हैं।

लेकिन, जब इन्हीं सूर्य के साथ मंगल मिले हैं, तो पुलिस, सेना, इंजीनियर, अग्निशमन विभाग, कृषि कार्य, जमीन-जायदाद, ठेकेदारी, सर्जरी,  खेल, राजनीति तथा अन्य प्रबंधन कार्य के क्षेत्र में अपना भाग्य आजमा सकते हैं। यदि इनकी युति पराक्रम भाव में दशम अथवा एकादश भाव में हो इंजीनियरिंग, आईआईटी वैज्ञानिक बनने के साथ-साथ अच्छे खिलाड़ी और प्रशासक बनना लगभग सुनिश्चित कर देती है। अधिकतर वैज्ञानिक, खिलाडिय़ों और प्रभावशाली व्यक्तियों की कुंडली में यह युति और योग देखे जा सकते हैं। आज के प्रोफेशनल युग में इनका प्रभाव और फल चरम पर रहता है।

इसलिये यह मानकर चलें कि यदि कुंडली में मंगल, सूर्य तीसरे दसवे या ग्याहरवें भाव में हो तो अन्य ग्रहों के द्वारा बने हयु योगों को ध्यान में रखकर उपरोक्त कहे गये क्षेत्रों में अपना भाग्य आजमाना चाहिये। यदि इनके साथ बुध भी जुड़ जायें तो एजुकेशन, बैंक और बीमा क्षेत्र में किस्मत आजमा सकते हैं। लेकिन, इसके लिये कुंडली में बुध ओर गुरु की स्थिति पर ध्यान देने की जरूरत है।

वास्तुकला तथा अन्य नक्काशी वाले क्षेत्रों के दरवाजे भी आपके लिये खुल जायेंगे, इसलिये कुंडली में अगर सूर्य, मंगल की प्रधानता हो तो इनके कारक अथवा संबंधित क्षेत्र अति लाभदायक और कामयाबी दिलाने वाले रहेंगे, इसलिये जो बेहतर और आपकी प्रकृति को सूट करे वही क्षेत्र चुनें।

* विषय के चुनाव हेतु कुंडली के चौथे व पाँचवें भाव का प्रमुख रूप से अध्ययन करना चाहिए। साथ ही लग्न यानी व्यक्ति के स्वभाव का ‍भी विवेचन कर लेना चाहिए।

ग्रहानुसार विषय :—–

* यदि चौथे व पाँचवें भाव पर हो।

1 सूर्य का प्रभाव – आर्ट्‍स, विज्ञान

2 मंगल का प्रभाव – जीव विज्ञान

3. चंद्रमा का प्रभाव – ट्रेवलिंग, टूरिज्म

4. बृहस्पति का प्रभाव – किसी विषय में अध्यापन की डिग्री

5 बुध का प्रभाव – कॉमर्स, कम्प्यूटर

6 शुक्र का प्रभाव- मीडिया, मास कम्युनिकेशन, गायन, वादन

7 शनि का प्रभाव- तकनीकी क्षेत्र, गणित

इन मुख्‍य ग्रहों के अलावा ग्रहों की युति-प्रतियुति का भी अध्ययन करें, तभी किसी निष्कर्ष पर पहुँचें। (जैसे शुक्र और बुध हो तो होम्योपैथी या आयुर्वेद पढ़ाएँ) ताकि चुना गया विषय बच्चे को आगे सफलता दिला सके।

कैसी और किस दिशा में होगी शिक्षा ..

वर्तमान में प्रत्येक व्यक्ति उच्च शिक्षा पाना चाहता है अथवा अपनी सन्तान को उच्च शिक्षा दिलाना चाहता है जिससे वह भविष्य में अच्छी नौकरी या व्यापार करके सुख व समस्या रहित जीवन जी सके। दूसरे शब्दों में यह कह लीजिए कि प्रत्येक व्यक्ति सन्तान को उच्च शिक्षा  दिलाकर उसका अच्छा कैरियर बनाना चाहता है।

उच्च शिक्षा प्राप्ति के लिए कुण्डली का चतुर्थ, पंचम एवं द्वितीय भाव में स्थित ग्रह व उनके स्वामियों की स्थिति, पंचमेश, चतुर्थेश, द्वितीयेश के साथ शुभ व अशुभ ग्रहों की स्थिति, दृष्टि व युति, दशमेश व दशम भाव की स्थिति के साथ-साथ चतुर्विशांश कुंडली, दशमांश कुंडली तथा कारंकाश कुंडली का अध्ययन शिक्षा, वाणी, बुद्धि तथा तर्कशक्ति आदि के बारे में बताता है।

 

शिक्षा कैसी होगी, जातक भविष्य में किस दिशा में, क्षेत्र में, अपनी आजीविका प्राप्त करेगा व उसके सुखद भविष्य के लिए कौन-कौन क्षेत्र अच्छे रहेंगे, इन प्रश्नों के उत्तर एक ज्योतिषी जन्मकुंडली का विश्लेषण करके बता सकता है।

कुण्डली के चतुर्थ भाव से विद्या, पंचम भाव से बुद्धि, द्वितीय भाव से वाणी, आठवें भाव से सामान्य ज्ञान एवं गुप्त विद्या तथा दशम भाव से विद्या जनित यश व आजीविका का भान होता है। इन सभी भावों में स्थित ग्रह, इनके स्वामी ग्रह आदि के विश्लेषण से जातक की शिक्षा व विद्या का क्षेत्र कैसा रहेगा तथा भविष्य कैसा होगा यह जाना जाता है।

शिक्षा प्राप्ति के कुछ अनुभूत ज्योतिष योगों की चर्चा करते हैं-

  1. यदि गुरु केंद्र(1,4,7व 10) में हो तो जातक बुद्धिमान होता है। गुरु उच्च अथवा स्वग्रही हो तो और अच्छा फल देता है।
  2. पंचम भाव में सूर्य सिंह राशि में हो तो जातक मनोनुकूल शिक्षा पूर्ण करता है।
  3. बुध पंचम में हो तथा पंचमेश बली होकर केंद्र में स्थित हो तथा शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो जातक बुद्धिमान होता है।
  4. पंचमेश उच्च का केंद्र या त्रिकोण में स्थित हो तो जातक पूर्ण शिक्षा पाता है।
  5. गुरु शुक्र व बुध यदि केंद्र व त्रिकोण में एक साथ या अलग-अलग स्थित हों तथा गुरु उच्च, स्वग्रही या मित्र क्षेत्र में हो तो सरस्वती योग बनता है। ऐसे जातक पर सरस्वती की विशेष कृपा होती है।
  6. दशमेश व पंचमेश का स्थान परिवर्तन अर्थात् दशम भाव का स्वामी पंचम में तथा पंचम भाव का स्वामी दशम में हो तो व्यक्ति अच्छी शिक्षा प्राप्त करता है।
  7. बुध, चंद्रमा व मंगल पर शुक्र या गुरु की दृष्टि हो तो भी जातक बड़ा बुद्धिमान होता है।
  8. पंचम भाव में गुरु हो तो जातक अनेक शास्त्रों का ज्ञाता पुत्र व मित्रों से समृद्ध, बुद्धिमान व धैर्यवान होता है।
  9. लग्नेश यदि 12वें या 8वें भाव में हो तो जातक सिद्धि प्राप्त करता है और वह विद्या विशारद होता है।
  10. चतुर्थेश सप्तम व लग्न में हो तो जातक बहुत सी विद्या का ज्ञाता होता है।
  11. चंद्रमा से गुरु त्रिकोण में हो, बुध से मंगल त्रिकोण में और गुरु से बुध एकादश स्थान में हो तो जातक अच्छी शिक्षा प्राप्त  करके बहुत सा धन अर्जन करता है।
  12. शिक्षा प्राइज़ में सूर्य चंद्र, बुध, गुरु, मंगल व शनि ग्रह की विशेष भूमिका है। इसके अतिरिक्त लग्नेश, पंचमेश व नवमेश तथा इन भावों का विश्लेषण भी उच्च शिक्षा प्राप्ति हेतु करना चाहिए। लग्नेश निर्बल हुआ तो बुद्धि व भाग्य व्यर्थ हो जाएंगे, यदि पंचम भाव निर्बल हुआ तो शरीर और भाग्य क्या करेंगे और यदि भाग्य कमजोर हुआ तो शरीर व बुद्धि व्यर्थ होंगे।
  13. पंचमेश शुभ ग्रह हो और पंचमेश का नवांशपति भी शत्रु ग्रहों से युत व दृष्टा न हो तो उच्च शिक्षा प्राप्त होती है।
  14. गुरु केंद्र या त्रिकोण में होकर शनि, राहु, केतु से युत या दृष्ट हो तो जातक उच्च शिक्षा प्राप्त कर विद्वान बनता है।
  15. गुरु द्वितीयेश होकर बलवान सूर्य व शुक्र से दृष्ट हो तो जातक व्याकरण शास्त्र का ज्ञाता होता है।
  16. पंचम भाव व पंचमेश बुध व मंगल के प्रभाव में हो तो जातक व्?यापार संबंधी उच्?च शिक्षा प्राप्त करता है।
  17. धन भाव में मंगल शुभ ग्रहों से दृष्ट हो या धनभाव में चंद्र, मंगल की युति हो व बुध द्वारा दृष्ट हो तो जातक गणित विषय का ज्ञाता होता है।
  18. यदि द्वितीयेश से 8वें, 12वें शुभ ग्रह हों तो जातक प्रखर विद्वान होता है।
  19. लग्नेश, पंचमेश, नवमेश में परस्?पर युति या दृष्टि संबंध हो तो जातक उच्च शिक्षा प्राप्त करता है।
  20. गुरु व चंद्रमा एक-दूसरे के घर में हो तो चंद्रमा पर गुरु की दृष्टि हो तो सरस्वती योग होता है, जिससे जातक साहित्य, कला व काव्य में उच्च शिक्षा पाकर लोकप्रिय होता है।
  21. गुरु लग्न में हो तथा चंद्र से तृतीय सूर्य, मंगल, बुध हो तो जातक विज्ञान विषय में उच्च शिक्षा पाकर वैज्ञानिक बनता है।
  22. यदि मेष लग्न हो और पंचम में बुध तथा सूर्य पर गुरु की दृष्टि पड़े तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
  23. यदि वृष लग्न हो और उसमें सूर्य बुध की युति लग्न, चतुर्थ या अष्टम में हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
  24. यदि मिथुन लग्न हो और लग्न में शनि, तृतीय में शुक्र तथा नवम में गुरु स्थित हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
  25. यदि कर्क लग्न हो और उसमें लग्न में बुध, गुरु व शुक्र की युति हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
  26. यदि सिंह लग्न हो और मंगल-गुरु की युति चतुर्थ, पंचम या एकादश भाव में हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
  27. यदि कन्या लग्न हो और उसमें एकादश भाव में गुरु, चंद्र तथा नवम भाव में बुध स्थित हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
  28. यदि तुला लग्न हो और अष्टम में शनि गुरु द्वारा दृष्ट हो तथा नवम में बुध स्थित हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
  29. यदि वृश्चिक लग्न हो और उसमें बुध सूर्य हो तथा नवम भाव में गुरु चंद्र स्थित हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
  30. यदि धनु लग्न हो और उसमें गुरु हो तथा पंचम में मंगल व चंद्र स्थित हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
  31. यदि मकर लग्न हो और उसमें शुक्र-मंगल की युति हो तथा पंचम भाव में चंद्र गुरु द्वारा दृष्ट हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
  32. यदि कुंभ लग्न और एकादश भाव में चंद्र तथा षष्ठ भाव में गुरु स्थित हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
  33. यदि मीन लग्न हो और उसमें गुरु षष्ठ, शुक्र अष्ठम, शनि नवम तथा मंगल-चंद्र एकादश भाव में हों तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।

(आप अपनी कुण्डली में उक्त योगों को विचारकर शिक्षा संबंधी विश्लेषण कर सकते हैं।)

बच्चे का मूल स्वभाव जानकर ही शिक्षा दें..( अंक शास्त्र अनुसार)—-

अंक ज्योतिष में मूलांक जन्म तारीख के अनुसार 1 से 9 माने जाते हैं।

प्रत्येक अंक व्यक्ति का मूल स्वभाव दिखाता है। बच्चे का मूल स्वभाव जानकर ही माता-पिता उसे सही तालीम दे सकते हैं। आइए, जानें कैसा है आपके बच्चे का स्वभाव।

मूलांक 1 (1, 10 19, 28) : ये बच्चे क्रोधी, जिद्‍दी व अहंकारी होते हैं। अच्छे प्रशासनिक अधिकारी बनते हैं। ये तर्क के बच्चे हैं अत: डाँट-डपट नहीं सहेंगे। इन्हें तर्क से नहीं, प्यार से समझाएँ।

* मूलांक 2 (2, 11, 20, 29) : ये शांत, समझदार, भावुक व होशियार होते हैं। माता-पिता की सेवा करते हैं। जरा सा तेज बोलना इन्हें ठेस पहुँचाता है। इनसे शांति व समझदारी से बात करें।

* मूलांक 3 (3, 12, 21,30 ) : ये समझदार, ज्ञानी व घमंडी होते हैं। अच्‍छे सलाहकार बनते हैं। इन्हें समझाने के लिए पर्याप्त कारण व ज्ञान होना जरूरी है।

* मूलांक 4 (4, 13, 22) : बेपरवाह, खिलंदड़े व कारस्तानी होते हैं। रिस्क लेना इनका स्वभाव होता है। इन्हें अनुशासन में रखना जरूरी है। ये व्यसनाधीन हो सकते हैं।

* मूलांक 5 (5, 14, 23) : बुद्धिमान, शांत, आशावादी होते हैं। रिसर्च के कामों में रूचि लेते हैं। इनके साथ धैर्य से व शांति से बातचीत करें।

* मूलांक 6 (6, 15, 24) : हँसमुख, शौकीन मिजाज व कलाप्रेमी होते हैं। ‘खाओ पियो ‍मस्त रहो’ पर जीते हैं। इन्हें सही संस्कार व सही दिशा-निर्देश जरूरी है।

* मूलांक 7 (7, 16, 25) : भावुक, निराशावादी, तनिक स्वार्थी मगर तीव्र बुद्धि के होते हैं। व्यसनाधीन जल्दी होते हैं। कलाकार हो सकते हैं। इन्हें कड़े अनुशासन व सही मार्गदर्शन की जरूरत होती है।

* मूलांक 8 (8, 17, 26) : तनिक स्वार्थी, भावुक, अति व्यावहारिक, मेहनती व व्यापार बुद्धि वाले होते हैं। जीवन में देर से गति आती है। इन्हें सतत सहयोग व अच्छे साथियों की जरूरत होती है।

* मूलांक 9 (9, 18, 27) : ऊर्जावान, शैतान व तीव्र बुद्धि के विद्रोही होते हैं। माता-पिता से अधिक बनती नहीं है। प्रशासन में कुशल होते हैं। इनकी ऊर्जा को सही दिशा देना व इन्हें समझना जरूरी होता है।

व्यवसाय में सफलता का सटीक अध्ययन—–

शिक्षा पूर्ण होने के पश्चात अक्सर युवाओं के मन में यह दुविधा रहती है कि नौकरी या व्यवसाय में से उनके लिए उचित क्या होगा। इस संबंध में जन्मकुंडली का सटीक अध्ययन सही दिशा चुनने में सहायक हो सकता है।

* नौकरी या व्यवसाय देखने के लिए सर्वप्रथम कुंडली में दशम, लग्न और सप्तम स्थान के अधिपति तथा उन भावों में स्थित ग्रहों को देखा जाता है।

* लग्न या सप्तम स्थान बलवान होने पर स्वतंत्र व्यवसाय में सफलता का योग बनता है।

* प्रायः लग्न राशि, चंद्र राशि और दशम भाव में स्थित ग्रहों के बल के तुलनात्मक अध्ययन द्वारा व्यवसाय का निर्धारण करना उचित रहता है।

* प्रायः अग्नि तत्व वाली राशि (मेष, सिंह, धनु) के जातकों को बुद्धि और मानसिक कौशल संबंधी व्यवसाय जैसे कोचिंग कक्षाएँ, कन्सल्टेंसी, लेखन, ज्योतिष आदि में सफलता मिलती है।

* पृथ्वी तत्व वाली राशि (वृष, कन्या, मकर) के जातकों को शारीरिक क्षमता वाले व्यवसाय जैसे कृषि, भवन निर्माण, राजनीति आदि में सफलता मिलती है।

जल तत्व वाली राशि (कर्क, वृश्चिक, मीन) के जातक प्रायः व्यवसाय बदलते रहते हैं। इन्हें द्रव, स्प्रिट, तेल, जहाज से भ्रमण, दुग्ध व्यवसाय आदि में सफलता मिल सकती है।

* वायु तत्व (मिथुन, तुला, कुंभ) प्रधान व्यक्ति साहित्य, परामर्शदाता, कलाविद, प्रकाशन, लेखन, रिपोर्टर, मार्केटिंग आदि के कामों में अपना हुनर दिखा सकते हैं।

* दशम स्थान में सूर्य हो : पैतृक व्यवसाय (औषधि, ठेकेदारी, सोने का व्यवसाय, वस्त्रों का क्रय-विक्रय आदि) से उन्नति होती है। ये जातक प्रायः सरकारी नौकरी में अच्छे पद पर जाते हैं।

* चन्द्र होने पर : जातक मातृ कुल का व्यवसाय या माता के धन से (आभूषण, मोती, खेती, वस्त्र आदि) व्यवसाय करता है।

* मंगल होने पर : भाइयों के साथ पार्टनरशिप (बिजली के उपकरण, अस्त्र-शस्त्र, आतिशबाजी, वकालत, फौजदारी) में व्यवसाय लाभ देता है। ये व्यक्ति सेना, पुलिस में भी सफल होते हैं।

* बुध होने पर : मित्रों के साथ व्यवसाय लाभ देता है। लेखक, कवि, ज्योतिषी, पुरोहित, चित्रकला, भाषणकला संबंधी कार्य में लाभ होता है।

* बृहस्पति होने पर : भाई-बहनों के साथ व्यवसाय में लाभ, इतिहासकार, प्रोफेसर, धर्मोपदेशक, जज, व्याख्यानकर्ता आदि कार्यों में लाभ होता है।

* शुक्र होने पर : पत्नी से धन लाभ, व्यवसाय में सहयोग। जौहरी का कार्य, भोजन, होटल संबंधी कार्य, आभूषण, पुष्प विक्रय आदि कामों में लाभ होता है।

शनि :- शनि अगर दसवें भाव में स्वग्रही यानी अपनी ही राशि का हो तो 36वें साल के बाद फायदा होता है। ऐसे जातक अधिकांश नौकरी ही करते हैं। अधिकतर सिविल या मैकेनिकल इंजीनियरिंग में जाते है। लेकिन अगर दूसरी राशि या शत्रु राशि का हो तो बेहद तकलीफों के बाद सफलता मिलती है। अधिकांश मामलों में कम स्तर के मशीनरी कामकाज से व्यक्ति जुदा हो जाता है।

राहू :- अचानक लॉटरी से, सट्‍टे से या शेयर से व्यक्ति को लाभ मिलता है। ऐसे जातक राजनीति में विशेष रूप सफल रहते हैं।

केतु :- केतु की दशम में स्थिति संदिग्ध मानी जाती है किंतु अगर साथ में अच्छे ग्रह हो तो उसी ग्रह के अनुसार फल मिलता है लेकिन अकेला होने या पाप प्रभाव में होने पर के‍तु व्यक्ति को करियर के क्षेत्र में डूबो देता है।

बहरहाल हम बात कर रहे हैं व्यक्ति के रोजगार(Profession) की. चाहे लाल-किताब हो अथवा वैदिक ज्योतिष, अधिकतर ज्योतिषी व्यक्ति के कार्यक्षेत्र, रोजगार के प्रश्न पर विचार करने के लिए जन्मकुंडली के दशम भाव (कर्म भाव) को महत्व देते हैं. वो समझते हैं कि जो ग्रह दशम स्थान में स्थित हो या जो दशम स्थान का अधिपति हो, वो इन्सान की आजीविका को बतलाता है. अब उनके अनुसार यह दशम स्थान सभी लग्नों से हो सकता है.

जन्मलग्न से, सूर्यलग्न से या फिर चन्द्रलग्न से, जिसके दशम में स्थित ग्रहों के स्वभाव-गुण आदि से मनुष्य की आजीविका का पता चलता है. जबकि ऎसा बिल्कुल भी नहीं होता. ये पूरी तरह से गलत थ्योरी है.

दशम स्थान को ज्योतिष में कर्म भाव कहा जाता है, जो कि दैवी विकासात्मक योजना (Evolutionary Plan) का एक अंग है.यहाँ कर्म से तात्पर्य इन्सान के नैतिक अथवा अनैतिक, अच्छे-बुरे, पाप-पुण्य आदि कर्मों से है. दूसरे शब्दों में इन कर्मों का सम्बन्ध धर्म से, भावना से तथा उनकी सही अथवा गलत प्रकृति से है न कि पैसा कमाने के निमित किए जाने वाले कर्म(रोजगार) से.

आइये जाने धन प्राप्ति/शिक्षा/रोजगार के कुछ खास/महत्वपूर्ण करक योग—

इंजीनियरिंग शिक्षा के कुछ योग –

जन्म, नवांश या चन्द्रलग्न से मंगल चतुर्थ स्थान में हो या चतुर्थेश मंगल की राशि में स्थित हो।

मंगल की चर्तुथ भाव या चतुर्थेश पर दृष्टि हो अथवा चतुर्थेश के साथ युति हो।

मंगल और बुध का पारस्परिक परिवर्तन योग हो अर्थात मंगल बुध की राशि में हो अथवा बुध मंगल की राशि में हो।

चिकित्सक (डाक्टर )शिक्षा के कुछ योग –

जैमिनि सूत्र के अनुसार चिकित्सा से सम्बन्धित कार्यो में बुध और शुक्र का विशेष महत्व हैं। ’’शुक्रन्दौ शुक्रदृष्टो रसवादी (1/2/86)’’ – यदि कारकांश में चन्द्रमा हो और उस पर शुक्र की दृष्टि हो तो रसायनशास्त्र को जानने वाला होता हैं। ’’ बुध दृष्टे भिषक ’’ (1/2/87) – यदि कारकांश में चन्द्रमा हो और उस पर बुध की दृष्टि हो तो वैद्य होता हैं।

जातक परिजात (अ.15/44) के अनुसार यदि लग्न या चन्द्र से दशम स्थान का स्वामी सूर्य के नवांश में हो तो जातक औषध या दवा से धन कमाता हैं। (अ.15/58) के अनुसार यदि चन्द्रमा से दशम में शुक्र – शनि हो तो वैद्य होता हैं।

वृहज्जातक (अ.10/2) के अनुसार लग्न, चन्द्र और सूर्य से दशम स्थान का स्वामी जिस नवांश में हो उसका स्वामी सूर्य हो तो जातक को औषध से धनप्राप्ति होती हैं। उत्तर कालामृत (अ. 5 श्लो. 6 व 18) से भी इसकी पुष्टि होती हैं।

फलदीपिका (5/2) के अनुसार सूर्य औषधि या औषधि सम्बन्धी कार्यो से आजीविका का सूचक हैं। यदि दशम भाव में हो तो जातक लक्ष्मीवान, बुद्धिमान और यशस्वी होता हैं (8/4) ज्योतिष के आधुनिक ग्रन्थों में अधिकांश ने चिकित्सा को सूर्य के अधिकार क्षेत्र में माना हैं और अन्य ग्रहों के योग से चिकित्सा – शिक्षा अथवा व्यवसाय के ग्रहयोग इस प्रकार बतलाए हैं -

सूर्य एवं गुरू — फिजीशियन

सूर्य एवं बुध   — परामर्श देने वाला फिजीशियन

सूर्य एवं मंगल — फिजीशियन

सूर्य एवं शुक्र एवं गुरू — मेटेर्निटी

सूर्य,शुक्र,मंगल, शनि—- वेनेरल

सूर्य एवं शनि  —– हड्डी/दांत सम्बन्धी

सूर्य एवंशुक्र , बुध     —- कान, नाक, गला

सूर्य एवं शुक्र $ राहु , यूरेनस —- एक्सरे

सूर्य एवं युरेनस —- शोध चिकित्सा

सूर्य एवं चन्द्र , बुध — उदर चिकित्सा, पाचनतन्त्र

सूर्य एवंचन्द्र , गुरू — हर्निया , एपेण्डिक्स

सूर्य एवं शनि (चतुर्थ कारक)  — टी0 बी0, अस्थमा

सूर्य एवं शनि (पंचम कारक) —- फिजीशियन

न्यायाधीश बनने के कुछ योग – —

यदि जन्मकुण्डली के किसी भाव में बुध-गुरू अथवा राहु-बुध की युति हो।

यदि गुरू, शुक्र एवं धनेश तीनों अपने मूल त्रिकोण अथवा उच्च राशि में केन्द्रस्थ अथवा त्रिकोणस्थ हो तथा सूर्य मंगल द्वारा दृष्ट हो तो जातक न्यायशास्त्र का ज्ञाता होता हैं।

यदि गुरू पंचमेश अथवा स्वराशि का हो और शनि व बुध द्वारा दृष्ट हो।

यदि लग्न, द्वितीय, तृतीय, नवम्, एकादश अथवा केन्द्र में वृश्चिक अथवा मकर राशि का शनि हो अथवा नवम भाव पर गुरू-चन्द्र की परस्पर दृष्टि हो।

यदि शनि से सप्तम में गुरू हो।

यदि सूर्य आत्मकारक ग्रह के साथ राशि अथवा नवमांश में हो।

यदि सप्तमेश नवम भाव में हो तथा नवमेश सप्तम भाव में हो।

यदि तृतीयेश, षष्ठेश, गुरू तथा दशम भाव – ये चारों बलवान हो।

शिक्षक के कुछ योग –

यदि चन्द्रलग्न एवं जन्मलग्न से पंचमेश बुध, गुरू तथा शुक्र के साथ लग्न चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम अथवा दशम भाव में स्थित हो।

यदि चतुर्थेश चतुर्थ भाव में हो अथवा चतुर्थ भाव पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो अथवा चतुर्थ भाव में शुभ ग्रह स्थित हो।

यदि पंचमेश स्वगृही, मित्रगृही, उच्चराशिस्थ अथवा बली होकर चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम अथवा दशम भाव में स्थित हो और दशमेश का एकादशेश से सम्बन्ध हो।

यदि पंचम भाव में सूर्य-मंगल की युति हो अथवा राहु, शनि, शुक्र में से कोई ग्रह पंचम भाव में बैठा हो और उस पर पापग्रह की दृष्टि भी हो तो जातक अंग्रेजी भाषा का विद्वान अथवा अध्यापक होता हैं।

यदि पंचमेश बुध, शुक्र से युक्त अथवा दृष्ट हो अथवा पंचमेश जिस भाव में हो उस भाव के स्वामी पर शुभग्रह की दृष्टि हो अथवा उसके दोनों ओर शुभग्रह बैठें हो।

यदि बुध पंचम भाव में अपनी स्वराशि अथवा उच्चराशि में स्थित हो।

यदि द्वितीय भाव में गुरू या उच्चस्थ सूर्य, बुध अथवा शनि हो तो जातक विद्वान एवं सुवक्ता होता हैं।

यदि बृहस्पति ग्रह चन्द्र, बुध अथवा शुक्र के साथ शुभ स्थान में स्थित होकर पंचम एवं दशम भाव से सम्बन्धित हो।

सूर्य,चन्द्र और लग्न मिथुन,कन्या या धन राशि में हो व नवम तथा पंचम भाव शुभ व बली ग्रहों से युक्त हो।

ज्योतिष शास्त्रीय ग्रन्थों में सरस्वती योग शारदा योग, कलानिधि योग, चामर योग, भास्कर योग, मत्स्य योग आदि विशिष्ट योगों का उल्लेख हैं। अगर जातक की कुण्डली में इनमे से कोई योग हो तो वह विद्वान अनेक शास्त्रों का ज्ञाता, यशस्वी एवं धनी होता है।

जानिए राशियों से जुड़े नौकरी और व्यवसाय—

  1. मेष: – पुलिस अथवा सेना की नौकरी, इंजीनियंिरंग, फौजदारी का वकील, सर्जन, ड्राइविंग, घड़ी का कार्य, रेडियो व टी.वी. का निर्माण या मरम्मत, विद्युत का सामान, कम्प्यूटर, जौहरी, अग्नि सम्बन्धी कार्य, मेकेनिक, ईंटों का भट्टा, किसी फैक्ट्री में कार्य, भवन निर्माण सामग्री, धातु व खनिज सम्बन्धी कार्य, नाई, दर्जी, बेकरी का कार्य, फायरमेन, कारपेन्टर।
  2. वृषभ: – सौन्दर्य प्रसाधन, हीरा उद्योग, शेयर ब्रोकर, बैंक कर्मचारी, नर्सरी, खेती, संगीत, नाटक, फिल्म या टी.वी. कलाकार, पेन्टर, केमिस्ट, ड्रेस डिजाइनर, कृषि अथवा राजस्व विभाग की नौकरी, महिला विभाग, सेलटेक्स या आयकर विभाग की नौकरी, ब्याज से धन कमाने का कार्य, सजावट तथा विलासिता की वस्तुओं का निर्माण अथवा व्यापार, चित्रकारी, कशीदाकारी, कलात्मक वस्तुओं सम्बन्धी कार्य, फैशन, कीमती पत्थरों या धातु का व्यापार, होटल व बर्फ सम्बन्धी कारोबार।
  3. मिथुन: – पुस्तकालय अध्यक्ष, लेखाकार, इंजीनियर, टेलिफोन आपरेटर, सेल्समेन, आढ़तिया, शेयर ब्रोकर, दलाल, सम्पादक, संवाददाता, अध्यापक, दुकानदार, रोडवेज की नौकरी, ट्यूशन से जीविका कमाने वाला, उद्योगपति, सचिव, साईकिल की दुकान, अनुवादक, स्टेशनरी की दुकान, ज्योतिष, गणितज्ञ, लिपिक का कार्य, चार्टड एकाउन्टेंट, भाषा विशेषज्ञ, लेखक, पत्रकार, प्रतिलिपिक, विज्ञापन प्रबन्धन, प्रबन्धन (मेनेजमेन्ट) सम्बन्धी कार्य, दुभाषिया, बिक्री एजेन्ट।

कर्क: – जड़ी-बूटिंयों का व्यापार, किराने का सामान, फलों के जड़ पौध सम्बन्धी कार्य, रेस्टोरेन्ट, चाय या काफी की दुकान, जल व कांच से सम्बन्धित कार्य, मधुशाला, लांड्री, नाविक, डेयरी फार्म, जीव विज्ञान, वनस्सपति विज्ञान, प्राणी विज्ञान आदि से सम्बन्धित कार्य, मधु के व्यवसाय, सुगन्धित पदार्थ व कलात्मक वस्तुओं से सम्बन्धित कार्य, सजावट की वस्तुएं, अगरबत्ती, फोटोग्राफी, अभिनय, पुरातत्व इतिहास, संग्रहालय, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता या सामाजिक संस्थाओं के कर्मचारी, अस्पताल की नौकरी, जहाज की नौकरी, मौसम विभाग, जल विभाग या जल सेना की नौकरी, जनरल मर्चेन्ट।

  1. सिंह: – पेट्रोलियम, भवन निर्माण, चिकित्सक, राजनेता, औषधि निर्माण एवं व्यापार, कृषि से उत्पादित वस्तुएं, स्टाक एक्सचेंज, कपड़ा, रूई, कागज, स्टेशनरी आदि से सम्बन्धित व्यवसाय, जमीन से प्राप्त पदार्थ, शासक, प्रसाशक, अधिकारी, वन अधिकारी, राजदूत, सेल्स मैनेजर, ऊन के गरम कपड़ों का व्यापार, फर्नीचर व लकड़ी का व्यापार, फल व मेवों का व्यापार, पायलेट, पेतृक व्यवसाय।
  2. कन्या: – अध्यापक, दुकान, सचिव, रेडियो या टी.वी. का उद्घोषक, ज्योतिष, डाक सेवा, लिपिक, बैकिंग, लेखा सम्बन्धी कार्य, स्वागतकर्ता, मैनेजर, बस ड्रायवर और संवाहक, जिल्दसाज, आशुलिपिक, अनुवादक, पुस्तकालय अध्यक्ष, कागज के व्यापारी, हस्तलेख और अंगुली के विशेषज्ञ, मनोवैज्ञानिक, अन्वेषक, सम्पादक, परीक्षक, कर अधिकारी, सैल्स मेन, शोध कार्य पत्रकारिता आदि।
  3. तुला: – न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट, परामर्शदाता, फिल्म या टी.वी. से सम्बन्ध, फोटोग्राफर, फर्नीचर की दुकान, मूल्यवान वस्तुओं का विनिमय, धन का लेन-देन, नृत्य-संगीत या चित्रकला से सम्बन्धित कार्य, साज-सज्जा, अध्यापक, बैंक क्लर्क, एजेन्सी, दलाली, विलासिता की वस्तुएं, राजनेता, जन सम्पर्क अधिकारी, फैशन मॉडल, सामाजिक कार्यकर्ता, रेस्तरां का मालिक, चाय या काफी की दुकान, मूर्तिकार, कार्टूनिस्ट, पौशाक का डिजाइनर, मेकअप सहायक, केबरे प्रदर्शन।
  4. वृश्चिक: – केमिस्ट, चिकित्सक, वकील, इंजीनियर, भवन निर्माण, टेलीफोन व बिजली का सामान, रंग, सीमेन्ट, ज्योतिषी और तांत्रिक, जासूसी का काम करने वाला, दन्त चिकित्सक, मेकेनिक, ठेकेदार, जीवन बीमा एजेन्ट, रेल या ट्रक कर्मचारी, पुलिस और सेना के कर्मचारी, टेलिफोन आपरेटर, समुद्री खाद्यान्नों के व्यापारी, गोता लगाकर मोती निकालने का काम, होटय या रेस्टोरेन्ट, चोरी या डकैती, शराब की फैक्ट्री, वर्कशाप का कार्य, कल-पुर्जो की दुकान या फैैक्ट्री, लोहे या स्टील का कार्य, तम्बाकू या सिगरेट का कार्य, नाई, मिष्ठान की दुकान, फायर बिग्रेड की नौकरी।
  5. धनु: – बैंक की नौकरी, अध्यापन, किसी धार्मिक स्थान से सम्बन्ध, ऑडिट का कार्य, कम्पनी सेकेट्री, ठेकेदार, सट्टा व्यापार, प्रकाशक, विज्ञापन से सम्बन्धित कार्य, सेल्समेन, सम्पादक, शिक्षा विभाग में कार्य, लेखन, वकालात या कानून सम्बन्धी कार्य, उपदेशक, न्यायाधीश, धर्म-सुधारक, कमीशन ऐजेन्ट, आयात-निर्यात सम्बन्धी कार्य, प्रशासनाधिकारी, पशुओं से उत्पन्न वस्तुओं का व्यापार, चमड़े या जूते के व्यापारी, घोड़ों के प्रशिक्षक, ब्याज सम्बन्धी कार्य, स्टेशनरी विक्रेता।
  6. मकर: – नेवी की नौकरी, कस्टम विभाग का कार्य, बड़ा व्यापार या उच्च पदाधिकारी, समाजसेवी, चिकित्सक, नर्स, जेलर या जेल से सम्बन्धित कार्य, संगीतकार, ट्रेवल एजेन्ट, पेट्रोल पम्प, मछली का व्यापार, मेनेजमेन्ट, बीमा विभाग, ठेकेदारी, रेडिमेड वस्त्र, प्लास्टिक, खिलौना, बागवानी, खान सम्बन्धी कार्य, सचिव, कृषक, वन अधिकारी, शिल्पकार, फैक्ट्री या मिल कारीगर, सभी प्रकार के मजदूर।
  7. कुम्भ: – शोध कार्य, शिक्षण कार्य, ज्योतिष, तांत्रिक, प्राकृतिक चिकित्सक, इंजीनियर या वैज्ञानिक, दार्शनिक, एक्स-रे कर्मचारी, चिकित्सकीय उपकरणों के विक्रेता, बिजली अथवा परमाणु शक्ति से सम्बन्धित कार्य, कम्प्यूटर, वायुयान, वैज्ञानिक, दूरदर्शन टैक्नोलोजी, कानूनी सलाहकार, मशीनरी सम्बन्धी कार्य, बीमा विभाग, ठेकेदार, लोहा, तांबा, कोयला व ईधन के विक्रेता, चौकीदार, शव पेटिका और मकबरा बनाने वाले, चमड़े की वस्तुओं का व्यापार।
  8. मीन: – लेखन, सम्पादन, अध्यापन कार्य, लिपिक, दलाली, मछली का व्यापार, कमीशन एजेन्ट, आयात-निर्यात सम्बन्धी कार्य, खाद्य पदार्थ या मिष्ठान सम्बन्धी कार्य, पशुओं से उत्पन्न वस्तुओं का व्यापार, फिल्म निर्माण, सामाजिक कार्य, संग्रहालय या पुस्तकालय का कार्य, संगीतज्ञ, यात्रा एजेन्ट, पेट्रोल और तेल के व्यापारी, समुद्री उत्पादों के व्यापारी, मनोरंजन केन्द्रों के मालिक, चित्रकार या अभिनेता, चिकित्सक, सर्जन, नर्स, जेलर और जेल के कर्मचारी, ज्योतिषी, पार्षद, वकील, प्रकाशक, रोकड़िया, तम्बाकू और किराना का व्यापारी, साहित्यकार।

 

 

हनुमान चालिसा में चालीस


हनुमान चालिसा में चालीस ही दोहे क्यों?

hanuman-chalisa

श्रीराम के परम भक्त हनुमानजी हमेशा से ही सबसे जल्दी प्रसन्न होने वाले देवताओं में से एक हैं। शास्त्रों के अनुसार माता सीता के वरदान के प्रभाव से बजरंग बली को अमर बताया गया है। ऐसा माना जाता है आज भी जहां रामचरित मानस या रामायण या सुंदरकांड का पाठ पूरी श्रद्धा एवं भक्ति से किया जाता है वहां हनुमानजी अवश्य प्रकट होते हैं।

इन्हें प्रसन्न करने के लिए बड़ी संख्या श्रद्धालु हनुमान चालीसा का पाठ भी करते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि केवल हनुमान चालीसा ही नहीं सभी देवी-देवताओं की प्रमुख स्तुतियों में चालिस ही दोहे होते हैं?

विद्वानों के अनुसार चालीसा यानि चालीस, संख्या चालीस, हमारे देवी-देवीताओं की स्तुतियों में चालीस स्तुतियां ही सम्मिलित की जाती है। जैसे श्री हनुमान चालीसा, दुर्गा चालीसा, शिव चालीसा आदि। इन स्तुतियों में चालीस दोहे ही क्यों होती है? इसका धार्मिक दृष्टिकोण है।

इन चालीस स्तुतियों में संबंधित देवता के चरित्र, शक्ति, कार्य एवं महिमा का वर्णन होता है। चालीस चौपाइयां हमारे जीवन की संपूर्णता का प्रतीक हैं, इनकी संख्या चालीस इसलिए निर्धारित की गई है क्योंकि मनुष्य जीवन 24 तत्वों से निर्मित है और संपूर्ण जीवनकाल में इसके लिए कुल 16 संस्कार निर्धारित किए गए हैं। इन दोनों का योग 40 होता है। इन 24 तत्वों में 5 ज्ञानेंद्रिय, 5 कर्मेंद्रिय, 5 महाभूत, 5 तन्मात्रा, 4 अन्त:करण शामिल है।

सोलह संस्कार इस प्रकार है-

1. गर्भाधान संस्कार

2. पुंसवन संस्कार

3. सीमन्तोन्नयन संस्कार

4. जातकर्म संस्कार

5. नामकरण संस्कार

6. निष्क्रमण संस्कार

7. अन्नप्राशन संस्कार

8. चूड़ाकर्म संस्कार

9. विद्यारम्भ संस्कार

10. कर्णवेध संस्कार

11. यज्ञोपवीत संस्कार

12. वेदारम्भ संस्कार

13. केशान्त संस्कार

14. समावर्तन संस्कार

15. पाणिग्रहण संस्कार

16. अन्त्येष्टि संस्कार

भगवान की इन स्तुतियों में हम उनसे इन तत्वों और संस्कारों का बखान तो करते ही हैं, साथ ही चालीसा स्तुति से जीवन में हुए दोषों की क्षमायाचना भी करते हैं।

इन चालीस चौपाइयों में सोलह संस्कार एवं 24 तत्वों का भी समावेश होता है। जिसकी वजह से जीवन की उत्पत्ति है।

जानें! सभी धर्म के अनुसार नव वर्ष

विक्रम संवत् 2069 यानी हिंदू नव वर्ष का प्रारंभ इस बार 23 मार्च, शुक्रवार से हो रहा है। हिंदू धर्म की तरह ही हर धर्म में नया साल मनाया जाता है। लेकिन इसका समय भिन्न-भिन्न होता है तथा तरीका भी। किसी धर्म में नाच-गाकर नए साल का स्वागत किया जाता है तो कहीं पूजा-पाठ व ईश्वर की आराधना कर। आप भी जानिए किस धर्म में नया साल कब मनाया जाता है-

हिंदू नव वर्ष

हिंदू नव वर्ष का प्रारंभ चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा (इस बार 23 मार्च) से माना जाता है। इसे हिंदू नव संवत्सर या नव संवत भी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा ने इसी दिन से सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी। इसी दिन से विक्रम संवत के नए साल का आरंभ भी होता है। इसे गुड़ी पड़वा, उगादि आदि नामों से भारत के अनेक क्षेत्रों में मनाया जाता है।

इस्लामी नव वर्ष

इस्लामी कैलेंडर के अनुसार मोहर्रम महीने की पहली तारीख को मुसलमानों का नया साल हिजरी शुरू होता है। इस्लामी या हिजरी कैलेंडर एक चंद्र कैलेंडर है, जो न सिर्फ मुस्लिम देशों में इस्तेमाल होता है बल्कि दुनियाभर के मुसलमान भी इस्लामिक धार्मिक पर्वों को मनाने का सही समय जानने के लिए इसी का इस्तेमाल करते हैं।

ईसाई नव वर्ष

ईसाई धर्मावलंबी 1 जनवरी को नव वर्ष मनाते हंै। करीब 4000 वर्ष पहले बेबीलोन में नया वर्ष 21 मार्च को मनाया जाता था जो कि वसंत के आगमन की तिथि भी मानी जाती थी । तब रोम के तानाशाह जूलियस सीजर ने ईसा पूर्व 45वें वर्ष में जब जूलियन कैलेंडर की स्थापना की, उस समय विश्व में पहली बार 1 जनवरी को नए वर्ष का उत्सव मनाया गया। तब से आज तक ईसाई धर्म के लोग इसी दिन नया साल मनाते हैं। यह सबसे ज्यादा प्रचलित नव वर्ष है।

सिंधी नव वर्ष

सिंधी नव वर्ष चेटीचंड उत्सव से शुरु होता है, जो चैत्र शुक्ल दिवतीया को मनाया जाता है। सिंधी मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान झूलेलाल का जन्म हुआ था जो वरुणदेव के अवतार थे।

सिक्ख नव वर्ष

पंजाब में नया साल वैशाखी पर्व के रूप में मनाया जाता है। जो अप्रैल में आती है। सिक्ख नानकशाही कैलेंडर के अनुसार होला मोहल्ला (होली के दूसरे दिन) नया साल होता है।

जैन नव वर्ष

ज़ैन नववर्ष दीपावली से अगले दिन होता है। भगवान महावीर स्वामी की मोक्ष प्राप्ति के अगले दिन यह शुरू होता है। इसे वीर निर्वाण संवत कहते हैं।

पारसी नव वर्ष

पारसी धर्म का नया वर्ष नवरोज के रूप में मनाया जाता है। आमतौर पर 19 अगस्त को नवरोज का उत्सव पारसी लोग मनाते हैं। लगभग 3000 वर्ष पूर्व शाह जमशेदजी ने पारसी धर्म में नवरोज मनाने की शुरुआत की। नव अर्थात् नया और रोज यानि दिन।

हिब्रू नव वर्ष

हिब्रू मान्यताओं के अनुसार भगवान द्वारा विश्व को बनाने में सात दिन लगे थे । इस सात दिन के संधान के बाद नया वर्ष मनाया जाता है । यह दिन ग्रेगरी के कैलेंडर के मुताबिक 5 सितम्बर से 5 अक्टूबर के बीच आता है।

सपनों का अद्भुत संसार, स्वप्न और उनका फल


 

यदि आपका जन्म मई में हुआ हो?

आपका जन्म किसी भी साल के मई महीने में हुआ है तो एस्ट्रोलॉजी कहती है कि आप आकर्षक और लोकप्रिय होंगे। थोड़े से लापरवाह, थोड़े से सनकी। एक बार अगर कुछ ठान लें तो उसे पाकर ही रहते हैं। मई में जन्में जातक अव्वल दर्जे के घमंडी होते हैं लेकिन इनमें त्याग करने की प्रवृत्ति भी प्रबल होती है। स्वभाव से राजसी होते हैं।

सपनों का अद्भुत संसार, स्वप्न और उनका फल

आदि काल से ही मानव मस्तिष्क अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने के प्रयत्नों में सक्रिय है। परंतु जब किसी भी कारण इसकी कुछ अधूरी इच्छाएं पूर्ण नहीं हो पाती (जो कि मस्तिष्क के किसी कोने में जाग्रत अवस्था में रहती है) तो वह स्वप्न का रूप ले लती हैं।

आधुनिक विज्ञान में पाश्चात्य विचारक सिगमंड फ्रायड ने इस विषय में कहा है कि स्वप्न” मानव की दबी हुई इच्छाओं का प्रकाशन करते हैं जिनको हमने अपनी जाग्रत अवस्था में कभी-कभी विचारा होता है। अर्थात स्वप्न हमारी वो इच्छाएं हैं जो किसी भी प्रकार के भय से जाग्रत्‌ अवस्था में पूर्ण नहीं हो पाती हैं व स्वप्नों में साकार होकर हमें मानसिक संतुष्टि व तृप्ति देती है।

सपने या स्वप्न आते क्यों है?

इस प्रश्न का कोई ठोस प्रामाणिक उत्तर आज तक खोजा नहीं जा सका है। प्रायः यह माना जाता है कि स्वप्न या सपने आने का एक कारण ÷नींद’ भी हो सकता है। विज्ञान मानता है कि नींद का हमारे मस्तिष्क में होने वाले उन परिवर्तनों से संबंध होता है, जो सीखने और याददाश्त बढ़ाने के साथ-साथ मांस पेशियों को भी आराम पहुंचाने में सहायक होते हैं। इस नींद की ही अवस्था में न्यूरॉन (मस्तिष्क की कोशिकाएं) पुनः सक्रिय हो जाती हैं।

वैज्ञानिकों ने नींद को दो भागों में बांटा है पहला भाग आर ई एम अर्थात्‌ रैपिड आई मुवमेंट है। (जिसमें अधिकतर सपने आते हैं) इसमें शरीर शिथिल परंतु आंखें तेजी से घूमती रहती हैं और मस्तिष्क जाग्रत अवस्था से भी ज्यादा गतिशील होता है। इस आर ई एम की अवधि १० से २० मिनट की होती है तथा प्रत्येक व्यक्ति एक रात में चार से छह बार आर ई एम नींद लेता है। यह स्थिति नींद आने के लगभग १.३० घंटे अर्थात ९० मिनट बाद आती है। इस आधार पर गणना करें तो रात्रि का अंतिम प्रहर आर ई एम का ही समय होता है (यदि व्यक्ति समान्यतः १० बजे रात सोता है तो ) जिससे सपनों के आने की संभावना बढ़ जाती है।

सपने बनते कैसे हैं : दिन भर विभिन्न स्रोतों से हमारे मस्तिष्क को स्फुरण (सिगनल) मिलते रहते हैं। प्राथमिकता के आधार पर हमारा मस्तिष्क हमसे पहले उधर ध्यान दिलवाता है जिसे करना अति जरूरी होता है, और जिन स्फुरण संदेशों की आवश्यकता तुरंत नहीं होती उन्हें वह अपने में दर्ज कर लेता है। इसके अलावा प्रतिदिन बहुत सी भावनाओं का भी हम पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। जो भावनाएं हम किसी कारण वश दबा लेते हैं (गुस्सा आदि) वह भी हमारे अवचेतन मस्तिष्क में दर्ज हो जाती हैं। रात को जब शरीर आराम कर रहा होता है मस्तिष्क अपना काम कर रहा होता है। (इस दौरान हमें चेतनावस्था में कोई स्कुरण संकेत भावनाएं आदि नहीं मिल रही होती) उस समय मस्तिष्क दिन भर मिले संकेतों को लेकर सक्रिय होता है जिनसे स्वप्न प्रदर्शित होते हैं। यह वह स्वप्न होते हैं जो मस्तिष्क को दिनभर मिले स्फुरण, भावनाओं को दर्शाते हैं जिन्हें दिनमें हमने किसी कारण वश रोक लिया था। जब तक यह प्रदर्शित नहीं हो पाता तब तक बार-बार नजर आता रहता है तथा इन पर नियंत्रण चाहकर भी नहीं किया जा सकता।

स्वप्न मनुष्य के लिए बड़े ही आकर्षक लुभावने और रहस्यमय होते है. डरावने और बुरे स्वप्न जहां उसे भयभीत करते है. वहीं दिलचस्प, मनोहारी और अच्छे स्वप्न उसे आत्मविभोर कर देते है.

रात्री में सुप्त अवस्था में देखे गए स्वप्नों के स्वप्न जाल में घिरा वह सारादिन एक अजीब सी खुशी का अनुभव करता है.एक अजीब सी ऊर्जा उसके भीतर प्रवाहित होतीरहती है. मनुष्य स्वभाव ही ऐसा है, जो बुरेस्वप्न के फल को भी जानना चाहता है.और अच्छे स्वप्न के फल को भी जानने के लिएउत्सुक रहता है.

आखिर स्वप्न क्या है, जो सदियों से मनुष्य को अपने शुभ अशुभ संकेतों द्वारा सचेत करता रहा है. असल मेंस्वप्न व्यक्ति के व्यक्तित्व का एक ऐसा “भाग्यसूचक” है.

जो वह सब कुछ उसको निन्द्रावस्था में बताजाता है. जो उसके जीवन में शुभ अशुभ घटने वाला होता है. ऐसी सूक्ष्म और प्रामाणिकजानकारी मनुष्य को किसी भी पद्धति से नहीं मिल सकती है.

कुछ स्वप्न बड़े ही विचित्र और आश्चर्यजनकहोते है. व्यक्ति उन्हें देख कर अवाक रह जाता है. कि वह स्वप्न में कैसे आसमान मेंउड़ रहा था. कुछ स्वप्न ऐसे भी होते है.

जो भविष्य में घटने वाली शुभ अशुभ घटनाओंका बोध कराते है. और कुछ स्वप्न बिलकुल ही मानव जीवन की सच्चाइयो से जुड़े होते है.

आप अगर रात के प्रथम पहर में कोई स्वप्न देखते हैतो उस स्वप्न का शुभ या अशुभ फल आपको साल भर में मिलने की संभावना रहती है.

 

रात केदूसरे पहर में आप कोई स्वप्न देखते है.उसका शुभ या अशुभ फल मिलने का समय आठ महीनेका होता है.

रात के तीसरे पहर में आप कोई स्वप्न देखते है तो तीन महीने में उसकाशुभ अशुभ फल मिलता है.

रात के चौथे पहर के स्वप्न के फल प्राप्ति का समय एक माह होता है. और जो स्वप्न सुबह भोर काल में देखे जाते है उसका फल शीघ्र ही आपको मिलजाता है.

दिन निकलने के बाद देखे जाने वाले स्वप्नों का फल आधे माह के भीतर ही मिलजाते है. जीवनमें बहुत प्रकार के स्वप्न दिखाई देते है और विभिन्न विषयों पर स्वप्न दृश्यमानहोते है,

उन सभी चयन करना असंभव है फिर भी अधिकतर स्वप्न का फल बताने का प्रयासकिया जा रहा है जो कि शब्दों के क्रमवार से लिखने का प्रयास कर रहा हूँ…..

स्वप्न मनुष्य के लिए बड़े ही आकर्षकलुभावने और रहस्यमय होते है. डरावने और बुरे स्वप्न जहां उसे भयभीत करते है. वहींदिलचस्प, मनोहारी और अच्छे स्वप्न उसे आत्मविभोर करदेते है.

रात्री में सुप्त अवस्थामें देखे गए स्वप्नों के स्वप्न जाल में घिरा वह सारा दिन एक अजीब सी खुशी काअनुभव करता है.एक अजीब सी ऊर्जा उसके भीतर प्रवाहित होती रहती है. मनुष्य स्वभावही ऐसा है, जो बुरे स्वप्न के फल को भी जानना चाहताहै.और अच्छे स्वप्न के फल को भी जानने के लिए उत्सुक रहता है.

आखिर स्वप्न क्या है, जो सदियों सेमनुष्य को अपने शुभ अशुभ संकेतों द्वारा सचेत करता रहा है. असल में स्वप्न व्यक्तिके व्यक्तित्व का एक ऐसा “भाग्य सूचक” है.

जो वह सब कुछ उसको निन्द्रावस्था में बताजाता है. जो उसके जीवन में शुभ अशुभ घटने वाला होता है. ऐसी सूक्ष्म और प्रामाणिकजानकारी मनुष्य को किसी भी पद्धति से नहीं मिल सकती है.

कुछ स्वप्न बड़े ही विचित्र औरआश्चर्यजनक होते है. व्यक्ति उन्हें देख कर अवाक रह जाता है. कि वह स्वप्न मेंकैसे आसमान में उड़ रहा था. कुछ स्वप्न ऐसे भी होते है.

जो भविष्य में घटने वाली शुभ अशुभघटनाओं का बोध कराते है. और कुछ स्वप्न बिलकुल ही मानव जीवन की सच्चाइयो से जुड़े होते है.

हमारे प्राचीनकाल के ग्रंथों में स्वप्न विज्ञान को काफी महत्व दिया गया है। स्वप्न परमात्मा की ओर से होने वाली घटनाओं के पूर्व संकेत होते हैं। स्वप्न का प्रभाव निश्चित रूप से हर मनुष्य पर पड़ता है।

यदि कोई अच्छा-सा स्वप्न दिखाई दे तो हम खुश होते हैं, किंतु बुरा दिखाई दे तो घबराकर तुरंत ज्योतिषियों के पास पहुँच जाते हैं। स्वप्न तो छोटे-छोटे निरीह बालकों को भी नहीं छोड़ते हैं। वे नींद में कभी हँसते हैं और कभी डर से रोने लगते हैं।

हमारे प्राचीनकाल के ग्रंथों में स्वप्न विज्ञान को काफी महत्व दिया गया है। स्वप्न परमात्मा की ओर से होने वाली घटनाओं के पूर्व संकेत होते हैं। स्वप्न का प्रभाव निश्चित रूप से हर मनुष्य पर पड़ता है।

यदि कोई अच्छा-सा स्वप्न दिखाई दे तो हम खुश होते हैं, किंतु बुरा दिखाई दे तो घबराकर तुरंत ज्योतिषियों के पास पहुँच जाते हैं। स्वप्न तो छोटे-छोटे निरीह बालकों को भी नहीं छोड़ते हैं। वे नींद में कभी हँसते हैं और कभी डर से रोने लगते हैं।

इन्सान मे यह गुण है कि वह सपनों को सजाता रहता है या यूँ कहे कि भीतर उठने वाली हमारी भावनाएं ही सपनो का रूप धारण कर लेती हैं। इन उठती भावनाओं पर किसी का नियंत्रण नही होता। हम लाख चाहे,लेकिन जब भी कोई परिस्थिति या समस्या हमारे समक्ष खड़ी होती है,हमारे भीतर भावनाओं का जन्म होनें लगता है। ठीक उसी तरह जैसे कोई झीळ के ठहरे पानी में पत्थर फैंकता है तो पानी के गोल-गोल दायरे बननें लगते हैं। यह दायरे प्रत्येक इन्सान में उस के स्वाभावानुसार होते हैं। इन्हीं दायरों को पकड़ कर हम सभी सपने बुननें लगते हैं। यह हमारी आखरी साँस तक ऐसे ही चलता रहता है।

इसी लिए हम सभी सपने दॆखते हैं।शायद ही ऐसा कोई इंसान हो जिसे रात को सोने के बाद सपनें ना आते होगें। जो लोग यह कहते हैं कि उन्हें सपनें नही आते, या तो वह झूठ बोल रहे होते हैं या फिर उन्हें सुबह उठने के बाद सपना भूल जाता होगा। हो सकता है उन की यादाश्त कमजोर हो। या फिर उनकी नीदं बहुत गहरी होती होगी। जैसे छोटे बच्चों की होती है। उन्हें आप सोते समय अकसर हँसता- रोता हुआ देखते रहे होगें , ऐसी गहरी नीदं मे सोनें वाले भी सपनों को भूल जाते हैं और दावा करते हैं कि उन्हें सपनें नही आते। लेकिन सपनों का दिखना एक स्वाभाविक घटना है। इस लिए यह सभी को आते हैं।

निद्रा और स्वप्न का चोली-दामन का संबंध है। नींद के बिना सपने नहीं आते हैं। यह धारणा गलत है कि गहरी नींद में सपने नहीं आते हैं। गहरी नींद में भी सपने आते हैं, अलबत्ता कुछ लोगों को ऐसे सपने याद नहीं रहते। सपना सभी देखते हैं कुछ वर्ष पहले यह बात समाचार-पत्रों में आई कि पाश्चात्य शोध ने सिद्ध कर दिया है कि मनुष्य ही नहीं, पशु भी सपने देखते हैं। यह तथ्य हमारे चिंतकों ने सदियों पहले बताया था।

प्रश्नोपनिषद के पांचवें श्लोक में यह स्पष्ट है कि सभी प्राणी स्वप्न देखते हैं। सर्वपश्यतिसर्व:पश्यति मान्यता है कि उपनिषदों का समय लगभग 6 हजार वर्ष पहले का है। दरअसल, मनुष्य या किसी भी प्राणी में शरीर, मन और आत्मा की प्रधानता होती है। मुख्य रूप से स्वप्न मन के विषय हैं। यही कारण है कि मनोविज्ञान विषय के अन्तर्गत उसका अध्ययन किया जाता है। उपनिषद कहते हैं-अत्रैषदेव:स्वप्नेमहिमानमनुभवति।

स्वप्न अक्सर सही होते हैं, कभी-कभी ही यह सच नहीं होता। स्वप्न संबंधी किंवदंतियां लोगों के अनुभवों पर आधारित होती हैं। इसलिए उन्हें अंधविश्वास कह कर गलत नहीं ठहराया जा सकता है।

क्या है अर्थ?

स्वप्न देखने के बाद हम उसका कुछ न कुछ अर्थ लगाते हैं। इसके आधार पर स्वप्नों के कुछ प्रकार हैं-निरर्थक सार्थक, भविष्यसूचक,शुभफलदायी,अशुभफलदायी,दैवी, आवश्यकता-पूर्ति-कारक, आनंद देने वाला, भय दर्शाने वाला इत्यादि। निरर्थक स्वप्न ऐसे होते हैं, जो मन के भटकावसे उत्पन्न होते हैं। जागने पर प्राय: हम उसे भूल जाते हैं। जो स्वप्न हमें याद रहते हैं, वे सार्थक कहलाते हैं। ये स्वप्न शुभ फलदायी,अशुभ फलदायी या भविष्य सूचक भी हो सकते हैं। छत्रपति शिवाजी की इष्ट देवी तुलजा भवानी थीं। स्थानीय लोग मानते हैं कि उन्होंने स्वप्न में प्रकट होकर शिवाजी से बीजापुरके सेनापति अफजल से युद्ध करने का आदेश दिया था। जनश्रुतियोंके अनुसार, स्वयं शिव और पार्वती तुलसीदास के स्वप्न में आए। उन दोनों ने उन्हें रामचरितमानस लोक भाषा में लिखने का आदेश दिया।

गोस्वामी के शब्दों में —–

सपनेहुंसाथिमोपर, जो हर गौरी पसाउ।

तेफुट होइजो कहहीं, सब भाषा मनितिप्रभाउ।

लोक-भाषा अवधि में लिखा गया रामचरितमानस और तुलसी दोनों अमर हो गए।

इंटरप्रिटेशन ऑफ ड्रीम्स:—— पाश्चात्य चिंतकों ने भी सपनों का विश्लेषण किया है। इनमें फ्रॉयडका नाम उल्लेखनीय है। उनका इंटरप्रिटेशन ऑफ ड्रीम्स बहुत लोकप्रिय हुआ। फ्रॉयडके अनुसार, हम अपनी नींद को तीन अवस्था में बांट सकते हैं-चेतन (कॉन्शस), अचेत (अनकॉन्शस), अर्द्धचेतन (सब कॉन्शस)।अर्द्धचेतन अवस्था में ही हम स्वप्न देखते हैं। उनके अनुसार, स्वप्न में हम सभी उन्हीं इच्छाओं को पूरी होते हुए देखते हैं, जिसे हम अपने मन में दबाए रखते हैं। यह इच्छा किसी लक्ष्य को पाने, यहां तक कि हमारी दमित काम भावना भी हो सकती है। फ्रॉयडका कहना था कि हमें उन स्वप्नों को सच मानने के बजाय उनका विश्लेषण करना चाहिए।स्वप्न के आधार पर फलकथन करने में ज्योतिषियों को आसानी होती है। सपनों में कुछ भी कर सकने की आजादी होती है। चाहे तो मछली को सड़क पर दौड़ा दें या गरूड़ को पानी में तैरते हुए देखें। जब मनुष्य गहरी नींद में होता है तो उसका इलेक्ट्रो एनसेफलोग्राफ (ईईजी) अल्फा तरंगों को स्थिर गति में दिखाता है, जिसमें सामान्य श्वास, नाड़ी धीमी और शरीर का तापमान कम हो जाता है। परंतु स्वप्न अवस्था में गतिशीलता बढ़ जाती है।

 

हमारे प्राचीनकाल के ग्रंथों में स्वप्न विज्ञान को काफी महत्व दिया गया है। स्वप्न परमात्मा की ओर से होने वाली घटनाओं के पूर्व संकेत होते हैं। स्वप्न का प्रभाव निश्चित रूप से हर मनुष्य पर पड़ता है। यदि कोई अच्छा-सा स्वप्न दिखाई दे तो हम खुश होते हैं।

शब्द बहुत छोटा है स्वप्न। भौतिक और जगत के अध्यात्म का समन्वय ही स्वप्न है। भौतिक अर्थात जो कुछ आंखों से दिख रहा है, इंद्रियां जिसे अनुभव कर रही हैं और दूसरा आध्यात्मिक अर्थात जो हमें खुली आंखों और स्पर्श से नहीं अनुभूत हो रहा। ये दोनों अवस्थाएं जीवन के दो पहलू हैं। दोनों सत्य है। एक बार एक लकड़हारा रात में सोते समय सपने देखने लगा कि वह बहुत अमीर हो गया है। नींद खुलने पर बहुत प्रसन्न हुआ। उसकी पत्नी रूखा सूखा भोजन देने आई तो वह बोला कि अब हम अमीर हैं, ऐसा खाना नहीं खाता हूं। पत्नी समझ गई कि उसका पति कोई निकृष्ट स्वप्न देख कर जगा है। शाम तक उसने उसे कुछ नहीं दिया जब लकड़हारा भूख से व्याकुल हुआ तो उसे सपने के सत्य-असत्य का ज्ञान हुआ और पुनः वह अपनी वास्तविक स्थिति पर लौट आया। अब प्रश्न यह उठता है कि स्वप्न, सत्य-असत्य कैसे है? कुछ क्षण के लिए सत्य का भान कराता है बाद में असत्य हो जाता है, कभी सत्य हो जाता है।

 

ऋषि, महर्षि, आचार्यों ने इस भूमि पर रह कर संसार को असत्य अर्थात स्वप्निल कहा है, स्वप्न के समान। गृहस्थ भी समाज देश में रह कर अपना स्थान मात्र स्मारक, फोटो फ्रेम तक सीमित मान लें, तो यह आध्यात्मिक सत्य है। ईश्वर को देखा नहीं गया है, लेकिन विश्व का हर देश, समाज, संप्रदाय किसी न किसी रूप में इसे स्वीकारता है। अतः यह पूर्ण सत्य है। जगत का सत्य अर्थात स्वप्निल संसार से सपनों का अर्थ निकालने में इसे ÷भ्रम’ कहा जा सकता है। ÷भ्रम’ इस अर्थ में कि अभी इस पर बहुत कुछ आधुनिक विज्ञान से पाने की संभावना बनती है।

 

हर मनुष्य की दो अवस्थाएं होती हैं, पहला जाग्रत या अनिंद्रित, दूसरी पूर्ण निंद्रा में अर्थात सुषुप्त। इसमें पुनः दो बार संधि काल आता है पहला जब सोने जाते हैं -पूर्ण निंद्रा में जाने से पहले और दूसरा, सोकर उठने से कुछ काल पहले का समय होता है। जाग्रत और पूर्ण निद्रावस्था के बीच के समय प्रायः स्वप्न आते हैं। एक विचार से नींद में दिखने वाला सब कुछ असत्य होता है, तो दूसरी विचारधारा में स्वप्न, पूर्व का घटित सत्य होता है। आगे इस पर विचार करेंगे कि प्रायः दिखने वाले स्वप्नों के क्या कारण हो सकते हैं ? भौतिक शरीर नहीं रहने पर, मन बुद्धि और मस्तिष्क के विचारों का, क्या शव के साथ दहन-दफन हो जाता है? कदापि किसी भी उर्जा का क्षय नहीं होता, रूपांतरण होता है। यह सर्वसत्य तथा वैज्ञानिक, मनीषियों की विवेचना है। जन्म-जन्मांतर में ये संस्कारिक रूप में आते हैं। वैसे सुषुप्त अवस्था में, मन बुद्धि और मस्तिष्क का ज्ञान भंडारपूर्ण सुषुप्त नहीं होता। निद्रा देवी अर्थात नींद कैसे आती है और कहां चली जाती है। इसे कौन नियंत्रित करता है ? वह ÷मन’ है। शांत भाव से सोचते हैं कि सोना है और धीरे धीरे सो जाते हैं। अगर मन में यह बात बैठी है कि प्रातःकाल अमुक समय उठना है तो नींद गायब भी, समय पर हो जाती है। जैसे बंद मोबाइल, कंप्यूटर जब भी चालू करेंगे, वह समय ठीक ही बताएगा। अर्थात उसमें कुछ बंद अवस्था में भी चल रहा है। मानव शरीर एक विलक्षण यंत्र है इसमें वैदिक ज्ञान से लेकर अकल्पनीय कार्य क्षमता का समावेश है। भगवान की इस रचना के लिए श्रीगीता का एक श्लोक है – न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्‌।

कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥

 

 

श्रीगीता के इस श्लोक का यह भाव है कि सुषुप्त अवस्था में भी मन द्वारा मस्तिष्क के संचित ज्ञान भंडार से कुछ न कुछ कार्य होता रहता है। सुषुप्त अवस्था में भी क्षण मात्र को कोई भी प्राकृतिक गुण-धर्म से अलग नहीं होता। प्रथम प्रकृति ही ईश्वर है। वह सदा साथ रहता है, मानव शरीर से शीर्ष पर, अर्थात सबसे ऊपर जो हमारा मस्तिष्क है। दिमाग की थोड़ी सी चूक उसे प्रगति से दूर्गति तक पहुंचा देती है। मस्तिष्क का संचालक ÷मन’ है, हमारी सोच है। कल्याणकारी सोच अच्छे सपनों को जन्म देती है, निकृष्ट सोच सदा बुरे सपनों को संजोता है। मनोवैज्ञानिक भी यही कहते हैं कि स्वप्न मन की उपज है।

 

मनुष्य मस्तिष्क में असंख्य तंतुओं का जाल या संग्रहालय है। जागृत अवस्था में मन से उसे संचालन करते हैं फिर भी बहुत से मस्तिष्क रूपी कंप्यूटर खोलने और बंद करने में दिन भर की बाधाएं आती रहती हैं। मस्तिष्क की व्यवस्था जब विधिवत्‌ बंद नहीं होती तो दिमाग बोझिल होकर निंद्रा में, कार्य करने पर स्वप्नों का निर्माण करता है। जब जगते हैं तो उनका अपुष्ट स्वरूप ध्यान आता है, फिर विचार करते हैं कि यह शुभ फल देगा या अशुभ। स्वप्न का अर्थ हमेशा निरर्थक नहीं होता, क्योंकि पूर्वजन्म की मनोदशा और ज्ञान संस्कार पुनः आगे के जन्मों में परिलक्षित होते हैं। बाह्य चेतना जन्य बोध, वर्तमान चेतना के बोध को भले ही अस्वीकार करे, लेकिन सच्चा ज्ञान एवं घटित कार्य कलाप अंतरात्मा में निहित होते हैं। मन से मस्तिष्क के ज्ञान का उदय, दिवा या रात्रि स्वप्न होते हैं।

 

बार-बार एक ही तरह के स्वप्न को देखने वाले कई लोग एक ही प्रकार की उपलब्धि पाते हैं तो स्वप्न विचारक मनीषी इसे तालिका के रूप में प्रस्तुत करते हैं। बहुत ही प्राचीन काल से यह धारणा चली आ रही है और प्रायः यह सत्य के करीब है। स्वर्ण, आभूषण, रत्न आदि की प्राप्ति का स्वप्न, आने वाले समय में इसका क्षय दर्शाते हैं। वैसे ही मल मूत्र और अशुद्धियों से युक्त वातावरण के सपने से सम्मान पाना तथा शुभ वातावरण में समय व्यतीत होना लिखा है। लेकिन मरे हुए पशु और सूखे ताल का दृश्य इसका विपरीत बोध नहीं कराता, बल्कि आने वाले समय में विभिषीका को दर्शाता है। स्वप्न में सूर्य, चंद्र, मंदिर और भगवान स्वरूपों के दर्शन अति शुभ लिखे गए हैं। ऐसी तालिकाएं प्रायः पंचांगों में विद्वान ज्योतिषाचार्यों ने दे रखी हैं। ज्योतिषीय विवेचना में चंद्र को मन का कारक कहा गया है। अतः मन ही सपनों का जनक कहा जा सकता है। जिस जातक के लग्न में कमजोर ग्रह, दूषित चंद्र या दृष्टिगत शत्रु ग्रह होते हैं, वे जातक आसन के कमजोर माने जाते हैं। ऐसे लोगों को स्वप्न ज्यादा दिखते हैं तथा नजर दोष, डर, भय के ज्यादा शिकार होते हैं। मनोवैज्ञानिक भी इसके उपचार में यथासाध्य दिमागी रोग का इलाज करते हैं। ज्योतिष संभावनाओं और पूर्व सूचनाओं का संपूर्ण विज्ञान है। दिवा स्वप्न हो या रात्रि स्वप्न, डरावने सपने हों या निरर्थक स्वप्न, इन सबों से छूटकारा पाने का एक मंत्र, जो प्रख्यात आचार्यों द्वारा प्रतिपादित है यहां दिया जा रहा है -

मंगलम्‌ भगवान विष्णु मंगलम्‌ गरुड़ोध्वजः।

मंगलम्‌ पुण्डरीकाक्ष मंगलायस्तनोहरिः।

यः स्मरेत्‌ पुण्डिरीकाक्षं सः बाह्याभ्यन्तरः शुचिः’॥

बुरे सपनों को दूर करने हेतु जातक या उसके माता पिता को श्रद्धा से पूजा-पाठ के समय इसका जप करना चाहिए। नियमित रूप से इष्ट/गुरु के सम्मुख इस मंत्र की प्रार्थना का प्रभाव देखा जा सकता है। कुछ ही दिनों में भय उत्पन्न करने वाले एवं निकृष्ट सपनों का निश्चित परिमार्जन होता देखा गया है। साथ ही साथ आनेवाले समय में देवी-देवताओं की आकृतियों का आभास होने लगता है। आंखें बंद कर पूजा करने वाले भी देवताओं की आकृति का स्मरण करते हैं, वैसे ही स्वप्नों में भी इनकी आकृति अतिशुभ है। जीवन के होते हुए भी मृत्यु सत्य है, वैसे ही जगत के स्वप्निल होते हुए भी स्वप्न का अस्तित्व है, चाहे वे इस जीवन के हों या जन्म जन्मांतरण के। अंतरात्मा का ज्ञान एक मूर्त सत्य है, यह पूर्ण श्रद्धा उदित करती है और यही इसका आधार है।

 

साँस तेज, नाड़ी तेज और तापमान भी अधिक रहता है। यह अवस्था प्रायः रात में 4-5 बार आती है। इस अवस्था में शरीर के अंग गतिमान होते हैं। नाड़ी बढ़ी हुई और मस्तिष्क जागृति वाली स्थिति का प्रकार दर्शाता है।

 

सपने देखना मानव जीवन की एक आवश्यक आवश्यकता है। सपने देखने में कमी होने का मतलब है आप में प्रोटीन की कमी है या फिर आप पर्सनॉलिटी डिसऑर्डर के शिकार हैं।

 

—–साँप- भारतीय परंपरा में मदमस्त साँप को देखने का अर्थ है, कुंडली का जागृत होना तथा आंतरिक प्रेरणा एवं बाहरी सजग दृष्टिकोण के बीच संघर्ष के रहते सपनों में हिलते सर्प दिखाई देते हैं।

—– पक्षी- पक्षी आत्मा या वासनाओं से मुक्ति का प्रतीक होता है। स्वप्न में पक्षी किस अवस्था में दिखता है उसी से आत्मा की स्थिति का अनुमान लगाया जाता है।

—– उड़ना- यह आत्मविश्वास या स्वतंत्रता एवं मोक्ष का दर्शन है। आधुनिक विचारधारा इसे असाधारण क्षमता के प्रतीक के रूप में देखती है।

—-घोड़े- घोड़े का दिखना स्वस्थ होने का सूचक है। यह परोक्ष दर्शन की क्षमता सुझाता है। कुछ लोग इसका संबंध प्रजनन से जोड़ते हैं।

 

कुछ स्वप्न और उनका प्रभाव—–

—– यदि स्वप्न में व्यक्ति खुद को पर्वत पर चढ़ता पाए, तो उसे एक दिन सफलता निश्चित मिलती है।

——- उल्लू दिखाई दे, तो यह रोग अथवा शोक का सूचक माना जाता है।

यदि कोई बुरा स्वप्न दिखाई दे, तो नींद खुलते ही गायत्री मंत्र पढ़कर पानी पी लेना चाहिए। उसी समय हनुमान चालीसा का पाठ अवश्य करना चाहिए और फिर नहीं सोना चाहिए।

————– कबूतर दिखाई दे तो यह शुभ समाचार का सूचक है।

—– व्यक्ति खुद को रोटी बनाता देखे, तो यह रोग का सूचक है।

—- भंडारा कराते देखने पर व्यक्ति का जीवन धनधान्य से पूर्ण रहेगा।

—– दिन में दिखे स्वप्न निष्फल होते हैं।

—— सपनों में मनुष्य की रुचि हमेशा से ही है। हमारे वेदों-पुराणों में भी सपनों के बारे में जिक्र किया गया है। यदि कोई बुरा स्वप्न दिखाई दे, तो नींद खुलते ही गायत्री मंत्र पढ़कर पानी पी लेना चाहिए। उसी समय हनुमान चालीसा का पाठ अवश्य करना चाहिए और फिर नहीं सोना चाहिए।

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शुभाशुभ स्वप्नों के पुराणोक्त फल—-

 

जागृतावस्था में देखे, सुने एवं अनुभूत प्रसंगों की पुनरावृत्ति, सुषुप्तावस्था में मनुष्य को किसी न किसी रूप में एवं कभी-कभी बिना किसी तारतम्य के, शुभ और अशुभ स्वप्न के रूप में, दिग्दर्शित होती है, जिससे स्वप्न दृष्टा स्वप्न में ही आह्‌लादित, भयभीत और विस्मित होता है।

ज्ञानिक, या चिकित्सकीय दृष्टि से मानसिक उद्विग्नता, पाचन विकार, थकान, चिंता एवं आह्‌लाद के आधिक्य पर भी स्वप्न आधारित होते हैं। बहरहाल, शुभ स्वप्नों से शुभ कार्यों के अधिकाधिक प्रयास से कार्यसिद्धि में संलग्न होने का संकेत मिलता है और अशुभ स्वप्नों में आगामी संभावित दुखद स्थिति के प्रति सचेत रहने की नसीहत लेना विद्वानों द्वारा श्रेयष्कर बताया गया है। तदनुसार -

 

लक्षण स्वप्न शुभाशुभ, कह्यो, मत्स्य भगवान।

शुभ प्रयासरत, अशुभ से होंहि सचेत सुजान॥

 

श्री मत्स्य पुराण के २४२ वें अध्याय में बताया गया है कि सतयुग में जब भगवान अनंत जगदीश्वर ने मत्स्यावतार लिया था, तो मनु महाराज ने उनसे मनुष्य द्वारा देखे गये शुभाशुभ स्वप्न फल का वृत्तांत बताने का आग्रह किया था।

 

मनु महराज ने, अपनी जिज्ञासा शांत करने हेतु, मत्स्य भगवान से पूछा कि हे भगवान! यात्रा, या अनुष्ठान के पूर्व, या वैसे भी सामान्यतया जो अनेक प्रकार के स्वप्न मनुष्य को समय-समय पर दिखायी देते हैं, उनके शुभाशुभ फल क्या होते हैं, बताने की कृपा करें, यथा-

 

स्वप्नाख्यानं कथं देव गमने प्रत्युपस्थिते। दृश्यंते विविधाकाराः कशं तेषां फलं भवेत्‌॥

मत्स्य भगवान ने स्वप्नों के फलीभूत होने की अवधि के विषय में बताते हुये कहा :

कल्कस्नानं तिलैर्होमो ब्राह्मणानां च पूजनम्‌। स्तुतिश्च वासुदेवस्य तथा तस्यैव पूजनम्‌॥६॥

नागेंद्रमोक्षश्रवणं ज्ञेयं दुःस्वप्नाशनम्‌। स्वप्नास्तु प्रथमे यामे संवस्तरविपाकिनः॥७॥

षड्भिर्भासैर्द्वितीये तु त्रिभिर्मासैस्तृतीयके। चतुर्थे मासमात्रेण पश्यतो नात्र संशयः॥८॥

अरुणोदयवेलायां दशाहेन फलं भवेत्‌। एकस्यां यदि वा रात्रौशुभंवा यदि वाशुभम्‌॥९।

पश्र्चाद् दृषृस्तु यस्तत्र तस्य पाकं विनिर्दिशेत्‌। तस्माच्छोभनके स्वप्ने पश्र्चात्‌ स्वप्नोनशस्यते॥२०॥

 

अर्थात, रात्रि के प्रथम प्रहर में देखे गये स्वप्न का फल एक संवत्सर में अवश्य मिलता है। दूसरे प्रहर में देखे गये स्वप्न का फल ६ माह में प्राप्त होता है। तीसरे पहर में देखे गये स्वप्न का फल ३ माह में प्राप्त होता है। चौथे पहर में जो स्वप्न दिखायी देता है, उसका फल 1 माह में निश्चित ही प्राप्त होता है। अरुणोदय, अर्थात सूर्योदय की बेला में देखे गये स्वप्न का फल १० दिन में प्राप्त होता है। यदि एक ही रात में शुभ स्वप्न और दुःस्वप्न दोनों ही देखे जाएं, तो उनमें बाद वाला स्वप्न ही फलदायी माना जाना चाहिए, अर्थात्‌ बाद वाले स्वप्न फल के आधार पर मार्गदर्शन करना चाहिए। क्योंकि बाद वाला स्वप्न फलीभूत होता है, अतः यदि रात्रि में शुभ स्वप्न दिखायी दे, तो उसके बाद सोना नहीं चाहिए।

 

शैलप्रासादनागाश्र्ववृषभारोहणं हितम्‌। द्रुमाणां श्वेतपुष्पाणां गमने च तथा द्विज॥२॥

द्रुमतृणारवो नाभौ तथैव बहुबाहुता। तथैव बहुशीर्षत्वं फलितोद्भव एवं च॥२२॥

सुशुक्लमाल्यधारित्वं सुशुक्लांबरधारिता। चंद्रार्कताराग्रहणं परिमार्जनमेव च॥२३॥

सक्रध्वजालिंग्नं च तदुच्छ्रायक्रिया तथा। भूंयंबुधीनां ग्रसनं शत्रुणां च वधक्रिया॥२४॥

 

अर्थात, शुभ स्वप्नों के फल बताते हुए श्री मत्स्य भगवान ने मनु महाराज को बताया कि पर्वत, राजप्रासाद, हाथी, घोड़ा, बैल आदि पर आरोहण हितकारी होता है तथा जिन वृक्षों के पुष्प श्वेत, या शुभ हों, उनपर चढ़ना शुभकारी है। नाभि में वृक्ष एवं घास-फूस उगना तथा अपने शरीर में बहुत सी भुजाएं देखना, या अनेक शिर, या मस्तक देखना, फलों को दान करते देखना, उद्भिजों के दर्शन, सुंदर, शुभ अर्थात्‌ श्वेत माला धारण करना, श्वेत वस्त्र पहनना, चंद्रमा, सूर्य और ताराओं को हाथ से पकड़ना, या उनके परिमार्जन का स्वप्न दिखायी देना, इंद्र धनुष को हृदय से लगाना, या उसे ऊपर उठाने का स्वप्न दिखायी देना और पृथ्वी, या समुद्र को निगल लेना एवं शत्रुओं का वध करना, ऐसे स्वप्न देखना सर्वथा शुभ होता है। इसके अतिरिक्त भी जो स्वप्न शुभ होते हैं, वे निम्न हैं :

जयो विवादे द्यूते व संग्रामे च तथा द्विज। भक्षणं चार्द्रमांसानां मत्स्यानां पायसस्य च॥२५॥

दर्शनं रुधिरस्यापि स्नानं वा रुधिरेण च। सुरारुधिरमद्यानां पानं क्षीरस्य चाथ वा॥२६॥

अन्त्रैर्वा वेषृनं भूमौ निर्मलं गगनं तथा। मुखेन दोहनं शस्तं महिषीणां तथा गवाम्‌॥२७॥

सिंहीनां हस्तिनीनां च वडवानां तथैव च। प्रसादो देवविप्रेभ्यो गुरुभ्यश्र्च तथा शुभः॥२८॥

मत्स्य भगवान ने, मनु महाराज से उक्त तारतम्य में स्वप्नों के शुभ फलों की चर्चा करते हुए, बताया कि स्वप्न में संग्राम, वाद-विवाद में विजय, जुए के खेल में जीतना, कच्चा मांस खाना, मछली खाना, खून दिखाई देना, या रुधिर से नहाते हुए दिखाई देना, सुरापान, रक्तपान, अथवा दुग्धपान, अपनी आंतों से पृथ्वी को बांधते हुए देखना, निर्मल नभ देखना, भैंस, गाय, सिंहनी, हथिनी, या घोड़ी के थन में मुंह लगा कर दूध पीना, देवता, गुरु और ब्राह्मण को प्रसन्न देखना सभी शुभ फलदायी एवं शुभ सूचक होते हैं। मत्स्य भगवान ने और भी शुभ स्वप्नों की चर्चा करते हुए मनु महाराज को बताया :

अंभसा त्वभिषेकस्तु गवां श्रृग्सुतेन वा। चंद्राद् भ्रष्टेना वाराज४ाशेयोसज्यप्रदो हि सः॥२९॥

राज्याभिषेकश्र्च तथा छेदनं शिरसस्तथा। मरणं चह्निदाहश्र्च वह्निदाहो गृहादिषु॥३०।

लब्धिश्र्च राज्यलिग्नां तंत्रीवाद्याभिवादनम्‌। तथोदकानां तरणं तथा विषमलड़घनम्‌॥३१॥

हस्तिनीवडवानां च गवां च प्रसवों गृहे। आरोहणमथाश्र्वानां रोदनं च तथा शुभम्‌॥३२।

वरस्रीणां तथा लाभस्तथालिग्नमेव च। निगडैर्बंधनं धन्यं तथा विष्ठानुलेपनम्‌॥३२॥

जीवतां भूमिपालानां सुह्‌दामपि दर्शनम्‌। दर्शनं देवतानां च विमलानां तथांभसाम्‌॥३४॥

शुभांयथैतानि नरस्तु हष्ट्वा प्राप्नोत्ययत्वाद् ध्रुवमर्थलाभम्‌।

स्वप्नानि वै धर्मभृतां वरिष्ठ व्याधेर्विमोक्षं च तथातुरोऽपि॥३५॥

और भी अधिक शुभ स्वप्नों के फल मनु महाराज को बताते हुए श्री मत्स्य भगवान ने कहा कि राजन ! गौवों के सींग से स्रवित जल, या चंद्रमा से गिरते हुए जल से स्नान का स्वप्न सर्वथा शुभ एवं राज्य की प्राप्ति कराने वाला होता है। राज्यारोहण का स्वप्न, मस्तक कटने का स्वप्न, अपनी मृत्यु, प्रज्ज्वलित अग्नि देखना, घर में लगी आग का स्वप्न देखना, राज्य चिह्नों की प्राप्ति, वीणा वादन, या श्रवण, जल में तैरना, दुरूह स्थानों को पार करना, घर में हस्तिनी, घोड़ी तथा गौ का प्रसव देखना, घोड़े की सवारी करते देखना, स्वयं को रोते देखना आदि स्वप्न शुभ और मंगल शकुन के द्योतक होते हैं। इसके अतिरिक्त सुंदरियों की प्राप्ति तथा उनका आलिंगन, जंजीर में स्वयं को बंधा देखना, शरीर में मल का लेप देखना, जो राजा मौजूद हैं, उन्हें स्वप्न में देखना, मित्रों को स्वप्न में देखना, देवताओं का दर्शन, निर्मल जल देखने के स्वप्न भी सर्वथा शुभकारी होते हैं, जिससे बिना प्रयास के धन-ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है तथा रुग्ण व्यक्ति रोगमुक्त हो जाता है। अशुभ स्वप्नों एवं उनके फलों के विषय में श्री मत्स्य भगवान मनु महाराज को बताते हुए कहते हैं :

इदानीं कथयिष्यामि निमित्तं स्वप्नदर्शने। नाभिं विनान्यगात्रेषु तृणवृक्षसमुरवः॥२।

चूर्णनं मूध्निं कांस्यानां मुण्डनं नग्नता तथा। मलिनांबरधारित्त्वमभ्यग्ः पटदिग्धता॥३॥

उच्चात्‌ प्रपतनं चैव दोलारोहणमेव च। अर्जनं पटलोहानां हयानामपि मारणम्‌॥४॥

रक्तपुष्पद्रुमाणां च मंडलस्य तथैव च। वराहर्क्षखरोष्ट्राणां तथा चारोहणक्रिया॥५॥

भक्षणं पक्षिमत्स्यानां तैलस्य कृसरस्य च। नर्तनं हसनं चैव विवाहो गीतमेव च॥६॥

तंत्रीवाद्यविहीनानां वाद्यानामभिवादनम्‌। स्रोतोऽवगाहगमनं स्नानं गोमयवारिणा॥७॥

पटोदकेन च तथा महीतोयेन चाप्यथ। मातुः प्रवेशा जठरे चितारोहणमेव च॥८॥

शक्रध्वजाभिपतनं पतनं शशिसूर्ययोः। दिव्यांतरिक्षभौमानामुत्पातानां च दर्शनम्‌॥९॥

अर्थात, मत्स्य भगवान ने विभिन्न स्वप्नों के अशुभ फलों की ओर इंगित करते हुए मनु महाराज से कहा कि हे राजन! स्वप्न में नाभि के अतिरिक्त, शरीर के अन्य अंगों में घास, फूस, पेड़-पौधे उगे हुए देखना, सिर पर कांसे को कुटता देखना, मुंडन देखना, अपने को नग्न देखना, स्वयं को मैले कपड़े पहने हुए देखना, तेल लगाना, कीचड़ में धंसना, या कीचड़ लिपटा देखना, ऊंचे स्थान से गिरना, झूला झूलना, कीचड़ और लोहा आदि एकत्रित करना, घोड़ों को मारना, लाल फूलों के पेड़ पर चढ़ना, या लाल पुष्पों के पेड़ों का मंडल, सूअर, भालू, गधे और ऊंटों की सवारी करना, पक्षियों का भोजन करना, मछली, तेल और खिचड़ी खाना, नृत्य करना, हंसना, विवाह एवं गाना-बजाना देखना, बीणा के अलावा अन्य वाद्यों को बजाना, जल स्रोत में नहाने जाना, गोबर लगा कर जल स्नान, कीचड़युक्त उथले जल में नहाना, माता के उदर में प्रवेश करना, चिता पर चढ़ना, इंद्र पताका का गिरना, चंद्रमा एवं सूर्य को गिरते देखना, अंतरिक्ष में उल्का पिंडों के उत्पात आदि स्वप्न में देखना सर्वथा अशुभ है।

देवद्विजातिभूपालगुरूणं क्रोध एवं च। आलिग्नं कुमारीणां पुरुषाणां च मैथुनम्‌॥१०॥

हानिश्चैव स्वगात्राणां विरेकवमनक्रिया। दक्षिणाशाभिगमनंव्याधिनाभिभवस्तथा॥११॥

फलापहानिश्र्च तथा पुष्पहानिस्तथैव च। गृहाणां चैव पातश्च गृहसम्मार्जनं तथा॥२॥

क्रीड़ा पिशाचक्रव्याद्वानरर्क्षनररैपि। परादभिभवश्चैव तस्मांच व्यसनारवः॥३॥

काषायवस्रधारित्वं तद्वत्‌ स्त्रीक्रीडनं तथा। स्नेहपानवगाहौ च रक्तमाल्यानुलेपनम्‌॥४॥

एवमादीनि चान्यानि दुःस्वप्नानि विनिर्दिशेत्‌। एषा। संकथनं धन्यं भूयः प्रस्वापनं तथा॥५॥

अर्थात, श्री मत्स्य भगवान्‌, स्वप्नों के अशुभ फलों के विषय में मनु महाराज को बताते हुए पुनः कहते हैं कि देवता! राजा और गुरुजनों को क्रोध करते देखना, स्वप्न में कुमारी कन्याओं का आलिंगन करना, पुरुषों का मैथुन करना, अपने शरीर का नाश, कै-दस्त करते स्वयं को देखना, स्वप्न में दक्षिण दिशा की यात्रा करना, अपने को किसी व्याधि से ग्रस्त देखना, फलों और पुष्पों को नष्ट होते देखना, घरों को गिरते देखना, घरों में लिपाई, पुताई, सफाई होते देखना, पिशाच, मांसाहारी पशुओं, बानर, भालू एवं मनुष्यों के साथ क्रीड़ा करना, शत्रु से पराजित होना, या शत्रु की ओर से प्रस्तुत किसी विपत्ति से ग्रस्त होना, स्वयं को मलिन वस्त्र स्वयं पहने देखना, या वैसे ही वस्त्र पहने स्त्री के साथ क्रीड़ा करना, तेल पीना, या तेल से स्नान करना, लाल पुष्प, या लाल चंदन धारण करने का स्वप्न देखना आदि सब दुःस्वप्न हैं। ऐसे दुःस्वप्नों को देखने के बाद तुरंत सो जाने से, या अन्य लोगों को ऐसे दुःस्वप्न बता देने से उनका दुष्प्रभाव कम हो जाता है।

दुःस्वप्नों के दुष्प्रभाव के शमन का उपाय बताते हुये मत्स्य भगवान मनु महाराज से कहते है :

कलकस्नानं तिलैर्होमो ब्रह्मणानां च पूजनम्‌। स्तुतिश्च वासुदेवस्य तथातस्यैव पूजनम्‌॥

नागेंद्रमोक्ष श्रवणं ज्ञेयं दुःस्वप्नाशनम्‌॥

अर्थात, ऐसे दुःस्वप्न देखने पर कल्क स्नान करना चाहिए, तिल की समिधा से हवन कर के ब्राह्मणों का पूजन, सत्कार करना चाहिए। भगवान वासुदेव की स्तुति (पूजन द्वादश अक्षरमंत्र ÷ त्त् नमो भगवते वासुदेवाय’ का जप) करनी चाहिए और गजेंद्र मोक्ष कथा का पाठ, या श्रवण करना चाहिए। इनसे दुःस्वप्नों के दुष्प्रभाव का शमन होता है।

लेकिन हमें सपने आते क्यूँ हैं ?

इस बारे में सभी स्वप्न विचारकों के अपने-अपने मत है। कुछ विचारक मानते हैं कि सपनॊं का दिखना इस बात का प्रमाण है कि आप के भीतर कुछ ऐसा है जो दबाया गया है। वहीं सपना बन कर दिखाई देता है। हम कुछ ऐसे कार्य जो समाज के भय से या अपनी पहुँच से बाहर होने के कारण नही कर पाते, वही भावनाएं हमारे अचेतन मन में चले जाती हैं और अवसर पाते ही सपनों के रूप में हमे दिखाई देती हैं। यह स्वाभाविक सपनों की पहली स्थिति होती है।

एक दूसरा कारण जो सपनों के आने का है,वह है किसी रोग का होना। प्राचीन आचार्य इसे रोगी की “स्वप्न-परिक्षा” करना कहते थे।

हम जब भी बिमार पड़ते हैं तो मानसिक व शरीरिक पीड़ा के कारण हमारी नीदं या तो कम हो जाती है या फिर झँपकियों का रूप ले लेती है। ऐसे में हम बहुत विचित्र-विचित्र सपने देखते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि बहुत डरावनें सपने आने लगते हैं। जिस कारण रात को कई-कई बार हमारी नीदं खुल जाती है और फिर भय के कारण हमे सहज अवस्था मे आने में काफी समय लग जाता है।

 

इस बारे में प्राचीन आयुर्वेदाचार्यों का मानना है कि रोगी अवस्था मे आने वाले सपनें अकसर रोग की स्थिति की ओर संकेत करते हैं। वे आचार्य रोगी के देखे गए सपनों के आधार पर रोग की जटिलता या सहजता का विचार करने में समर्थ थे। वह इन का संम्बध , उन रोगीयों की मानसिक दशाओ की खोज का विषय मानते थे और उसी के परिणाम स्वरूप जो निष्कर्ष निकलते थे , उसी के अनुसार अपनी चिकित्सा का प्रयोग उस रोग का निदान करने मे करते थे। उन आचार्यों के स्वप्न विचार करने के कुछ उदाहरण देखें-

 

१.यदि रोगी सिर मुंडाएं ,लाल या काले वस्त्र धारण किए किसी स्त्री या पुरूश को सपने में देखता है या अंग भंग व्यक्ति को देखता है तो रोगी की दशा अच्छी नही है।

 

२. यदि रोगी सपने मे किसी ऊँचे स्थान से गिरे या पानी में डूबे या गिर जाए तो समझे कि रोगी का रोग अभी और बड़ सकता है।

 

३. यदि सपने में ऊठ,शेर या किसी जंगली जानवर की सवारी करे या उस से भयभीत हो तो समझे कि रोगी अभी किसी और रोग से भी ग्र्स्त हो सकता है।

 

४. यदि रोगी सपने मे किसी ब्राह्मण,देवता राजा गाय,याचक या मित्र को देखे तो समझे कि रोगी जल्दी ही ठीक हो जाएगा।

 

५.यदि कोई सपने मे उड़ता है तो इस का अभिप्राय यह लगाया जाता है कि रोगी या सपना देखने वाला चिन्ताओं से मुक्त हो गया है।

 

६.यदि सपने मे कोई मास या अपनी प्राकृति के विरूध भोजन करता है तो ऐसा निरोगी व्यक्ति भी रोगी हो सकता है।

 

७,यदि कोई सपने में साँप देखता है तो ऐसा व्यक्ति आने वाले समय मे परेशानी में पड़ सकता है।या फिर मनौती आदि के पूरा ना करने पर ऐसे सपनें आ सकते हैं।

 

ऊपर दिए गए उदाहरणों के बारे मे एक बात कहना चाहूँगा कि इन सपनों के फल अलग- अलग ग्रंथों मे कई बार परस्पर मेल नही खाते। लेकिन यहाँ जो उदाहरण दिए गए हैं वे अधिकतर मेल खाते हुए हो,इस बात को ध्यान मे रख कर ही दिए हैं।

 

ऐसे अनेकों सपनों के मापक विचारों का संग्रह हमारे प्राचीन आयुर्वेदाचार्यों ने जन कल्याण की भावना से प्रेरित हो , हमारे लिए रख छोड़ा है। यह अलग तथ्य है कि आज उन पर लोग विश्वास कम ही करते हैं।

 

यहाँ सपनों के आने का तीसरा कारण भी है।वह है सपनों के जरीए भविष्य-दर्शन करना।

 

हम मे से बहुत से ऐसे व्यक्ति भी होगें जिन्होंने सपनें मे अपने जीवन मे घटने वाली घटनाओं को, पहले ही देख लिया होगा। ऐसा कई बार देखने मे आता है कि हम कोई सपना देखते हैं और कुछ समय बाद वही सपना साकार हो कर हमारे सामने घटित हो जाता है। यदि ऐसे व्यक्ति जो इस तरह के सपने अकसर देखते रहते हैं और उन्हें पहले बता देते हैं , ऐसे व्यक्ति को लोग स्वप्न द्रष्टा कहते हैं।

 

हमारे प्राचीन ग्रंथों में भी कई जगह ऐसे सपने देखनें का जिक्र भी आया है , जैसे तृजटा नामक राक्षसी का उस समय सपना देखना,जब सीता माता रावण की कैद मे थी और वह सपनें मे एक बड़े वानर द्वारा लंका को जलाए जाने की बात अपनी साथियों को बताती है। यह भी एक सपने मे भविष्य-दर्शन करना ही है।

 

कहा जाता है कि ईसा मसीह सपनों को पढना जानते थे। वह अकसर लोगो द्वारा देखे सपनों की सांकेतिक भाषा को सही -सही बता देते थे। जो सदैव सत्य होते थे।

 

आज की प्रचलित सम्मोहन विधा भी भावनाऒं को प्रभावित कर,व्यक्ति को सपने की अवस्था मे ले जाकर, रोगी की मानसिक रोग का निदान करने में प्रयोग आती है। वास्तव मे इस विधा का संम्बध भी सपनों से ही है। इस मे भावनाओं द्वारा रोगी को कत्रिम नीदं की अवस्था मे ले जाया जाता है।

 

कई बार ऐसा होता है कि हम जहाँ सो रहे होते है, वहाँ आप-पास जो घटित हो रहा होता है वही हमारे सपने में जुड़ जाता है। या जैसे कभी हमे लघुशंका की तलब लग रही होती है तो हम सपने भी जगह ढूंढते रहते हैं। हमारा सपना उसी से संबंधित हो जाता

 

स्वप्न की प्रक्रिया और फलादेश——

स्वप्न मुख्यतः ÷स्वप्न निद्रा’ की अवस्था में आते हैं। सुषुप्ति अवस्था में देखे गये स्वप्न प्रायः सुबह तक याद नहीं रहते। यह आवश्यक नहीं कि स्वप्न में देखा गया सब कुछ अर्थपूर्ण हो। मानस और चिकित्सा शास्त्रियों के अनुसार जो व्यक्ति अनावश्यक इच्छाओं, चंचल भावनाओं, उच्च आकांक्षाओं और भूत-भविष्य की चिंता से अपने को मुक्त रखते हैं, वही गहरी निद्रा ले पाते हैं। गहरी निद्रा स्वस्थ जीवन के लिए परम आवश्यक है।

 

दू धर्म शास्त्रों-अथर्ववेद, योगसूत्र, पुराण, उपनिषदों इत्यादि में स्वप्नों का आध्यात्मिक विश्लेशण मिलता है, जिसके अनुसार स्वप्न की क्रिया मनुष्य की आत्मा से जुड़ी है और आत्मा परमात्मा से। मन की कल्पना शक्ति असीम है। महर्षि वेदव्यास ÷ब्रह्मसूत्र’ में बताते हैं कि मस्तिष्क में पिछले जन्मों का ज्ञान सुषुप्त अवस्था में रहता है। शुद्ध आचरण वाले धार्मिक और शांत चित्त व्यक्ति के सपने, दैविक संदेशवाहक होने के कारण, सत्य होते हैं। परंतु चिंताग्रस्त, या रोगी व्यक्ति का मन अशांत होने के कारण उसके स्वप्न निष्फल होते हैं। स्वप्न भावी जीवन यात्रा से जुड़े शुभ और अशुभ प्रसंग, यहां तककि विपत्ति, बीमारी और मृत्यु की पूर्व सूचना देते हैं।

गौतम बुद्ध के जन्म से कुछ दिन पहले उनकी माता रानी माया ने स्वप्न में एक सूर्य सा चमकीला, ६ दांतों वाला सफेद हाथी देखा था, जिसका अर्थ राज्य के मनीषियों ने एक उच्च कोटि के जगत प्रसिद्ध राजकुमार के जन्म का सूचक बताया, जो सत्य हुआ।

पाश्चात्य देशों में स्वप्न पर शोध कार्य सर्वप्रथम शारीरिक और फिर मानसिक स्तर पर किया गया। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में चिकित्सकों के मतानुसार अप्रिय स्वप्नों का कारण अस्वस्थता, सोते समय सांस लेने में कठिनाई और मस्तिष्क में ऑक्सीजन की कमी होना था। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार तलाक, नौकरी छूटना, व्यापार में घाटा, या परिवार में किसी सदस्य की अचानक मृत्यु के कारण उत्पन्न मानसिक तनाव बार-बार आने वाले स्वप्नों में परिलक्षित होते हैं।

पाश्चात्य शोध के अनुसार जाग्रत अवस्था में सांसारिक वस्तुओं और घटनाओं का मानव मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ता है, जिससे अनेक विचारों और इच्छाओं का जन्म होता है। जो प्रसंग मन में अपूर्ण रहते हैं, वे निद्रा की अवस्था में, व्यवस्थित या अव्यवस्थित रूप में, अभिव्यक्त होते हैं। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक सिगमंड फ्रॉयड ने अपनी पुस्तक ÷थ्योरी ऑफ ड्रीम्स’ में बताया कि मनुष्य की इच्छाएं (मुख्यतः काम वासनाएं) जो समाज के भय से जाग्रत अवस्था में पूर्ण नहीं हो पातीं, वे स्वप्न में चरितार्थ हो कर व्यक्ति को मानसिक तृप्ति देती हैं और उसको तनावमुक्त और संतुलित रहने में सहायता करती हैं। परंतु यह सिद्धांत अंधे व्यक्ति द्वारा देखे गये स्वप्नों को समझाने में असमर्थ था। कुछ समय बाद फ्रॉयड ने अपने विचारों में परिवर्तन किया।

ड्रीम टेलीपैथी’ के लेखक डा. स्टैनली के अनुसार स्वप्नों की पुनरावृत्ति का संबंध वर्तमान में होने वाली समस्याओं और घबराहट से ही नहीं, अपितु अतीत से भी हो सकता है। बचपन में घटी कोई भयानक घटना का मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ने से उससे संबंधित स्वप्न अधिक दिखाई देते हैं।

स्वप्न की प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए डा. स्टैनली ने बताया कि मनुष्य का मस्तिष्क छोटी-छोटी घटनाओं एवं जानकारियों को संगठित रूप दे कर एक ऐसे निष्कर्ष (स्वप्न) पर पहुंचता है, जो कभी-कभी बहुत सही होता है। रोम के सम्राट जूलियस सीज+र की पत्नी ने उनकी हत्या की पिछली रात सपने में देखा था कि वह अपने बाल बिखेरे पति का लहूलुहान शरीर उठाये फिर रही है। उसने सीज+र को सीनेट जाने से मना किया, पर वह नहीं माना और सीनेट पहुंचने पर ब्रूटस ने उसकी हत्या कर दी। इसी प्रकार अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने अपनी हत्या को कुछ दिन पहले स्वप्न में देखा था।

पाश्चात्य शोधकर्ता अब भारतीय विचारधारा से सहमत हो रहे हैं। फ्रॉयड ने नये अनुभवों के आधार पर अगली पुस्तक ÷इंटरप्रटेशन ऑंफ ड्रीम्‌स’ में स्वीकार किया कि स्वप्न कभी-कभी मनुष्य की दबी इच्छाओं और मन की उड़ान से बहुत आगे की सूचना देने में सक्षम होते हैं। डॉ. हैवलॉक एलाईस अपनी पुस्तक ÷दि वर्ल्ड ऑफ ड्रीम्‌स’ में मानते हैं कि स्वप्न में सुषुप्त मस्तिष्क और ÷एकस्ट्रा सेंसरी परसेप्शन’ की बड़ी भूमिका होती है।

बुच सोसाईटी फॉर साईकिक रिसर्च’ हॉलैंड, के शोधकार्य ने यह प्रमाणित किया है कि कुछ स्वप्न भविष्य की घटनाओं की सही-सही पूर्वसूचना देते हैं। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डॉ. हैफनर मोर्स के अनुसार सतत प्रयत्न द्वारा सुषुप्त मस्तिष्क को जगा कर सपनों द्वारा ÷दिव्य दृष्टि’ प्राप्त की जा सकती है।

अत्यंत वृद्ध और काले शरीर वाली स्त्री का नाच देखना, अथवा नंगधडंग फकीर को नाचते, हंसते, अपनी ओर क्रूर दृष्टिपात करते देखना, काले वस्त्र पहने, हाथ में लौह का डंडा लिये किसी को देखना मृत्यु के सूचक होते हैं।

सपनों के शुभ-फल स्वप्न विषय शुभ फल स्वच्छ आकाश ऐश्वर्य वृद्धि आम का वृक्ष संतान प्राप्ति अपमान चिंताएं दूर होना अपनी मृत्यु आयु वृद्धि खड़ी फसल धन प्राप्ति अर्थी देखना रोग मुक्ति इमारत बनना धन लाभ, उन्नति हाथी, गाय, मोर धन लाभ, समृद्धि मधुमक्खी देखना लाभ ऊंचाई पर चढ़ना उन्नति कब्रिस्तान प्रतिष्ठा में वृद्धि काला नाग राज्य से सम्मान गंगा दर्शन सुखी जीवन किला देखना तरक्की होगी घोड़े पर चढ़+ना पदोन्नति छिपकली देखना अचानक धन लाभ डर कर भागना कष्ट से छुटकारा डोली देखना इच्छा पूरी होना तारे देखना मनोरथ पूरा होना तलवार देखना शत्रु पर विजय देवी-देवता खुशी की प्राप्ति धन एवं रत्न संतान सुख नाखून काटना रोग तथा दुख से मुक्ति न्यायालय झगड़े में सफलता मिठाई खाना मान-सम्मान हरा-भरा जंगल खुशी मिलेगी परीक्षा में असफल होना सफलता पत्र आना शुभ सूचक लहराता झंडा विजय की प्राप्ति भोजनयुक्त थाल शुभ सूचक तांबे का सिक्का मिलना धनदायक भोजन पकाना शुभ समाचार माला जपना भाग्योदय सीधी सड़क पर चलना सफलता खुला दरवाजा देखना नया काम बनना कौआ उड़ाना मुसीबत से छुटकारा सपनों के अशुभ फल स्वप्न विषय अशुभ फल अग्नि देखना पित्त संबंधी रोग अग्नि उठाना परेशानी होगी अपनी शादी संकट आना अतिथि आना आकस्मिक विपत्ति अंधेरा देखना दुख मिलेगा आंधी-तूफान मुसीबत में फंसना उल्लू देखना रोग-शोक होगा उल्टा लटकना अपमान होना कटा सिर देखना चिंता, परेशानी कुत्ते का काटना शत्रु भय घोड़े से गिरना परेशानी चोर देखना धन हानि जेब कटना धन हानि झाड़ू देखना नुकसान होना डूबते देखना अनिष्ट सूचक दीवार गिरना धन हानि नल देखना चिंता नंगा देखना कष्ट प्राप्ति ऊंचाई से गिरना हानि होना बंदूक देखना संकट आना बिल्ली देखना लड़ाई होना भाषण देना वाद-विवाद कौआ दर्शन अशुभ सूचक ताला लगा होना कार्य रुकना भोजनरहित थाली अशुभ सूचक खराब सड़क पर चलना परेशानी आना

 

कुछ शब्दों के अनुसार उनके स्वप्न फल —-

 

अ——

अखरोट देखना – भरपुर भोजन मिले तथा धन वृद्धि हो

अनाज देखना -चिंता मिले

अनार खाना (मीठा ) – धन मिले

अजनबी मिलना – अनिष्ट कीपूर्व सूचना

अजवैन खाना – स्वस्थ्य लाभ

अध्यापक देखना – सफलता मिले

अँधेरा देखना – विपत्ति आये

अँधा देखना – कार्य मेंरूकावट आये

अप्सरा देखना – धन और मानसम्मान की प्राप्ति

अर्थी देखना – धन लाभ हो

अमरुद खाना – धन मिले

अनानास खाना – पहले परेशानीफिर राहत मिले

अदरक खाना – मान सम्मान बढे

अनार के पत्ते खाना – शादी शीघ्र हो

अमलतास के फूल – पीलिया या कोढ़का रोग होना

अरहर देखना – शुभ

अरहर खाना – पेट में दर्द

अरबी देखना – सर दर्द या पेटदर्द

अलमारी बंद देखना – धन प्राप्ति हो

अलमारी खुली देखना – धन हानि हो

अंगूर खाना – स्वस्थ्य लाभ

अंग रक्षक देखना – चोट लगने काखतरा

अपने को आकाश में उड़ते देखना – सफलता प्राप्तहो

अपने पर दूसरौ का हमला देखना – लम्बी उम्र

अंग कटे देखना – स्वास्थ्य लाभ

अंग दान करना – उज्जवल भविष्य , पुरस्कार

अंगुली काटना – परिवार मेंकलेश

अंगूठा चूसना – पारवारिकसम्पति में विवाद

अन्तेस्ति देखना – परिवार मेंमांगलिक कार्य

अस्थि देखना – संकट टलना

अंजन देखना – नेत्र रोग

अपने आप को अकेला देखना – लम्बी यात्रा

अख़बार पढ़ना, खरीदना – वाद विवाद

अचार खाना , बनाना – सिर दर्द, पेट दर्द

अट्हास करना – दुखद समाचारमिले

अध्यक्ष बनना – मान हानि

अध्यन करना -असफलता मिले

अपहरण देखना – लम्बी उम्र

अभिमान करना – अपमानित होना

अध्र्चन्द्र देखना – औरत से सहयोगमिले

अमावस्या होना – दुःख संकट सेछुटकारा

अगरबत्ती देखना – धार्मिकअनुष्ठान हो

अगरबत्ती जलती देखना – दुर्घटना हो

अगरबत्ती अर्पित करना – शुभ

अपठनीय अक्षर पढना – दुखद समाचारमिले

अंगीठी जलती देखना – अशुभ

अंगीठी बुझी देखना – शुभ

अजीब वस्तु देखना – प्रियजन के आनेकी सूचना

अजगर देखना – शुभ

अस्त्र देखना – संकट से रक्षा

अंगारों पर चलना – शारीरिक कष्ट

अंक देखना सम – अशुभ

अंक देखना विषम – शुभ

अस्त्र से स्वयं को कटा देखना – शीघ्र कष्टमिले

अपने दांत गिरते देखना – बंधू बांधव कोकष्ट हो

आंसू देखना – परिवार मेंमंगल कार्य हो

आवाज सुनना – अछा समय आनेवाला है

आंधी देखना – संकट सेछुटकारा

आंधी में गिरना – सफलता मिलेगी

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आ—-

आइना देखना –इच्छा पूरण हो , अछा दोस्तमिले

आइना में अपना मुहं देखना – नौकरी मेंपरेशानी , पत्नी में परेशानी

आसमान देखना – ऊचा पदप्राप्त हो

आसमान में स्वयं को देखना – अच्छीयात्रा का संकेत

आसमान में स्वयं को गिरते देखना – व्यापारमें हानि

आग देखना – गलत तरीकेसे धन की प्राप्ति हो

आग जला कर भोजन बनाना – धन लाभ , नौकरी मेंतरक्की

आग से कपडा जलना – अनेक दुखमिले , आँखों का रोग

आजाद होते देखना – अनेकचिन्ताओ से मुक्ति

आलू देखना – भरपूर भोजनमिले

आंवला देखना – मनोकामनापूर्ण न होना

आंवला खाते देखना – मनोकामनापूर्ण होना

आरू देखना – प्रसनता कीप्राप्ति

आक देखना – शारारिककष्ट

आम खाते देखना – धन औरसंतान का सुख

आलिंगन देखना पुरुष का औरत से – काम सुख कीप्राप्ति

आलिंगन देखना औरत का पुरुष से – पति सेबेवफाई की सूचना

आलिंगन देखना पुरुष का पुरुष से- शत्रुताबढ़ना

आलिंगन देखना औरत का औरत से – धनप्राप्ति का संकेत

आत्महत्या करना या देखना – लम्बी आयु

आवारागर्दी करना – धन लाभ होनौकरी मिले

आँचल देखना – प्रतियोगितामें विजय

आँचल से आंसू पोछना – अछा समयआने वाला है

आँचल में मुँह छिपाना – मान समानकी प्राप्ति

आरा चलता हुआ देखना – संकट शीघ्रसमाप्त होगे

आरा रूका हुआ देखना- नए संकट आने का संकेत

आवेदन करना या लिखना – लम्बी यात्राहो

आश्रम देखना – व्यापारमें घाटा

आट्टा देखना – कार्य पूराहो

आइसक्रीम खाना – सुख शांतिमिले

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इ—–

इमली खाते देखना – औरत के लिए शुभ ,पुरुष के लिए अशुभ

इडली साम्भर खाते देखना – सभी से सहयोगमिले

इष्ट देव की मूर्ति चोरी होना – मृत्युतुल्यकष्ट आये

इश्तहार पढना – धोखा मिले, चोरी हो

इत्र लगाना – अछे फल कीप्राप्ति, मान सम्मान बढेगा

इमारत देखना – मान सम्मान बढे, धन लाभ हो

ईंट देखना – कष्ट मिलेगा

इंजन चलता देखना – यात्रा हो , शत्रु सेसावधान

इन्द्रधनुष देखना – संकट बढे , धन हानि हो

इक्का देखना हुकम का – दुःख व् निराशामिले

इक्का देखना ईंट का -कष्टकारक स्तिथि

इक्का देखना पान का -पारवारिक क्लेश

इक्का देखना चिड़ी का – गृह क्लेश ,अतिथि आने कीसूचना

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ल——————

लंगर खाना या देखना -धन वृद्धि हो ,व्यवसाय में तेजी आये

लंगूर देखना -शुभ समाचार मिले

लंगोटी देखना -आर्थिक कठिनाईया बढे

लकीर खींचना -गृह कलेश बढे , अनावश्यक झगडे हो

लटकना या लटकते हुए देखना -सोचा हुआ काम शीघ्र बने , आर्थिक समृद्धि बढे

लड़का गोद में देखना (अपना) – धन वृद्धि हो , व्यवसाय में तेजी आये

लड़का गोद में देखना (अनजान) – परेशानी बढे ,घर में कलेश हो

लड़ना – विद्रोहियों के साथ – देश तथा समाज में अशांति फैले

लगाम देखना -मान सम्मान बढे , धन वृद्धि हो

लक्ष्मी का चित्र देखना -धन तथा सुख सौभाग्य की वृद्धि हो

लहसुन देखना – धन वृद्धि हो परन्तु अन्न व् सब्जी के व्यापार में हानि हो

लक्कड़ बाघ देखना – नयी मुसीबतें आने का संकेत

लपटें देखना (आग की ) – परिवार में शान्ति बढे , झगडा ख़तम हो

लाल आँखे देखना – शुभ फल की प्राप्ति

लालटेन जलना – चलते हुए काम में रोड़ा अटके

लालटेन बुझाना – अनेक समस्या स्वयं निपट जाये

लाट या मीनार देखना -आयु वृद्धि हो , सुख शान्ति बढे

लाठी देखना -सुख शांति में वृद्धि हो ,अच्छे सहयोगी मिले

लाल टीका देखना -सत्संग से लाभ हो, कामो में सफलता मिले

लाल वस्त्र दिखाई देना – धन नाश हो ,खतरा बढे

लाल आकाश में देखना -लडाई झगडा व् आतंक में वृद्धि ,धन तथा देश की हानि हो

लिबास (अपने कपडे)सफ़ेद देखना – सुख , शान्ति तथा समृद्धि में वृद्धि हो

लिबास हरा देखना – धन दौलत बढे , स्वस्थ्य अच्चा हो

लिबास पीला देखना -स्वस्थ्य में खराबी आये ,चोरी हो

लिबास मैला देखना -धन हानि हो ,खराब समय आने वाला है

लिफाफा खोलना -समाज में मानहानि हो , गुप्त बात सामने आये

लोहा देखना – काफी मेहनत करने के बाद सफलता मिले

लोहार देखना – मान सम्मान बढे , शत्रुओं पर विजय प्राप्त हो

लोबिया खाना – धन तथा व्यवसाय में वृद्धि हो

लौकी देखना या खाना -शुभ समाचार मिले , धन वृद्धि हो ,नौकरी में पदोंनिती हो

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उ—–

उजाड़ देखना –दूर स्थान की यात्रा हो

उस्तरा प्रयोग करना – यात्रा मेंधन लाभ हो

उपवन देखना – बीमारी कीपूर्व सूचना

उदघाटन देखना – अशुभ संकेत

उदास देखना – शुभ समाचारमिले

उधार लेना या देना – धन लाभ कासंकेत

स्वयं को उड़ते देखना – गंभीरदुर्घटना की पूर्व सूचना

उछलते देखना -दुखद समाचार मिलने का संकेत

उल्लू देखना -दुखों का संकेत

उबासी लेना – दुःख मिले

उल्टे कपडे पहनना – अपमान हो

उजाला देखना – भविष्य मेंसफलता का संकेत

उजले कपडे देखना -इज्जत बढे , विवाह हो

उठना और गिरना – संघर्षबढेगा

उलझे बाल या धागे देखना – परेशानियाबढेगी

उस्तरा देखना – धन हानि , चोरी का भय

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ऊ——-

ऊंघना – धन हानि , चोरी का भय

ऊंचाई पर अपने को देखना – अपमानित होना

ऊन देखना – धन लाभ हो

ऊंचे पहाड़ देखना – काफी मेहनत केबाद कार्य सिद्ध होना

ऊंचे वृक्ष देखना – मनोकामना पूरीहोने में समय लगना

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औ—

औषधी देखना –गलत संगति देखना

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ऐ—————–

ऐनक लगते देखना – विद्या मिले, ख़ुशी इज्जत मिले

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ट—–

टंकी खाली देखना –शुभ लक्षण

टंकी भरी देखना – अशुभ घटनाका संकेत

टाई सफेद देखना – अशुभ

टाई रंगीन देखना – शुभ

टेलेफोन करना – मित्रो कीसंख्या में वृद्धि

टोकरी खाली देखना – शुभ लक्षण

टोकरी भरी देखना – अशुभ घटनाका संकेत

टोपी उतारना – मान सम्मानबढे

टोपी सिर पर रखना – अपमान हो

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ठ—–

ठण्ड में ठिठुरना –सुख मिले

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च——

चलता पहिया देखना – कारोबार में उन्नत्ति हो

चप्पल पहनना – यात्रा पर जाना

चक्की देखना – मान सम्मान बढेगा

चमडा देखना – दुःख हो

चबूतरा देखना -मान सम्मान बढेगा

चट्टान देखना (काली ) – शुभ

चट्टान देखना (सफेद ) – अशुभ

चपत मारना – धन हानि हो

चपत खाना – शुभ फल की प्राप्ति

चरबी देखना – आग लगने का संकेत

चलना जमीन पर -नया रोजगार मिले

चलना पानी पर – कारोबार में हानि

चलना आसमान पर – बीमारी आने का संकेत

चन्द्र ग्रहण देखना – सभी कार्य बिगडे

चमगादर उड़ता देखना – लम्बी यात्रा हो

चमगादर लटका देखना – अशुभ संकेत

चम्मच देखना – नजदीकी व्यक्ति धोखा दे

चप्पल देखना – यात्रा पर जाना

चटनी खाना – दुखो में वृद्धि

चरखा चलाना – मशीनरी खराब हो

चश्मा खोना – चोरी के संकेत

चांदी के बर्तन में दूध पीना – संम्पत्ति में वृद्धि हो

चारपाई देखना – हानि हो

चादर शरीर पर लपेटना -गृह क्लेश बढे

चादर मैली देखना – धन लाभ हो

चादर समेट कर रखना – चोरी होने का संकेत

चंचल आँखे देखना – बीमारी आने की सूचना

चांदी का सामान देखना – गृह क्लेश बढे

चोकलेट खाना -अच्छा समय आने वाला है

चाय देखना – धन वृद्धि हो

चावल देखना – कठिनाई से धन मिले

चाकू देखना – अंत में विजय

चित्र देखना – पुराने मित्र से मिलन हो

चिडिया देखना – मेहमान आने का संकेत

चींटी देखना – धन लाभ हो

चींटिया बहुत अधिक देखना – परेशानी आये

चील देखना – बदनामी हो

चींटी मारना – तुंरत सफलता मिले

चुम्बन लेना – आर्थिक समृधि हो

चुम्बन देना – मित्रता बढे

चुटकी काटना – परिवार में कलेश

चुंगी देना – चलते काम में रूकावट

चुंगी लेना – आर्थिक लाभ

चुडैल देखना -धन हानि हो

चूहा देखना -औरत से धोखा

चूहा फंसा देखना – शरीर को कष्ट

चूहा चूहे दानी से निकलते देखना – कष्ट से मुक्ति

चूहा मरा देखना – धन लाभ

चूहा मारना – धन हानि

चूडिया तोड़ना – पति दीर्घायु हो (औरत के लिए )

चूल्हा देखना – उत्तम भोजन प्राप्त हो

चूरन खाना – बीमारी में लाभ

चेचक निकलना – धन की प्राप्ति

चोर पकड़ना – धन आने की सूचना

चोटी पर स्वयं को देखना – हानि हो

चोराहा देखना – यात्रा में सफलता

चौकीदार देखना – अचानक धन आये

चौथ का चाँद देखना – बहुत अशुभ

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ड—–

डंडा देखना –दुश्मन से सावधान रहे

डफली बजाना – घर मेंउत्सव की सूचना

डाक खाना देखना – बुरासमाचार मिले

डाकिया देखना – शुभ सूचनामिले

डॉक्टर देखना – निराशामिले

डाकू देखना – धन वृद्धिहो

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त——

तरबूज देखना –धन लाभ

तराजू देखना – कार्यनिष्पक्ष पूर्ण हो

तबला बजाना – जीवनसुखपूर्वक गुजरे

तकिया देखना – मान सम्मानबढे

तलवार देखना – शत्रु परविजय

तपस्वी देखना -मन शांत हो

तला पकवान खाना – शुभ समाचारमिले

तलाक देना – धन वृद्धिहो

तमाचा मारना -शत्रु पर विजय

तराजू में तुलना – भयंकरबीमारी हो

तवा खाली देखना – अशुभ लक्षण

तवे पर रोटी सेकना – संपत्तिबढे

तहखाना देखना या उसमे प्रवेश करना – तीर्थयात्रा पर जाने का संकेत

ताम्बा देखना – सरकार सेलाभ मिले

तालाब में तैरना – स्वस्थ्य लाभ

ताला देखना -चलते काम में रूकावट

ताली देखना – बिगडे कामबनेगे

तांगा देखना – सुख मिले, सवारी कालाभ हो

ताबीज बांधना – काम मेंहानि हो

ताबीज़ देखना – शुभ समय काआगमन

ताश देखना – मित्र अथवापडोसी से लडाई हो

तारा देखना – अशुभ

तितली देखना – विवाह होया प्रेमिका मिले

तितली उड़ कर दूर जाना – दांपत्यजीवन में क्लेश हो

तिल देखना – कारोबारमें लाभ

तिराहा देखना – लडाई झगडाहो

त्रिशूल देखना – अच्छामार्ग दर्शन मिले

त्रिमूर्ति देखना – सरकारीनौकरी मिले

तितली पकड़ना – नई संतानहो

तिजोरी बंद करना – धन वृद्धिहो

तिजोरी टूटती देखना – कारोबारमें बढोतरी

तिलक करना – व्यापारबढे

तूफान देखना या उसमे फँसना – संकट सेछुटकारा मिले

तेल या तेली देखना – समस्या बढे

तोलना –महंगाई बढे

तोप देखना -शत्रु पर विजय

तोता देखना – ख़ुशी मिले

तोंद बढ़ी देखना – पेट मेंपरेशानी हो

तोलिया देखना – स्वस्थ्यलाभ हो

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थ—–

थप्पर खाना –कार्य में सफलता

थप्पर मारना – झगडे मेंफँसना

थक जाना – कार्य मेंसफलता मिले

थर थर कंपना -मान सम्मान बढे

थाली भरी देखना – अशुभ

थाली खाली देखना – सफलता मिले

थूकना –मान सम्मान बढे

थैली भरी देखना – जमीनजायदाद में वृद्धि

थैली खाली देखना – जमीनजायदाद में झगडा हो

 

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ध————–

धमाका सुनना –कष्ट बढे

धतूरा खाना – संकट सेबचना

धनिया हरा देखना – यात्रा परजाना पढ़े

धनुष देखना – सभी कर्मोमें सफलता मिले

धब्बे देखना – शुभ संकेत

धरोहर लाना या देखना – व्यापारमें हानि हों

धार्मिक आयोजना देखना – शुभ संकेत

धागा देखना – कार्य मेंवृद्धि हों

धुरी देखना – मान सम्मानमें वृद्धि हों

धुआ देखना – कष्ट बढे , परेशानीमें फंसना पढ़े

धुंध देखना – शुभ समाचारमिले

धुन सुनना – परेशानीबढे

धूमधाम देखना – परेशानीबढे

धूल देखना – यात्रा हों

धोबी देखना – काम मेंसफलता मिले

धोती देखना – यात्रा परजाना पड़े

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म—–

मछर देखना – अपमानित होना पड़े

मछली देखना – गृहस्थी का सुख मिले

मखी देखना – धन हानि हो

मकडी देखना – बहुत अधिक मेहनत करनी पड़े

मकान बनते देखना – मान सम्मान में वृद्धि हो

मलाई खाना – धन वृद्धि हो

मंदिर या मस्जिद देखना – खुशहाली बढे

मंदिर में पुजारी देखना – गृह कलेश बढे

मर जाना – धन वृद्धि हो

मखमल पर बैठना – लम्बी बीमारी आये

मगरमच देखना – शुभ समाचार मिले

मंत्री देखना – मान सम्मान में वृद्धि हो

माला ( पूजा वाली ) शुभ समय आने का संकेत

माला फूलों की पहनाना- मान सम्मान में वृद्धि हो

मातम करना – खुशहाली बढे

माली देखना – घर में समृधि बढे

मिर्च खाना – काम में सफलता मिले

मिर्गी से पीड़ित होना या देखना – बुद्दि तेज हो

मिठाई खाना या बाँटना – बिगडे काम बने

मीट खाना – मनोकामना पूरण हो

मुर्दा उठा कर ले जाते देखना – बिना कमाया माल मिले

मुर्दे को जिन्दा देखना – चिंता दूर हो

मुर्दा शारीर से आवाज़ आना – बना काम बिगड़ जाना

मुर्दों का समूह देखना – गलत सोसाइटी में काम करना पड़े

मुर्दे को नहलाना – धन वृद्धि हो

मुर्दे को कुछ देना – शुभ समाचार

मुर्दे के साथ खाना -अच्छा समय आये

मुर्गा देखना -विदेश व्यापार बढे

मुर्गी देखना -गृहस्थी का सुख मिले

मोहर लगाना – धन वृद्धि हो

मुरझाये फूल देखना – संतान को कष्ट हो

मुंडन कराना या होते देखना -गृहस्थी का तनाव दूर हो

मुहर्रम देखना – कारोबार में उन्नत्ति हो

मूंगा पहनना या देखना – कारोबार में उन्नत्ति हो

मूंग मसूर या मोठ देखना – अनेक परेशानी हो

मोची देखना -यात्रा लाभदायक हो

मोम देखना – झगडे या विवाद में समझोता हो

मोर नाचते देखना – शुभ समाचार मिले

मोर मोरनी देखना – दांपत्य सुख में वृद्धि हो

मोजा पहनना – पति पत्नी में प्रेम बड़े

मोमबत्ती देखना – विवाह हो

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व—–

वकील देखना – कठिनाई बढे , झगडा हो

वजीफा पाना -काम में असफलता मिले , धनहानि हो

वरमाला देखना या डालना -घर में कलेश हो मित्र से लडाई हो

वसीयत करना -भूमि सम्बन्धी विवाद हो , घर में तनाव बढे

वायदा करना – झूठ बोलने की आदत पढ़े

वाह वाह करके हसना -मान सम्मान का ध्यान रखे , शत्रु बदनाम करेंगे

वार्निश करना (घर की वस्तुओं पर)- परिवार पर संकट आये, स्वस्थ्य खराब हो

वाष्प उड़ते देखना – धनहानि हो , दुर्घटना तथा शारीरिक कष्ट हो

विदाई समारोह में भाग लेना – व्यापार में तेजी आये , धन वृद्धि हो

विमान देखना – धन हानि हो

विस्फोट देखना या सुनना – नया कारोबार शुरू हो , बड़े व्यक्तियों से मुलाकात हो

वीणा बजाना (स्वयं द्वारा) – धन धान्य तथा समृद्धि प्राप्त हो

वीणा बजाना – शोक समारोह में शामिल होना पड़े , (दूसरो द्वारा)मानसिक कष्ट हो

वृद्धा देखना – अशुभ समाचार मिले

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द—–

दरवाजा बंद देखना – चिंता बढे

दही देखना -धन लाभ हो

दलिया खाना या देखना – स्वस्थ्य कुछ समय के लिए ख़राब हो

दरार देखना – घर में फूट

दलदल देखना – काम में आलस्य हो

दरवाजा खोलना – नया कार्य शुरू हो

दरवाजा गिरना – अशुभ संकेत

दक्षिणा लेना या देना – व्यापार में घाटा

दमकल चलाना – धन वृद्धि हो

दर्पण देखना – मानसिक अशांति

दस्ताना पहनना – शुभ समाचार

दहेज़ लेना या देना – चोरी की सम्भावना

दरजी को काम करते देखना – कोर्ट से छुटकारा

दवा खाना या खिलाना – अच्छा मित्र मिले

दवा गिरना – बीमारी दूर हो

दांत टूटना – शुभ

दांत में दर्द देखना -नया कार्य शुरू हो

दाडी देखना – मानसिक परेशानी हो

दादा या दादी देखना जो मृत हो – मान सम्मान बढे

दान लेना – धन वृद्धि हो

दान देना – धन हानि हो

दाह क्रिया देखना – सोचा हुआ कार्य बनने के संकेत

दातुन करना -कष्ट मिटे

दाना डालना पक्षियो को – व्यापार में लाभ हो

दाग देखना – चोरी हो

दामाद देखना -पुत्री को कष्ट हो

दाल कपड़ो पर गिरना -शुभ लक्षण

दाल पीना – कार्य में रूकावट

दाढ़ी सफेद देखना – काम में रूकावट

दाढ़ी काली देखना – धन वृद्धि हो

दियासिलाई जलाना – दुश्मनी बढे

दीपक बुझा देना – नया कार्य शुरू हो

दीपक जलाना – अशुभ समाचार मिले

दीवाली देखना – व्यापार में घाटा हो

दीपक देखना – मान सम्मान बढे

दुल्हन देखना – सुख मिले

दुकान करना – मान सम्मान बढे

दुकान बेचना – मानहानि हो

दुकान खरीदना – धन का लाभ होना

दुकान बंद होना – कष्टों में वृद्धि हो

दुपट्टा देखना – स्वस्थ्य में सुधार हों

दूल्हा /दुल्हन बनना – मानहानि हों

दूल्हा /दुल्हन बारात सहित देखना -बीमारी आये

दूरबीन देखना – मान सम्मान में हानि हों

दूध देखना – आर्थिक लाभ मिले

दुकान पर बैठना – प्रतिष्ट बढे,धन लाभ हों

देवता से मंत्र प्राप्त होना – नए कार्य में सफलता

देवी देवता देखना – सुख संपत्ति की वृद्धि होना

दोना देखना – धन संपत्ति प्राप्त होना

दोमुहा सांप देखना – दुर्घटना हों, मित्र द्वारा विश्वासघात मिले

दौड़ना – कार्य में असफलता हों

देवी देवता देखना – कृष्ण – प्रेम संबंधो में वृद्धि

देवी देवता देखना – राम – सफलता मिले

देवी देवता देखना – शिव – मानसिक शांति बढे

देवी देवता देखना – विष्णु – सफलता मिले

देवी देवता देखना – ब्रह्मा – अच्छा समय आने वाला है

देवी देवता देखना – हनुमान -शत्रु का नाश हो

देवी देवता देखना – दुर्गा – रोग दूर हो

देवी देवता देखना – सीता – पहले कष्ट मिले फिर समृधि हो

देवी देवता देखना – राधा – शारीरिक सुख मिले

देवी देवता देखना – लक्ष्मी – धन धन्य की प्राप्ति हो

देवी देवता देखना – सरस्वती -भविष्य सुखद हो

देवी देवता देखना – पार्वती – सफलता मिले

देवी देवता देखना – नारद -दूर से शुभ समाचार मिले..

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क—-

कब्र खोदना – धन पाए , मकान बनाये

कत्ल करना स्वयं का – अच्छा सपना है , बुरे काम से बचे

कद अपना छोटा देखना – अपमान सहना , परेशानी उठाना

कद अपना बड़ा देखना – भारी संकट आना

कसम खाते देखना – संतान का दुःख भोगना

कलम देखना – विद्या धन की प्राप्ति

कर्जा देना – खुशहाली आये

कर्जा लेना – व्यापार में हानि

कला कृतिया देखना – मान समान बढे

कपूर देखना – व्यापार में लाभ

कबाडी देखना – अच्छे दिनों की शुरूआत

कबूतर देखना – प्रेमिका से मिलना

कबूतरों का झुंड – शुभ समाचार मिले

कमल का फूल – ज्ञान की प्राप्ति

कपास देखना – सुख समृधि हो

कंगन देखना – अपमान हो

कदू देखना – पेट दर्द

कन्या देखना – धन वृद्धि हो

कफन देखना – लम्बी उम्र

कली देखना – स्वास्थ्य खराब हो

कछुआ देखना – शुभ समाचार मिले

कलश देखना – सफलता

कम्बल देखना – बीमारी आये

कपडा धोना – पहले रूकावट , फिर लाभ

कटा सिर देखना – शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी

कब्रिस्तान देखना – निराशा हो

कंघी देखना – चोट लगना , दांत या कान में दर्द

कसरत – बीमारी आने की सूचना

काली आँखे देखना – व्यापार में लाभ

काला रंग देखना – शुभ फल

काजू खाना – नया व्यापार शुरू हो

कान देखना – शुभ समाचार

कान साफ करना – अच्छी बातो का ज्ञान

काउंटर देखना – लेने देने में लाभ हो

कारखाना देखना – दुर्घटना में फसने की सूचना

काली बिल्ली देखना – लाभ हो

कुंडल पहने देखना – संकट हो

कुबडा देखना – कार्य में विघ्न

कुमकुम देखना – कार्य में सफलता

कुल्हाडी देखना – परिश्रम अधिक, लाभ कम

कुत्ता भोंकना – लोगो द्वारा मजाक उड़ना

कुत्ता झपटे – शत्रु की हार

कुर्सी खाली देखना – नौकरी मिले

कूड़े का ढेर देखना – कठिनाई के बाद धन मिले

किला देखना – ख़ुशी प्राप्त हो

कील देखना / ठोकना – परिवार में बटवारा हो

केश संवारना – तीर्थ यात्रा

केला खाना / देखना – ख़ुशी हो

केक देखना – अच्छी वस्तु मिले

कैमरा देखना – अपने भेद छिपा कर रखे

कोढ़ी देखना – धन का लाभ

कोहरा – संकट समाप्त हो

कोठी देखना – दुःख मिले

कोयल देखना / सुनना – शुभ समाचार

कोया देखना – शुभ संकेत

किसी ऊंचे स्थान से कूदना – असफलता

नर कंकाल देखना – उम्र बढने का संकेत

जप करना – विजय

कद लम्बा देखना – मृत्युतुल्य कष्ट हो

कद घटना – अपमान हो

कटोरा देखना – बनते काम बिगढ़ना

कनस्तर खाली देखना – शुभ

कनस्तर भरा देखना – अशुभ

कमंडल देखना – परिवार के किसी सदस्य से वियोग

करवा चौथ – औरत देखे तो आजीवन सधवा, पुरुष देखे तो धन धान्य संपूरण

कागज कोरा – शुभ

कागज लिखा देखना – अशुभ

सफेद कुरता देखना – शुभ

अन्य रंग का कुरता देखना – अशुभ

कुर्सी पर स्वयं को बैठे देखना – नया पद, पदोनती

कुर्सी पर अन्य को बैठे देखना – अपमान

कब्र खोदना – मकान का निर्माण करना

कपूर देखना – व्यापार नौकरी में लाभ

कबूतर देखना – प्रेमिका से मिलन

कपडा बेचते देखना – व्यापार में लाभ

कपडे पर खून के दाग – व्यर्थ बदनामी

कछुआ देखना – धन आशा से अधिक मिलना

कमल ककडी देखना – सात्विक भोजन में आनंद, ख़ुशी मिले

कपास देखना – सुख, समृधि घर आये

करी खाना – विधवा से विवाह, विधुर से विवाह

कृपाण – धरम कार्य पूर्ण होने की सूचना

कान देखना – शुभ समाचार

कान कट जाना – अपनों से वियोग

काला कुत्ता देखना – कार्य मे सफलता

काउंटर देखना – लेन देन में लाभ

काली बिल्ली देखना – शुभ समाचार

पीली बिल्ली देखना – अशुभ समाचार

काना व्यक्ति देखना – अनकूल समय नहीं

कीडा देखना – शक्ति का प्रतीक

कुम्हार देखना – शुभ समाचार

केतली देखना – दांपत्य जीवन में शांति हो

केला देखना या खाना – शुभ समाचार

कैंची – अकारण किसी से वाद- विवाद होना

कोठी देखना – दुःख मिले

कोयला देखना – प्रेम के जाल में फँस कर दुःख पाए

कुरान- सुख शांति की भावना बढे

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र—–

रजाई ओड़ना – धन मिले

रजाई नई बनवाना – स्थान परिवर्तन हो

रजाई फटी पुरानी देखना – शुभ कार्य के लिए निमंत्रण हो

रस्सी लपेटना – सफलता मिले

रथ देखना -यात्रा करनी पड़े

रसभरी खाना – विवाह हो

रसगुल्ला खाना – धन वृद्धि हो

रद्दी देखना – रुका हुआ धन मिले

रंग करना – सम्बंधित वास्तु की हानि हो

रक्षा करना – मान सम्मान में वृद्धि हो

रफू करना – नई वस्त्रो या आभूषनो की प्राप्ति हो

रक्षा बंधन देखना – धन वृद्धि हो

रसोई घर गन्दा देखना – अच्छा भोजन मिले

रसोई घर स्वछ देखना -धन का संकट आये

रास्ता देखना (साफ) -तरक्की मिले

रास्ता देखना (टेड़ा मेडा ) परेशानी हो

राख देखना – धन नाश हो

रॉकेट देखना – धन संपत्ति में वृद्धि हो

रात देखना -परेशानी आये

राइ देखना – काम में रूकावट आये

राक्षश देखना – संकट आये

रामलीला देखना – सुख सौभाग्य में वृद्धि

रिश्वत लेना – सावधान रहे

रिवाल्वर चलाना – शत्रुता समाप्त हो

रिक्शा देखना या उसमे बैठना – प्रसन्त्ता बढे

रेलवे स्टेशन देखना -लाभदायक यात्रा हो

रेल देखना – कष्ट दायक यात्रा हो

रेडियो बजता देखना – प्रगति में रूकावट हो

रेफ्रिजिरटर देखना – आर्थिक लाभ हो

रेगिस्तान देखना – धन सम्पदा में वृद्धि

रोजा रखना – आर्थिक संकट आने का संकेत

रोना – मान सम्मान में वृद्धि हो

रोशनदान से देखना – विदेश से धन की प्राप्ति हो

रोटी खाना या पकाना – बीमारी आने का संकेत

रोटी बाँटना – धन लाभ हो

रोटी फैंकना या गिरी हुई देखना – देश में मन न लगे , विदेश की यात्रा शीघ्र हो

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स्याही देखना – सरकार से सम्मान मिले

स्टोव जलाना – भोजन अच्छा मिले

संडास देखना – धन वृद्धि हो

संगीत देखना या सुनना – कष्ट बढे

संदूक देखना – पत्नी सेवा करे , अचानक धन मिले

सगाई देखना या उसमे शामिल होना -

सजा पाना – संकटों से छुटकारा मिलाना

सट्टा खेलना – धोखा होने का संकेत

सलाद खाते देखना – धन वृद्धि हो

सर्कस देखना – बहुत मेहनत करनी पड़े

सलाई देखना – मान सम्मान बढे

सरसों का साग खाना – बीमारी दूर हो

सरसों देखना – व्यापार में लाभ हो

ससुर देखना – शुभ समाचार मिले

सर कटा देखना – विदेश यात्रा हो

सर फटा देखना – कारोबार में हानि हो

सर मुंडाना – गृह कलेश में वृद्धि हो

सर के बाल झड़ते देखना – क़र्ज़ से मुक्ति मिले

ससुराल जाना – गृह कलेश में वृद्धि हो

समुद्र पार करना – उनत्ति मिले

साइकिल देखना -सफलता मिले

साइकिल चलाना – काम में तरक्की मिले

साइन बोर्ड देखना – व्यापार में लाभ हो

सावन देखना – जीवन में ख़ुशी मिले

साडी देखना – विवाह हो , दाम्पत्य जीवन में सुख मिले

सारस देखना – धन वृद्धि हो

साला या साली देखना – दाम्पत्य जीवन में सुख हो , मेहमान आये , धनवृद्धि हो

सागर सूखता देखना -बीमारी आये , अकाल पड़े

सारंगी बजाना – अपयश मिले , धन हानि हो

साग देखना – अचानक विवाद हो , सावधान रहे

साबुन देखना – स्वस्थ्य लाभ हो , बीमारी दूर हो

सांप मारना या पकड़ना – दुश्मन पर विजय हो , अचानक धन मिले

सांप से डर जाना -नजदीकी मित्र से विश्वासघात मिले

सांप से बातें करना -शत्रु से लाभ मिले

सांप नेवले की लडाई देखना – कोर्ट कचेहरी जाना पड़े

सांप के दांत देखना -नजदीकी रिश्तेदार हानि पहुंचाएंगे

सांप छत्त से गिरना – घर में बीमारी आये तथा कोर्ट कचहरी में हानि हो

सांप का मांस देखना या खाना – अपार धन आये परन्तु घर में धन रुके नहीं

सिपाही देखना – कानून के विपरीत काम कारनेका संकेत

सिनेमा देखना – समय व्यर्थ में नष्ट हो

सिगरेट पीते देखना -व्यर्थ में धन बर्बाद हो

सिलाई मशीन देखना – पति पत्नी में झगडा हो

सिलाई करना – बिगडा काम बन जाये

सियार देखना -धन हानि हो , बीमारी आये

सिन्दूर देखना – दुर्घटना की सम्भावना

सिन्दूर देवता पर चडाना – मनोकामना पूर्ण हो

सीताफल देखना -कुछ समय के बाद गरीबी दूर होगी

सीता जी को देखना -मान सम्मान बढे

सीमा पार करना -विदेश व्यापार में लाभ हो

सिप्पी देखना – उसे देखने पर हानि , उठाने पर लाभ

सीना चौडा होना – लोकप्रियता में वृद्धि हो

सीड़ी पर चढ़ना – काम में असफलता मिले

सुनहार देखना – साथी से धोखा मिले

सुटली कमर में बंधना -गरीबी आये , संघर्ष करना पढ़े

सुम्भा देखना (लोहे का)- कार्य में सफलता मिले , विवाह हो

सुदर्शन चक्र देखना – बईमानी का दंड शीघ्र मिले

सुपारी देखना -विवाह शीघ्र हो , मित्रों की संख्या में वृद्धि हो

सुनहरी रंग देखना – रुका हुआ धन मिले

सुरंग देखना या सुरंग में प्रवेश करना – नया कार्य आरंभ हो

सूई देखना – एक देखने पर सुख तथा अनेक देखने पर कष्ट में वृद्धि हो

सुलगती आग देखना – शोक समाचार मिले

सुन्दर स्त्री देखना – मान सम्मान में हानि हो

सुनहरी धूप देखना – सरकार से धन लाभ हो , मान सम्मान बढे

सुराही देखना – गृहस्थी में तनाव हो , पति या पत्नी का चरित्र ख़राब हो , रोग दूर हो

सुगंध महसूस करना – चमड़ी की बीमारी आये

सुनसान जगह देखना – बलवृद्धि हो

सूद लेते देखना – मुफ्त का धन मिले

सूद देते देखना -धन नाश हो , गरीबी आये

सूली पर चढ़ना – चिन्ताओ से मुक्ति हो , शुभ समाचार मिले

सूर्य देखना – धन संपत्ति तथा मान सम्मान बढे

सूर्य की तरह अपना चेहरा चमकता देखना – पुरस्कार मिले , मान सम्मान बढे

सूअर देखना – बुरे कामों में फँसना पड़े , बुरे लोगों से दोस्ती हो तथा मानहानि हो

सूअर का दूध पीना – चरित्र खराब हो , जेल जाना पढ़े

सूरजमुखी का फूल देखना – संकट आने की सूचना

सूर्य चन्द्र आदि का विनाश देखना – मृत्यु तुल्य कष्ट मिले

सेम की फली देखना – धन हानि हो परन्तु अच्छा भोजन मिले

सेब का फल देखना – दुःख व् सुख में बराबर वृद्धि हो

सेंध लगाना – प्रिये वस्तु गुम होना

सेवा करना – मेहनत का फल मिलेगा

सेवा करवाना – स्वस्थ्य खराब होने के लक्षण है

सेहरा बंधना – दाम्पत्य जीवन में कलेश की संभावना

सैनिक देखना – साहस में वृद्धि हो

सोंठ खाना – धन हानि हो , स्वस्थ्य में सुधार हो

सोना देखना – परिवार में बीमारी बढे , धन हानि हो

सोना मिलना – धन वृद्धि हो

सोना दुसरे को देना – अपनी मुर्खता से दूसरों को लाभ पहुंचाना

सोना लुटाना – परेशानिया बढे , अपमान सहना पढ़े

सोना गिरवी रखना – बईमानी करे और अपमान हो

सोते हुए शेर को देखना – निडरता से कार्य करे , सफलता मिलेगी

सोलह श्रृंगार देखना -स्वस्थ्य खराब होने का संकेत

स्वप्न में मानिक रत्न देखना – शक्ति तथा अधिकारों में वृद्धि

स्वप्न में मोती रत्न देखना – मानसिक शांति मिले

स्वप्न में मूंगा रत्न देखना – शत्रु पर विजय मिले

स्वप्न में पन्ना रत्न देखना – व्यवसाय में वृद्धि हो

स्वप्न में पुखराज रत्न देखना -वैर विरोध की भावना बढे

स्वप्न में हीरा रत्न देखना – आर्थिक प्रगति हो

स्वप्न में नीलम रत्न देखना – उन्नत्ति हो

स्वप्न में गोमेद रत्न देखना – समस्या अचानक आये

स्वप्न में लहसुनिया रत्न देखना – मान सम्मान बढे

स्वप्न में फेरोज़ा रत्न देखना – व्यवसाय में वृद्धि

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श्र——

श्रंगार करना – प्रेम प्रसंगों में वृद्धि हो

श्रंगार दान टूटना – दांपत्य जीवन में सुख व् सफलता मिले

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ड—–

डंडा देखना – दुश्मन से सावधान रहे

डफली बजाना – घर में उत्सव की सूचना

डाक खाना देखना – बुरा समाचार मिले

डाकिया देखना – शुभ सूचना मिले

डॉक्टर देखना – निराशा मिले

डाकू देखना – धन वृद्धि हो

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स्वप्न का बहुत बड़ा विज्ञान है। यह जीवन-दिशा को बदलने वाला, नीरस को सरस बनाने वाला होता है। यदि हम स्वप्न के प्रतीकों क ो समझ सकें, उसकी सांकेतिक भाषा को जान सकें तो स्वप्न में बहुत लाभान्वित हो सकते हैं। सचमुच यह गूढ़ विद्या है। स्वप्न अच्छा हो या बुरा, यदि सही जानकारी होती है तो अनिष्ट से बचा जा सकता है और इष्ट को संपादित किया जा सकता है।

स्वप्न के अनेक प्रकार होते हैं। काल के आधार पर भी उनका विभाजन होता है। कुछ स्वप्न दिन में आते हैं और कुछ रात में। कुछ रात के पहले प्रहर में और कुछ दूसरे-तीसरे और चौथे प्रहर में। कौन-सा कल्याणकारी होता है और कौन सा अकल्याणकारी – इसे सब नहीं जानते। स्वप्न शास्त्र के भी अपने नियम हैं। एक नियम है कि कल्याणकारी स्वप्न आने के बाद तत्काल उठकर ईश्वर जाप में लग जाना चाहिए। पुन: नींद नहीं लेनी चाहिए। जो पुन: सो जाते हैं, उनके स्वप्न का इष्ट परिणाम नष्ट हो जाता है। दिन में लिये जाने वाले स्वप्न को दिवास्वप्न कहते हैं। इनमें भी कल्पना होती है। ये यथार्थ भी होते हैं।

स्वप्न के विषय में हमारी जानकारी बहुत ही कम है। यदि पूरी जानकारी हो तो उससे पूरा लाभ उठाया जा सकता है। स्वास्थ्य, संपदा, व्यापार, आध्यात्म विकास आदि के साथ स्वप्न जुड़े हुये होते हैं। एक विदेशी लेखक की टांगेें टूट गयी। उसने स्वप्न में देखा कि एक फरिश्ता आया है, उसकी

2012 में शनि देव का सभी राशियों पर प्रभाव


मेष राशि

आपकी राशि से 15 नवंबर 2011 से शनि, सप्तम राशि यानी तुला को प्रभावित कर रहा है। गोचर में गुरु आपकी राशि में ही विचरण कर रहा है। दोनों ही ग्रह 16 मई 2012 तक एक-दूसरे को ऊर्जा और शक्ति का आदान-प्रदान कर रहे हैं। शनि कुछ समय के लिए वक्रगति प्राप्त कर कन्या राशि में भी आएगा और उसी समय के आसपास गुरु भी वृष राशि में प्रवेश करेगा। शनि और बृहस्पति राशि चक्र के बहुत ही शक्तिशाली ग्रह हैं।

यदि आप उद्योगपति हैं या व्यवसायी हैं तो आप अपने वर्तमान कार्यक्षेत्र का विस्तार कर सकते हैं और यदि किसी और क्षेत्र में किस्मत आजमाना चाह रहे हैं तो इन दोनों ग्रहों की उपस्थिति आपको ऐसा करने में पूर्ण मददगार रहेगी।नई पार्टनरशिप या एसोसिएशन में भी प्रवेश किया जा सकता है। काफी यात्राएं करनी पड़ेंगीऔर आपकी उपलब्धियों में वृद्धि होगी।

जो लोग नौकरी में हैं उनके लिए स्थितियां अनुकूलता लिए रहेंगी। पदोन्नति या उन्नति भी हो सकती है। जो लोग नौकरी बदलना चाह रहे हैं तो उनको किसी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा।व्यक्तिगत स्तर पर चीजें सुचारू रूप से चलेंगी। जो लोग पार्टनर की खोज में हैं उन्हें आसानी से मिल जाएगा। पारिवारिक मामले नियंत्रण में रहेंगे और वातावरण आनंददायक बना रहेगा।

आर्थिक स्थिति रूप से यह समय बहुत अच्छा रहेगा। 16 मई 2012 को शनि वक्रगति से कन्या राशि में प्रवेश करेगा और 4 अगस्त 2012 को वापस तुला राशि में आएगा।बृहस्पति अगली राशि वृष में प्रवेश करेगा और लगभग एक साल वहां रहेगा। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि शनि छठे और बृहस्पति दूसरे भाव में विचरण रहेगा। यद्यपि यह समय बहुत ही छोटा है लेकिन यह बहुत ही फलदायी रहेगा।

किसी प्रोजेक्ट या असाइनमेंट के द्वारा अच्छा धन लाभ अर्जित होने की संभावना है।यदि कोई मसला कोर्ट-कचहरी में चल रहा है तो उसका फैसला आपके पक्ष में संपन्न हो सकता है। यदि किसी परीक्षा, प्रतियोगिता में सम्मिलित हो रहे हैं तो आपको सफलता प्राप्त होगी। विरोधियों पर विजय प्राप्त होगी।

नौकरी में अचानक उपलब्धि का योग भी बन रहा है। आपके मान-सम्मान में वृद्धि होगी।अगस्त दिसंबर 2012 के मध्य शनि तुला राशि में ही रहेगा। 9 अक्टूबर से 12 नवंबर 2012 तक शनि अस्त रहेगा बाकी समय शनि आपके पक्ष में रहेगा। आप ऐसे कुछ निर्णय ले सकते हैं जो उलटवार कर सकते हैं।

वृषभ राशि

आपकी राशि से शनि छठे भाव में विचरण कर रहा है क्योंकि तुला राशि वहीं है। क्रूर ग्रह जब छठे भाव से विचरण करते हैं तो बहुत अच्छे परिणाम देते हैं। प्रत्येक दृष्टि से शनि यहां बहुत कंर्फटेबल है, अतः इस भाव से विचरण करते समय वह स्वतः ही आपके लिए अतिरिक्त मददगार सिद्ध होंगे।

कॉर्पोरेट, व्यवसायी या उद्योगपति के रूप में अपनी योजनाओं और प्रोजेक्ट को आसानी से क्रियान्वित करने में सफल रहेंगे। यदि किसी प्रांत या देश से मदद की अपेक्षा कर रहे हैं तो वह आसानी से प्राप्त हो जाएगी और यदि विदेश जाने की योजना बना रहे हैं तो वहां भी आपको किसी प्रकार की समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा।

यदि नौकरी में हैं तो स्थितियों में अनुकूलन बना रहेगा और आपको कुछ अच्छे अवसर भी प्राप्त होंगे। जो लोग परीक्षा, प्रतियोगिता में सम्मिलित हो रहे हैं तो उन्हें सफलता प्राप्त होगी। पदोन्नति और बदलाव भी संभावित है। पैतृक संपत्ति को लेकर कोई मामला कोर्ट-कचहरी में चल रहा है तो उसका फैसला आपके पक्ष में संपन्न हो जाएगा। विरोधी चाहकर भी आपको हानि नहीं पहुंचा पाएंगे।

8 मई से 26 जून 2012 के मध्य शनि वक्री रहेगा। 16 मई 2012 को शनि वक्रगति से कन्या राशि में प्रवेश करेगा। इस दौरान अपने कैरियर से संबंधित निर्णय लेते समय आपको अतिरिक्त सावधान रहने की आवश्यकता है। नए निवेश पूर्ण जांच-परख के बाद ही करें।वाद-विवाद में न पड़ें अन्यथा हानि हो सकती है, जिससे सकारात्मक विचारधारा से बचा जा सकता है। यद्यपि आपको बहुत अच्छे अवसर प्राप्त होते रहेंगे और यदि आपका चुनाव उत्तम है तो यह समय आपके लिए काफी मददगार सिद्ध होगा। थोड़ी-सी सावधानी परिणामों की दिशा परिवर्तित कर सकती है।

जैसा कि पहले बताया गया है कि शनि जून में मार्गी होगा और 4 अगस्त को दोबारा तुला राशि में प्रवेश करेगा और साल के अंत तक इसी राशि में विचरण करेगा। 9 अक्टूबर से 12 नवंबर 2012 के मध्य शनि अस्त रहेगा। अस्त शनि की नकारात्मक विशेषताएं सामने आने लगती है जो उसमें वृहत स्तर पर मौजूद हैं।

जब शनि सूर्य की उपस्थिति से प्रभावित होता है तो शनि आक्रामक हो जाता है। इस दौरान आपको अत्याधिक सावधान रहने की आवश्यकता है। अन्यथा आप अपने कैरियर पार्टनर या एसोसिएट से अलग हो जाएंगे। वैसे शनि में आपके कैरियर ग्राफ में आमूलचूल परिवर्तन लाने की पूर्ण क्षमता है।

मिथुन राशि

शनि 15 नवंबर 2011से आपके पांचवें भाव में चल रहे हैं। शनि का कन्या में पिछला विचरण लगभग ढाई साल काफी थका देने वाला और हर कदम पर परेशानियां पैदा करने वाला था। शनि का पंचम भाव में विचरण उत्तम सिद्ध होगा और यह शनि की उच्च राशि तुला है। इस दौरान अपने रचनात्मक विचारों और प्रोजेक्टस के साथ आगे बढ़ने में मददगार सिद्ध होगा।8 फरवरी 2012 तक शनि तुला राशि में विचरण करेगा।

यदि आप एक्टिंग मॉडलिंग, सिंगिग, आर्ट, म्यूजिक, डांसिंग आदि से जु़ड़े हैं तो आप अपनी पहचान बनाने में सफल रहेंगे। आपको कुछ समुचित अवसर प्राप्त होंगे। यदि आप एक बिजनेसमैन हैं तो आप अपनी योजनाओं पर बिना किसी परेशानी के अमल करने में सफल रहेंगे।

नौकरीपेशा लोगों के लिए देश के साथ-साथ विदेश में भी आपको अच्छे अवसर प्राप्त होंगे। यदि प्रेममय हैं तो यह संबंध विवाह में परिणत हो सकता है। प्रतियोगी निराश नहीं होंगे। यदि रिसर्च आदि से जु़ड़े हैं तो इस भाव में शनि की यात्रा आपकी इच्छाओं की पूर्ति करने में काफी हद तक मददगार सिद्ध होगी।देश-विदेश की यात्राएं आपकी छवि और कैरियर को बनाने में अहम भूमिका अदा करेंगी।

शनि 8 फरवरी और 26 जून 2012 के मध्य वक्र गति से चलेगा। 16 मई 2012 को पिछली राशि कन्या में प्रवेश करेगा। यदि आप शनि की गति के साथ तारतम्य बनाए रखेंगे और परिणामों का अनुसरण करते रहेंगे तो यह आपको नकारात्मक रूप से प्रभावित नहीं करेगा।यदि आप इसे अनदेखा करते रहे तो फिर शनि आपको पकड़ लेगा। इसका प्रभाव भावनात्मक स्तर पर देखा जा सकता है और साथ ही जो योजनाएं कुछ समय पहले लगभग पूर्ण लग रही थी उनमें अचानक अवरोध आ सकता है।

जिन लोगों का आपकी गतिविधियों से काफी लेना-देना है उनके साथ भी वाद विवाद की स्थिति पनप सकती है। शनि 4 अगस्त 2012 को अपनी उच्चराशि तुला में वापस आ जाएगा और वर्ष के अंत तक वहीं रहेगा।शनि अस्त हो जाएगा जो 9 अक्टूबर से 12 नवंबर 2012 के मध्य होगा।

इस दौरान अधिकतर समय सूर्य नीचस्थ रहेगा और शनि के ऊपर से गुजरेगा। मुख्य प्रोजेक्ट्स के बारे में सावधानी बरतने की आवश्यकता है। पारिवारिक मसले उभर सकते हैं। बच्चों के साथ मतभेद हो सकते हैं। स्वास्थ्य की समस्याएं आपको या आपके परिवार को तंग कर सकती हैं।

कर्क राशि

शनि 15 नवंबर 2011 से 4 नवंबर 2014 के मध्य आपकी राशि से चतुर्थ भाव में भ्रमण करेगा। नवंबर 2011 से 8 फरवरी 2012 तक शनि तुला राशि में विचरण करेगा जो आपका चतुर्थ भाव है। चतुर्थ भाव आदमी का कंफर्ट जोन है और जब वह चतुर्थ भाव का विचार करता है तब पूर्ण शांति का अनुभव करता है।शायद यही कारण है कि कुंडली में चतुर्थ भाव मां, घर, अबाधित नींद और पूर्ण सुरक्षा का प्रतिनिधित्व करता है।

यद्यपि शनि यहां किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं करता लेकिन इसकी एक आदत है कि जो इन क्षेत्रों में जो कुछ भी गलत हो रहा है उसे उजागर करता है। शनि फरवरी 2012 से वक्री होगा जो 26 जून 2012 तक रहेगा।शनि अपनी पहली वाली राशि यानि कन्या में 16 मई को वापस आएगा और 4 अगस्त 2012 तक यहीं भ्रमण करेगा।

फरवरी से अगस्त के मध्य का समय वर्णित क्षेत्रों में काफी राहत प्रदान करेगा। यदि आप अपने कैरियर, व्यवसाय या उद्योग में किसी प्रकार की समस्या का सामना कर रहे हैं तो अपने मित्र-शुभचिंतकों की मदद से उसका हल किया जा सकता है।आपके लिए सलाह है कि अपने वर्तमान कार्य या प्रोजेक्ट में अपनी पूर्ण ऊर्जा लगाएं और परिश्रम से कार्य करें। अपव्यय पर नियंत्रण लगाएं।

यदि नौकरी की तलाश में हैं तो आपको नौकरी तलाश करने में कोई परेशानी नहीं होगी। जो लोग नौकरी में बदलाव या उन्नति के लिए प्रयासरत हैं तो उनको आशानुकूल परिणाम प्राप्त होंगे।पैतृक संपत्ति को लेकर यदि कोई मामला कोर्ट में विचाराधीन है तो उसका फैसला करने में ही भलाई है। कुछ आर्थिक तंगी हो सकती है।

4 अगस्त 2012 से साल के अंत तक शनि तुला राशि में ही रहेगा। इस दौर में आपको मिश्रित परिणाम ही प्राप्त होंगे। पूर्ण प्रयासों के बावजूद आपकी कुछ योजनाएं और प्रोजेक्ट्स आगे नहीं बढ़ पाएंगे।वर्तमान कार्यों में भी आपको समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। आपसी संबंधों में भी तनाव आ सकता है। कार्य का बोझ बढ़ेगा और कभी-कभी इसे पूर्ण कर पाना कठिन भी होगा।

9 अक्टूबर से 12 नवंबर 2012 के मध्य शनि अस्त होगा। इस दौरान आप मानसिक रूप से परेशान हो सकते हैं और समय-समय पर भावनात्मक मसले ऊभर सकते हैं जो आपको तंग करेंगे। स्थितियों को गहराई से समझें और मेडिटेशन पर जोर दें।

सिंह राशि

15 नवंबर 2011 से शनि आपके तृतीय भाव में विचरण कर रहा है यहां वह आने वाले ढाई वर्षों तक रहेगा। शनि जब तृतीय भाव में विचरण करता है जो वह यहां पर बहुत ही कंफर्टेबल होता है। नवंबर से 8 फरवरी 2012 के मध्य शनि सीधी गति से चलेगा और आपकी योजनाओं और प्रोजेक्ट्स को क्रियान्वित करने में आधारभूत मदद करेगा।

आपके कुछ अहम विचार क्रियान्वित होंगे और उनका विस्तार भी होगा। आपकी वर्तमान परियोजनाओं में लाभ की स्थितियां निर्मित होंगी। यदि नौकरी, पदोन्नति, उन्नति या बदलाव की तलाश में हैं तो आपको बहुत अच्छे अवसर प्राप्त होंगे। आप महत्वपूर्ण निर्णय लेंगे जिनसे आपकी प्रतिष्ठा में बढ़ोतरी होगी।प्रोफेशनल्स या जो लोग सृजनात्मक क्षेत्र से जु़ड़े हैं इस दौरान उनको बहुत अच्छे फल प्राप्त होंगे।

यात्राएं नए आयाम प्रदान करने वाली सिद्ध होंगी। कुछ महत्वपूर्ण लोगों से मुलाकात होगी। फरवरी और 26 जून 2012 के मध्य शनि वक्रगति से चलेगा। अपनी इस गति से चलते हुए 16 मई 2012 शनि अपनी पहली राशि कन्या राशि में प्रवेश करेगा और 4 अगस्त 2012 को फिर से तुला राशि में लौटेगा।

फरवरी और अगस्त के मध्य उत्थान और विकास की गतिविधियों में अत्यधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। यदि आप शांत चित्त और ठीक से विचार कर कार्य करेंगे तो यह दौर अच्छे गुजर जाएगा, अन्यथा इन क्षेत्रों में समस्याओं का सामना करने के लिए तैयार रहें।गलत निर्णय या अधिक खर्च के कारण धन की कमी महसूस होगी।

घरेलू मसले चिंता का विषय हो सकते हैं। अगस्त और दिसंबर 2012 के मध्य शनि तुला राशि में आगे बढ़ेगा जो आपकी राशि से सुंदर संयोग बनाएगा। कैरियर से संबंधित सभी समस्याओं के समाधान प्राप्त होंगे। बहुत अच्छे अवसर प्राप्त होंगे जो आपके पूरे व्यक्तित्व में परिवर्तन करने वाले सिद्ध होंगे।आर्थिक स्थिति में सुदृ़ढ़ता आएगी। प्रॉपर्टी, वाहन, सोना-चांदी में निवेश की संभावनाएं भी बलवती हो रही हैं। इस दौरान आपको काफी यात्राएं करना पड़ेंगी जो नए आयाम प्रदान करने वाली होंगी। 9 अक्टूबर से 12 नवंबर 2012 के मध्य शनि अस्त होगा इसलिए सावधानी बरतने की आवश्यकता है।

कन्या राशि

शनि आपकी राशि में पिछले ढाई वर्ष से चल रहा था। 15 नवंबर 2011 को शनि ने तुला राशि में प्रवेश किया है जो कि शनि की उच्च राशि है। यहां से आपको राहत की सांस मिलेगी। आपके लिए 15 नवंबर से 16 मई 2012 के मध्य का समय हर तरह से बहुत अच्छा है। धन संबंधी समस्याएं एक बाद एक हल होने से आपको काफी राहत प्राप्त होगी। रुके हुए धन की प्राप्ति भी हो सकती है।

आर्थिक और प्रोफेशनल क्षेत्र के विस्तार की संभावनाएं  भी बलवती हो रही हैं। इस दौरान आप किसी नए समझौते या पार्टनरशिप में प्रवेश कर सकते हैं। जो लोग नौकरी बदलना चाह रहे हैं तो उनको इच्छित नौकरी प्राप्त हो जाएगी। विदेश से भी कुछ अच्छे अनुबंध प्राप्त हो सकते हैं।

पारिवारिक स्तर पर उत्सव संपन्न हो सकता है या कोई शुभ समाचार प्राप्त हो सकता है।शनि वक्रगति से 16 मई 201 2 को वापिस आपकी राशि में लौटेगा जो यहां पर 4 अगस्त 2012 तक रहेगा। इस दौरान आपको अत्यधिक सचेत रहने की आवश्यकता है। निकटस्थ जनों के साथ मनमुटाव की स्थिति पनप सकती है। आर्थिक लेनदेन में पूर्ण सावधानी बरतने की नितांत आवश्यकता है।

अपने स्वास्थ्य को भी अनदेखा नहीं करना चाहिए।4 अगस्त 2012 को शनि तुला में प्रवेश करेगा और वर्षपर्यंत यहीं विचरण करेगा। अगस्त से 9 अक्टूबर के मध्य यह काफी मददगार सिद्ध होगा। आप अधूरे कार्यों को पूर्ण कर सकेंगे। कुछ योजनाएं और कार्य जो लगभग बंद हो गए थे उन्हें पुनर्जीवित किया जा सकता है भाग्य का सहयोग प्राप्त होगा और विदेश से लाभ प्राप्त होने से इंकार नहीं किया जा सकता। परिवार में कोई बड़ा उत्सव भी संपन्न हो सकता है।

9 अक्टूबर से 12 नवंबर के मध्य जब शनि अस्त होगा तो उस समय सतर्क रहने की आवश्यकता है। आपको सलाह दी जाती है कि इस दौरान महत्वपूर्ण निर्णय न लें। वैसे दैनिक कार्यों और जरूरतों की पूर्ति में समस्या नहीं आएगी। बाकी समय, 12 नवंबर से लेकर साल के अंत तक बहुत ही उत्साहवर्धक रहेगा।नई बातें घटने लगेंगी और जटिल समस्याओं के हल प्राप्त होंगे।

प्रोफेशनल और व्यक्तिगत जीवन सुचारु चलेगा। यह समय आमूलचूल परिवर्तन का है जहां बहुत सी नयी चीजें घटित होंगी जो आने वाले वर्षों में मददगार सिद्ध होंगी।वर्तमान में कन्या, तुला तथा वृश्चिक राशि वाले जातकों पर शनि की साढ़ेसाती चल रही है एवं वृषभ व मीन राशि वाले जातक ढैया से प्रभावित हैं। शनि की शांति तथा कृपा के लिए ये निर्दिष्ट उपाय कर सकते हैं।

व्रत : शनिवार का व्रत रखें।

व्रत के दिन शनिदेव की पूजा (कवच, स्तोत्र, मंत्र जप) करें। शनिवार व्रत कथा पढ़ना भी लाभकारी रहता है। व्रत में दिन में दूध, लस्सी तथा फलों के रस ग्रहण करें। सायंकाल हनुमानजी या भैरवजी का दर्शन करें। काले उड़द की खिचड़ी (काला नमक मिला सकते हैं) या उड़द की दाल का मीठा हलवा ग्रहण करें।

दान: शनि की प्रसन्नता के लिए उड़द, तेल, इन्द्रनील (नीलम), तिल, कुलथी, भैंस, लोह, दक्षिणा और श्याम वस्त्र दान करें। किसी भी शनि मंदिरों में शनि की वस्तुओं जैसे काले तिल, काली उड़द, काली राई, काले वस्त्र, लौह पात्र तथा गुड़ का दान करने से इच्छित फल की प्राप्ति होती है।

रत्न/धातु: शनिवार के दिन काले घोड़े की नाल या नाव की सतह की कील का बना छल्ला मध्यमा में धारण करें।

औषधि: प्रति शनिवार सुरमा, काले तिल, सौंफ, नागरमोथा और लोध मिले हुए जल से स्नान करें।

तुला राशि:

शनि 15 नवंबर 2011 को आपकी राशि में अगले ढाई साल के लिए आ गया है। यह आपकी राशि से 30 वर्षों के बाद गुजर रहा है।जिस दिन शनि तुला राशि में प्रवेश करेगा उससे 16 मई 2012 तक आपकी राशि में रहेगा। शनि 8 फरवरी 2012 को वक्रगति को प्राप्त होगा और 16 मई 2012 को कन्या राशि में प्रवेश करेगा। इस दौरान शनि दो प्रकार के परिणाम प्रदान करेगा।

पहला पैटर्न नवंबर से फरवरी 2012 तक होगा। आपको अपने विचारों को क्रियान्वित करने में समस्याओं का सामना करना पड़ेगा जिनमें काफी प्रगति हो चुकी थी। संतोषजनक परिणाम प्राप्त करने के लिए आपको अपनी योजनाओं और कार्य प्रणाली में फेरबदल करने की नितांत आवश्यकता है।बिना पूर्व सोच विचार के कोई नया निवेश नहीं करना चाहिए। शनि 8 फरवरी 2012 को वक्री हो जाएगा और 16 मई 2012 को कन्या राशि में प्रवेश करेगा। इस दौरान आपको सतर्क रहने की आवश्यकता है।

इस समय लिए गए गलत निर्णय महंगे साबित होंगे।आपका या किसी परिजन का स्वास्थ्य चिंता का विषय हो सकता है। जो लोग स्टॉक मार्केट से जु़ड़े हैं उन्हें अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत है। 16 मई से 4 अगस्त 2012 के मध्य का समय एक अच्छी शुरूआत देगा। आपकी कुछ योजनाएं बिना किसी झंझट के क्रियान्वित हो सकती है।मित्र शुभचिंतकों का पूर्ण सहयोग प्राप्त होगा।

लंबी दूरी की यात्राएं आपके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगी। संपत्ति संबंधी यदि कोई मामला कोर्ट में चल रहा है तो उसको फैसला आपके पक्ष में हो सकता है।शनि 4 अगस्त 2012 को वापिस तुला राशि में आ जाएगा और फिर पूरे साल यहीं पर रहेगा। इस दौरान शनि अधिकतर अच्छे परिणाम ही प्रदान करेगा।

जो बाधाएं और झंझट पहले आ रहे थे वो अब तंग नहीं करेंगे। 9 अक्टूबर से 12 नवंबर 2012 के मध्य सावधानी बरतने की आवश्यकता है।साधारण रूप से यह उत्साहवर्धक समय है।

आपको परिवार और बच्चों पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। यदि आप उनके साथ समय व्यतीत करेंगे और इन मसलों पर ध्यान देंगे तो ये आपके लिए मददगार सिद्ध होंगे।परिजनों के साथ अर्थपूर्ण बातचीत करेंगे और उन्हें कार्यों में लगाएंगे तो इससे आपको अपनी व्यक्तिगत समस्याओं को हल करने में काफी मदद मिलेगी।

वृश्चिक राशि:

शनि 15 नवंबर से 8 फरवरी 2012 के मध्य सीधी गति से चलेगा और तुला राशि से गुजरेगा जो आपका बारहवां भाव है। जहां तक योजना और स्कीम बनाने और नए वातावरण में घुलने मिलने का संबंध है तो इसके लिए यह बहुत अच्छा समय है। आप किसी बड़े कार्य की योजना बना सकते है या अपनी रिसर्च प्रारंभ कर सकते हैं जो बीच में रुक गई थी।

लंबे समय की सारी गतिविधियां इस समय प्रारंभ की जा सकती हैं। जहां तक वर्तमान प्रोफेशन या कैरियर का संबंध है वहां स्थितियों को अपने पक्ष में करने के लिए आपको अतिरिक्त ध्यान देने की आवश्यकता है। कभी-कभी विघ्न और बाधाओं के चुनौतियां आएंगी लेकिन यदि आप सजग हैं तो आप इन कठिनाईयों से आसानी से निपट लेंगे।

धन संबंधी मामलों में सावधानी बरतें। यदि प्रॉपर्टी या फिक्स्ड एसेट्स में निवेश करने की योजना बना रहे हैं तो ऐसा करने के लिए समय अच्छा है।फरवरी और अगस्त के मध्य आपको कई अवसर प्राप्त होंगे और अलग प्रकार की स्थिति उभर सकती हैं। फरवरी के बाद अचानक धन के आगमन में वृद्धि होगी। आपकी कुछ योजनाएं जिन पर आप पिछले काफी समय से काम कर रहे थे वे अब चालू हो सकती हैं।आपके सामाजिक और प्रोफेशनल दायरे का विस्तार होगा और यह आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि करेगा।

मित्र और यात्रा कारगर सिद्ध होंगे। पारिवारिक जीवन शांतिपूर्ण रहेगा और परिवार में कोई उत्सव भी संपन्न हो सकता है। जो लोग नौकरी में बदलाव चाह रहे हैं उन्हें आसानी से अच्छी नौकरी प्राप्त हो जाएगी।शनि 4 अगस्त 2012 को तुला राशि में प्रवेश करेगा और कुल मिलाकर यह शनि आपको अच्छे परिणाम ही देगा।

यदि आप ठीक से आंकलन करेंगे तो निश्चित रूप से कुछ कमियां मिलेगी जिनको दूर करने की नितांत आवश्यकता है।यदि आप समय पर ऐसा कर पाएं तो आपके लिए अति उत्तम कार्य होगा और यदि आपने ऐसा नहीं किया तो यह आपके लिए महंगा साबित होगा। शनि 9 अक्टूबर और 12 नवंबर 2012 के मध्य अस्त रहेगा। इस समय सावधानी रखें, विशेषकर उच्चाधिकारी और उन लोगों से व्यवहार करते समय जो आपके जीवन में बहुत महत्व रखते हैं। अपने व्यवहार के प्रति सजग रहें।

धनु राशि:

शनि का बदलाव आपके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा। शनि यहां आपकी राशि से सेक्सटाइल बना रहा है जिसको बहुत अच्छा माना जाता है। जब ग्रहों के मध्य सेक्सटाइल बनता है तो उस समय को जीवन के उत्तम समय में गिना जाता है।15 नवंबर से 8 फरवरी 2012 के दौरान शनि सीधी गति से चलेगा। यह समय बहुत महत्वपूर्ण है। आपकी कोई महत्वाकांक्षी योजना प्रारंभ हो सकती है। एक कार्पोरेट बिजनेसमैन और उद्योगपति के रूप में आप बहुत अच्छा प्रदर्शन करेंगे।

यदि कार्पोरेट से बड़े फाइनेंस की तलाश में हैं तो आपको निराश नहीं होना पड़ेगा। नौकरी की तलाश में हैं तो आपको सफलता प्राप्त होगी।8 फरवरी 2012 से 26 जून 2012 के मध्य का समय आपके लिए विभिन्न रूप में प्रासंगिक है। यह समय आपको चेतावनी देता है कि जो कुछ कमियां रह गई है उन्हें दूर करने की आवश्यकता है।

एक तरह से यह भगवान के द्वारा निर्मित स्थिति है जो उनमें लिप्त न होकर अपनी कमियों को दूर करने में मदद करती है। अपनी योजनाएं दोबारा बनाई जा सकती है और अपने खर्चों में कमी करनी चाहिए और स्थितियां को ठीक करना चाहिए। इस दौरान किसी संस्थान या सरकार से मदद चाह रहे हैं तो वो भी आसानी मिल जाएगी।

नौकरीपेशा लोगों की पदोन्नति या नौकरी में बदलाव हो सकता है।26 जून 201 2 को शनि डायरेक्टीव यानी मार्गी हो जाएगा और 4 अगस्त 2012 को दोबारा तुला राशि में प्रवेश कर जाएगा। यह बहुत अच्छा समय है जो आपकी प्रोफेशनल गतिविधियों को आवश्यक गति प्रदान करेगा।शनि 4 अगस्त 2012 को तुला राशि में प्रवेश करेगा और वर्ष के अंत तक इसी राशि में रहेगा।

जैसे ही यह तुला राशि में वापिस आ जाएगा तो यह अच्छे संबंध स्थापित करना प्रारम्भ कर देता है। महत्वाकांक्षी योजनाएं प्रारंभ की जा सकती हैं और पूर्व में किए गए प्रयास अब उत्साहवर्धक परिणाम देने लगेंगे।धन का अच्छा आगमन होगा और आपकी आर्थिक स्थिति काफी मजबूत होगी। विदेश की काफी यात्राएं होंगी जो बहुत ही फलदायी सिद्ध होंगी।

पारिवारिक जीवन सौहार्दपूर्ण और शांतिपूर्ण रहेगा और परिवार में कोई उत्सव भी संपन्न हो सकता है। आपके सामाजिक दायरे का विस्तार होगा और आपके व्यक्तित्व में भी बढ़ोतरी होगी। शनि 9 अक्टूबर से 12 नवंबर 2012 तक अस्त रहेगा। यह समय बहुत अच्छा नहीं है।

मकर राशि:

आपकी राशि में शनि 15 नवंबर से 8 फरवरी 2012 के मध्य डायरेक्टीव यानी मार्गी रहेगा। इस समय आप अति व्यस्त रहेंगे। आपके दिमाग में नए विचार आएंगे जिन्हें आप कार्यरूप भी प्रदान करना चाहेंगे। इस संबंध में आप बाहर से किसी की मदद की उम्मीद करते हैं तो वह भी आसानी से मिल जाएगी। व्यवसाय से जु़ड़े हैं तो वहां आप बहुत अच्छा करेंगे।इस दौरान आप प्रॉपर्टी या वाहन आदि खरीदने का भी मन बना सकते हैं।

पैतृक संपत्ति को लेकर यदि कोई मामला कोर्ट कचहरी में चल रहा है तो उसका फैसला आपके पक्ष में संपन्न हो जाएगा। आपको काफी यात्राएं करना पड़ेंगी और वे लाभदायक भी रहेंगी। आर्थिक स्थिति अच्छी बनी रहेगी।8 फरवरी 2012 को शनि वक्रगति को प्राप्त होगा और वक्रगति से चलते हुए 16 मई 2012 को कन्या राशि में प्रवेश करेगा। फरवरी और जून के मध्य आपको बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त नहीं होंगे।

अपनी योजना और स्कीम और आवश्यक समझौता करने में आपको अतिरिक्त सावधानी बरतने की आवश्यकता है। यदि किसी प्रतियोगिता में सम्मिलित हो रहे हैं तो अपने प्रयासों में गहनता लाने की पूर्ण आवश्यकता है।शनि 26 जून 2012 को डायरेक्ट हो जाएगा और 4 अगस्त 2012 को फिर से तुला राशि में प्रवेश करेगा। यह एक बहुत अच्छा पीरियड है जो आपमें पैदा हुए भय को दूर करने में मदद करेगा।कुछ नए लोगों से आपकी मुलाकात होगी जो आपकी स्कीम और प्रोजेक्ट्स में मददगार रहेंगे।

परिवार में विवाह या शिशु जन्म भी संपन्न हो सकता है।4 अगस्त 2012 को शनि तुला राशि में प्रवेश करेगा और साल के अंत तक वहीं विचरण करेगा। यह माह आपको अच्छा परिणाम प्रदान करेगा। प्रोफेशनल्स, आर्टिस्ट, उशेगपति इस समय बहुत तरी करेंगे। यदि विदेश में नौकरी या शिक्षा प्राप्त करना चाह रहे हैं तो आपका यह कार्य भी बन जाएगा।प्रॉपर्टी संबंधित लम्बित मसले आपसी सहमति से हल हो जाएंगे।

यदि सरकार या किसी वित्त संस्थान से लोन लेना चाह रहे हैं तो आपका कार्य सिद्ध होगा। आप अपनी एक अलग ही छवि बनाने में सफल रहेंगे जो आने वाले समय में मददगार सिद्ध होगी।शनि 9 अक्टूबर से 12 नवंबर 2012 के मध्य अस्त रहेगा। अधिकतर अस्त शनि इच्छित परिणाम नहीं देता। आपको इस दौरान अति सतर्क रहने की आवश्यकता है

कुंभ राशि:

अब चिंता की कोई बात नहीं अब यह आपके भाग्य भाव प्रोत्साहित करेगा और यहां अगले ढाई साल रहेगा। 15 नवंबर से 8 फरवरी के मध्य जब शनि सीधी गति से चलेगा तब यह आपके लिए अति महत्वपूर्ण रहेगा। भाग्य आपका साथ देगा। आपकी महत्वाकांक्षी योजनाएं जिनमें पहले अवरोध आ गए थे फिर से प्रारंभ हो जाएंगी।जो लोग बिजनेस, कॉर्पोरेट या अन्य गतिविधियों से जु़ड़े हैं उन्हें उत्साहवर्धक परिणाम प्राप्त होंगे। यदि विदेश में कुछ करने की योजना बना रहे हैं तो आपको सफलता प्राप्त होगी।

यह पीरियड आपको अति व्यस्त रखेगा और धनागमन में भी सुधार होगा।यदि किसी प्रतियोगिता में बैठ रहे हैं तो आपको सफलता प्राप्त होगी। पदोन्नति या नौकरी में बदलाव की स्थितियां भी बन रही हैं। यदि पैतृक संपत्ति संबंधी कोई मामला कोर्ट कचहरी में विचाराधीन है तो उसका फैसला आपके पक्ष में हो जाएगा। पारिवारिक वातावरण सौहार्द्रपूर्ण रहेगा और परिवार में कोई समारोह भी संपन्न हो सकता है।

शनि 8 फरवरी को वक्री होकर 16 मई 2012 को कन्या राशि में प्रवेश करेगा। अचानक आपकी गतिविधियों में बाधा उत्पन्न हो सकती है। ऐसा प्रतीत होगा कि जो चीजें आसानी से आगे बढ़ रही थी उनमें अचानक अजीबोगरीब स्थिति या चुनौतियां आ गई हैं। वास्तविक रूप से ये बुरा फेज इंगित करती हैं।

चेतावनी के ये संकेत केवल आपको मदद करने के लिए हैं।आपको कुछ यात्राएं भी करना पड़ेंगी और ये यात्राएं आपके पक्ष में वातावरण भी निर्मित करेंगी। 16 मई से 4 अगस्त 2012 के मध्य शनि कन्या राशि में वापिस जाएगा और इस दौरान वहीं पर रहेगा। जहां तक प्रोफेशनल कार्यों का संबंध है इस पीरियड में आपको एक प्रकार की असहजता का एहसास होगा।

आर्थिक तंगी भी झेलनी पड़ सकती है।आपके चलते प्रोजेक्ट्स में अवरोध आ सकते हैं। परिजन का व्यवहार या स्वास्थ्य चिंता का विषय हो सकता है। स्टॉक मार्केट में ज्यादा निर्लिप्तता आपको नकारात्मक परिणाम ही प्रदान करेगी।

4 अगस्त 2012 को दोबारा तुला राशि में शनि आएगा। कुल मिलाकर यह बहुत अच्छा पीरियड है। स्थितियों में परिवर्तन आने लगेगा और जो समस्याएं पहले आई थीं उनके समाधान मिलने लगेंगे। परिणाम का पैटर्न उत्साहवर्धक रहेगा। धन आगमन में भी काफी वृद्धि होगी। भाग्य भी आपका साथ देगा।

मीन राशि:

15 नवंबर 2011 से शनि तुला राशि में विचरण करेगा और 8 फरवरी 2012 तक आगे ही बढ़ता रहेगा। इस दौरान शनि गोचर में आपकी राशि से अच्छा कोण नहीं बनाएगा। यह समय इंगित करता है कि अब आपको कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। आपको कुछ अच्छे अवसर प्राप्त होंगे जो आपको अत्यधिक उत्साहित करेंगे।मूर्तरूप से उनको क्रियान्वित करना आपको सहज प्रतीत होगा लेकिन वैसा होगा नहीं।

यह स्थिति एक तरफ आपको प्रेरित करेगी और आप इन चुनौतियों को सामना करने के लिए तैयार हो जाएंगे। आपको सलाह दी जाती है अपने धन या एसेट्स का उपयोग बिना जांच-परख कर न करें और अपनी बुद्धिमत्ता का अधिकतम उपयोग करें।

8 फरवरी से 4 अगस्त के मध्य आपको काफी राहत प्राप्त होगी। आपकी कुछ योजनाएं और प्रोजेक्ट्स जो पहले काफी प्रयासों के बाद ठीक नहीं चल रहे थे अब वो गति पकड़ेंगे।नई आशाएं जगेंगी और अपनी क्षमताओं पर विश्वास भी कायम होगा। कोई नई एसोसिएशन या पार्टनरशिप हो सकती है जो बहुत अच्छे परिणाम देगी। प्रोफेशनल्स, कॉर्पोरेट इच्छानुकूल परिणाम प्राप्त करने में सफल रहेंगे।

जो लोग परीक्षा, प्रतियोगिता में सम्मिलित हो रहे हैं उन्हें मनोकूल परिणाम प्राप्त होंगे। अविवाहित हैं तो विवाह होने की भी पूर्ण संभावना है। मित्र-शुभचिंतकों का पूर्ण सहयोग बना रहेगा। आपको बहुत सी यात्राएं करना पड़ेंगी जो लाभदायक सिद्ध होंगी। सामाजिक गतिविधियों में वृद्धि होगी।4 अगस्त 2012 को शनि वापिस तुला राशि में आ जाएगा और फिर वर्षपर्यंत वहीं रहेगा।

आपकी कुछ योजनाओं में आशानुकूल प्रगति होगी लेकिन कुछ जस की तस बनी रहेंगी। यह स्थिति निश्चित रूप से आपको कई बार चिंतित करेंगी। कभी-कभी आप यह सोचकर हैरान हो जाएंगे कि मैंने गलती कहां की है और जिसका उत्तर भी आपको आसानी से प्राप्त नहीं होगा।कभी-कभी जीवन में ऐसी स्थितियां भी पैदा हो जाती हैं कि अलाभकारी कार्यों को बंद कर, फलदायी योजनाओं पर ही ध्यान केंद्रित करने में भलाई है। आपके कुछ विश्वासपात्र मित्र और शुभचिंतक बिना स्वार्थ भाव के समय-समय पर आपको अपना पूर्ण सहयोग प्रदान करते रहेंगे। यात्रा करने के बहुत से अवसर आएंगे।

—–शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए ये करें उपाय—-

—- शनि दिन में शनि चालीसा का पाठ, शनि मंत्रों का जाप एवं हनुमान चालीसा का पाठ करें।

—- इस दिन पीपल के पेड़ पर सात प्रकार का अनाज चढ़ाएं और सरसों के तेल का दीपक जलाएं।

—– तिल से बने पकवान, उड़द से बने पकवान गरीबों को दान करें।

—– उड़द दाल की खिचड़ी दरिद्रनारायण को दान करें।

——- अमावस्या की रात्रि में 8 बादाम और 8 काजल की डिब्बी काले वस्त्र में बांधकर संदूक में रखें।

—– शनि यंत्र, शनि लॉकेट, काले घोड़े की नाल का छल्ला धारण करें।

—– इस दिन नीलम या कटैला रत्न धारण करें। जो फल प्रदान करता है।

—– काले रंग का श्वान इस दिन से पालें और उसकी सेवा करें।

——शनिवार का व्रत यूं तो आप वर्ष के किसी भी शनिवार के दिन शुरू कर सकते हैं। इस व्रत का पालन करने वाले को शनिवार के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके शनिदेव की प्रतिमा की विधि सहित पूजन करनी चाहिए।

—–शनिवार के दिन शनि देव की विशेष पूजा होती है। शहर के हर छोटे बड़े शनि मंदिर में सुबह ही आपको शनि भक्त देखने को मिल जाएंगे।

—- शनि भक्तों को इस दिन शनि मंदिर में जाकर शनि देव को नीले लाजवंती का फूल, तिल, तेल, गु़ड़ अर्पण करना चाहिए। शनि देव के नाम से दीपोत्सर्ग करना चाहिए।

—–शनिवार के दिन शनिदेव की पूजा के पश्चात उनसे अपने अपराधों एवं जाने-अनजाने जो भी आपसे पाप कर्म हुआ हो उसके लिए क्षमा याचना करनी चाहिए।

—–शनि महाराज की पूजा के पश्चात राहु और केतु की पूजा भी करनी चाहिए।

—–इस दिन शनि भक्तों को पीपल में जल देना चाहिए और पीपल में सूत्र बांधकर सात बार परिक्रमा करनी चाहिए।

—–शनिवार के दिन भक्तों को शनि महाराज के नाम से व्रत रखना चाहिए।

—- शनि की शांति के लिए नीलम को तभी पहना जा सकता है।

—–शनिवार को सायंकाल पीपल वृक्ष के चारों ओर 7 बार कच्चा सूत लपेटें, इस समय शनि के किसी मंत्र का जप करते रहें। फिर पीपल के नीचे सरसों के तेल का दीपक प्रज्ज्वलित करें तथा ज्ञात अज्ञात अपराधों के लिए क्षमा मांगें।

——–शनिवार को अपने हाथ की नाप का 19 हाथ काला धागा माला बनाकर पहनें।

—-शनिश्वर के भक्तों को संध्या काल में शनि मंदिर में जाकर दीप भेंट करना चाहिए और उड़द दाल में खिचड़ी बनाकर शनि महाराज को भोग लगाना चाहिए। शनिदेव का आशीर्वाद लेने के पश्चात आपको प्रसाद स्वरूप खिचड़ी खाना चाहिए।

—–सूर्यपुत्र शनिदेव की प्रसन्नता हेतु इस दिन काली चींटियों को गु़ड़ एवं आटा देना चाहिए।

—–इस दिन काले रंग का वस्त्र धारण करना चाहिए।

—-श्रावण मास में शनिवार का व्रत प्रारंभ करना

पंडित दयानन्द शास्त्री

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